धर्मसूत्र:-6 …धर्मशास्त्र और प्रैक्टिकल लाइफ.. इस तरह जुड़ते हैं अनंत उर्जा स्रोत से .. P ATUL VINOD

धर्मसूत्र:-6 …धर्मशास्त्र और प्रैक्टिकल लाइफ

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वेद, पुराण और शास्त्र की बातों को प्रैक्टिकल लाइफ में अपनाना कठिन मालूम होता है|  नई पीढ़ी को ये बातें आसानी से समझ में नहीं आती|  हम किसी बात को लाइफ में प्रैक्टिकलि नहीं उतार पाए तो वो सिर्फ मेंटल एक्सरसाइज बनकर रह जाएगी|  धर्म-सूत्र सीरीज के इस भाग में हम धार्मिक बातों को प्रैक्टिकल लाइफ में उपयोग करने के बारे में ही चर्चा करेंगे|

माना ये जाता है कि स्प्रिचुअल लाइफ और प्रैक्टिकल लाइफ में बहुत बड़ा अंतर है|  स्पिरिचुअल बुक्स में कही गई बातें प्रैक्टिकल लाइफ में उतारना आसान नहीं है|

धर्म शास्त्रों की मूल बात यही है कि एक ही ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है सब में वो ही ईश्वर है|

अब कैसे मान लें कि सब में  वही ईश्वर है?  और चलिए मान भी लेते हैं कि हर ओर ईश्वर है,कण-कण में भगवान है,  ऐसा मान लेने से क्या होगा?

यूं तो शास्त्रों में लाखों श्लोक हैं उन श्लोकों को रटने से क्या हमारी लाइफ बदल सकती है?  श्लोक रटने की बजाय हमें धर्म शास्त्र में जो मर्म कहा गया है उसे समझना है|

धर्म का मर्म समझ में आगया तो उसे अपनाना भी आसान होगा|

जब मर्म समझ में आता है तो ये भी पता चलता है कि ये पूरी तरह प्रैक्टिकल है और लाइफ में उतारा जा सकता है|

श्री कृष्ण ने युद्ध के मैदान में गीता का उपदेश दिया था|  अब सोचिए युद्ध का मैदान “खून-खराबा”

उसके बीच में कहां धर्म कर्म की बात?

धर्म तो यही है| कर्म के वेग के बीच भी शांति का अनंत भाव|  यही कर्म रहस्य है|

धर्म कहता है इच्छाओं के गुलाम बनकर किए जाने वाले कार्य कर्म नहीं हैं| कर्म तो वो है जो प्रकृति की इच्छा के मुताबिक अनंत शांति के साथ किए जाएं|

ऊपर से गति में हो लेकिन अंदर से उतने ही शांत|

बाहर कार्य का वेग है और अंदर भावनाओं का आवेश… इससे हमारी शक्ति  तो कम होगी साथ में आत्मविश्वास कम होगा| मन इधर-उधर भटकेगा लेकिन रिजल्ट उस तरह का नहीं आएगा|

हम दो  तरह से  काम करते हैं| पहला मनमाने लक्ष्य तय करना और उसे आदर्श से जोड़ देना, दूसरा उसके द्वारा दिए लक्ष्य को ही अपना लक्ष्य मान लेना|

जैसे एक व्यक्ति की इच्छा बड़ा गुरु बनने की|  वो अपनी लालसा को धर्म अध्यात्म से जोड़ देगा|  अपने आप को महान और ज्ञानी साबित करेगा| यहाँ उसे साबित करना पड़ रहा है| क्यूंकि जो कार्य वो कर रहा है उसके साथ भावनाओं का वेग भी है अंदर एक संदेह है होगा या नहीं? होना ही चाहिए कैसे भी|

लेकिन जो व्यक्ति प्राकृति के आदेश पर ज्ञान दे रहा है उसे गुरु बनने की ज़रूरत नही वो तो स्वयम में ही गुरु है कोई मने न माने| उसे गुरु होने का सर्टिफिकेट भी प्रकृति दे देती है|

गुरुरूप में संसार को ज्ञान देना बिल्कुल एक अच्छा काम है,  धर्म के अनुरूप है|

लेकिन गुरु बनने की इच्छा के पीछे आपके अंदर का कोई प्रलोभन है या प्रकृति की इच्छा?

Sanatan Dharma and Dowry_Newspuran

भले ही कोई काम शास्त्रोक्त क्यों ना हो लेकिन वो करने के पीछे हमारा प्रलोभन है तो वो कर्म नहीं “कार्य” है| कार्य में असफलता भी हो सकती है, गलत भी हो सकता है|

कर्म तो वो है जिसमें ईश्वर की इच्छा छुपी हो| यदि आपको  प्रकृति सरकारी बाबू बनाना चाहती है तो वही आपका कर्म है और वही धर्म|

अपने ऊपर विश्वास कीजिए|  अपने अंदर के ईश्वर को पहचाने बिना आप हमेशा बाहर शक्ति के “स्रोत” को तलाशेंगे|

इज्जत पाने के लिए आप समाज सेवा का चोला पहनेंगे, साधू कहलाने के लिए भगवा धारण करेंगे, ढेर सारी  माला पहनेंगे|  शक्ति पाने के लिए आप नेता बनने का ढोंग रचेंगे,  पैसा कमाने के लिए बेईमानी करेंगे| लेकिन आपमें ये सब स्वाभाविक बनने के बीच हैं तो बाहर आप बदलें न बदलें बीच अंकुरित होकर बड़ा होगा तो वो कौनसा वृक्ष है बताने की ज़रूरत नहीं|

शास्त्र कहते हैं कि हम अपने सत्य से अभी और इसी वक्त जुड़ सकते हैं|  हमारे अंदर ईश्वर का प्रकाश मौजूद है लेकिन हम अंधेरे की रट लगाए हुए हैं|

ये हमारी मूर्खता है कि हम कमजोर हैं, डरपोक हैं,  गलत हैं, पापी हैं,  अपवित्र हैं, अशुद्ध हैं|

धर्म-शास्त्र कहते हैं कि अपने आप को कमजोर और पापी समझना ही सबसे बड़ा पाप है |

अज्ञानता के पर्दे को हटाते से ही पवित्रता, प्रेम, ऐश्वर्य, शुद्धता, पुण्य  का खजाना अपने अंदर ही मिल जाता है|

बाहर की चीजों के बिना ही हम शक्ति संपन्न हैं| समृद्ध, शुद्ध, यश और वैभव से भरे हैं|

कमजोरी सिर्फ हमारे शब्दों और भावों में है|  पवित्रता हमारी सोच में है|

हमारे पास काम क्या है?

नौकरी, बिजनेस, प्रोफेशन में  हम कितना इंवॉल्व है?

जब युद्ध के बीच कृष्ण गीता सुना सकते हैं और अर्जुन आत्मज्ञान हासिल कर सकता है तो हम क्यों नहीं?

हम तो युद्ध के बीच नहीं हैं|

हमारे छोटे-मोटे काम के बीच हमारे पास पूरा मौका है सच्चाई को जानने का|

स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि मौका होते हुए भी झूठी कमियों के लिए रोना|  काल्पनिक कमजोरियों का बखान करना|  बेवजह के उलझन में खुद को व्यस्त रखना और सत्य से दूरी बनाना इससे बड़ी लज्जा की बात नहीं हो सकती|

आप जहां है वहीँ सब कुछ हासिल न कर सके तो दूसरी जगह भी आपको कुछ नहीं मिलेगा|

शास्त्र यही कहते हैं कि आप को ज्ञान प्राप्त करने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं|

वेद यही तो कहते हैं, जब दूसरा कुछ है ही नहीं| तब ये क्यों सोचना कि यहां जाऊंगा तब ऐसा करूंगा, वहां जाऊंगा तब वैसा करूंगा| ये हासिल करूंगा तब ऐसा होगा|

जो हासिल होना है वो अभी होगा इसी वक्त होगा|

किसी खास परिस्थिति का इंतजार मत कीजिए|

किसी घास घड़ी के इंतजार में मत बैठिये|

नीचे गिराने वाले लोगों से सावधान रहिए|

धर्म और अध्यात्म की बातों को तोड़ मरोड़ कर वो आपको पल भर में भ्रमित कर देते हैं|

जो भी व्यक्ति इंसान को संसार की तरफ धकेल देता है वो उसे धर्म से दूर ले जाता है|

प्रशिक्षकों को हमेशा इंसान को ऊंचा उठाने के लिए उसे प्रकाश की तरफ ईश्वर की तरफ, आत्मा की तरफ, ले जाने की बातें बताना चाहिए|

दूसरे धर्मों की निंदा,  नए मत, पंथ, संप्रदाय का निर्माण|  नए सिद्धांतों की खोज इन सब से कुछ हासिल नहीं होता|

पहले बहुत हो चुका है ऐसा|

मनुष्य का जीवन है तो रोग भी हैं|  धर्म कहता है कि रोग और दुर्बलता के पीछे जिंदगी को नष्ट कर लेंगे क्या|

दिन रात रोगी रोगी सोचते रहने से क्या होगा?

ताकत के बारे में सोचो|  शक्ति से नाता जोड़ो|

वेदांत मनुष्य को पापी नहीं कहता वो कहता है कि तुम पूर्ण और शुद्ध स्वरूप हो|  पाप तुम्हारी अभिव्यक्ति का लोएस्ट फॉर्म है|

जब तुम अपनी आत्मा से जुड़ते जाओगे …  इसके हाईएस्ट फॉर्म की तरफ आगे बढ़ोगे तब तुम्हें पुण्य ही पुण्य दिखाई देगा|

ये सोचना भी मत कि ऐसा तुम नहीं कर सकते|

तुम कर सकते हो|

ये बातें तुम सुन रहे हो तो सिर्फ इसलिए कि तुम्हें ऐसा करना है|

आत्मविश्वास ने ही इस दुनिया में अनेक लोगों को महान बनाया है|

आत्मविश्वास यानी आत्मा पर विश्वास|

धर्म उसी को आस्तिक मानता है जिसके अंदर आत्मा का विश्वास है|

ये विश्वास “मैं” में घिरे हुए व्यक्ति को नहीं मिल सकता|

यदि आप खुद को परमात्मा से अलग मानते हैं अपने मैं को ही एकमात्र सत्ता मानते हैं तो आपके अंदर आत्मविश्वास नहीं आएगा|

आत्मविश्वास तो तब आएगा जब आप इस पूरे संसार को मैं मानेंगे|  आप मानेंगे कि आप उसी परमपिता परमात्मा की संतान है जिसने पूरी धरती पूरा जगत पैदा किया|  जब आपके अंदर ये विश्वास होगा कि मेरे अंदर वो और उसके अंदर मैं हूँ, तभी आपको सच्चा आत्मविश्वास मिलेगा|

यदि खुद को उस अपार पर ब्रह्म परमात्मा का अंश भी मानने में कामयाबी हासिल कर ली|  तो एक पल में हम कहां से कहां पहुंच जाते हैं|

क्षुद्रता विराट में मिल जाती है|

स्वामी विवेकानंद कहते हैं

आत्मा वा अरे श्रोतव्य :  आत्मा के बारे में पहले सुनो,  दिन-रात सोचो कि तुम वही आत्मा हो,  दिन-रात यही भाव अपने अंदर व्याप्त करो|

यहां तक कि वो भाव तुम्हारे रक्त की प्रत्येक बूँद और नस-नस में न समा जाए|

अपने पूरे शरीर को इस भाव से भर दो मैं अज, अविनाशी, आनंदमय, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, नित्य, ज्योतिर्मय, आत्मा हूँ| दिन-रात यही चिंतन करो|

जब तक ये भाव तुम्हारे जीवन का अवक्षेय अंग ना बन जाए|

वेद और वेदांत बार-बार यही बताते हैं कि अपने आप को  बार-बार याद दिलाओ कि मैं आत्मा हूँ|

बाहर से कभी भी प्रार्थनाओं का उत्तर नहीं मिलता उत्तर हमें अपने अंदर से ही मिलता है|

धर्म ने जो कहा आज वही विज्ञान कह रहा है|  विज्ञान भी तो यही कह रहा है कि पूरा जगत एक है|  हम सब एक दूसरे से कनेक्टेड है|  और हम सब के अंदर का मूल कण एक ही है|

हम सब इस भाव से न सिर्फ खुद को भरें बल्कि बार-बार दूसरों को भी उसके आत्मविश्वास से जोड़ने की कोशिश करें|

धर्म कहता है कि हे सर्वशक्तिमान उठो जागृत हो और अपना स्वरूप प्रकाशित करो|

धर्म को प्रैक्टिकली अपनाना कठिन नहीं है|

आत्मविश्वास के बाद धर्म की दूसरी शिक्षा है प्रेम की|  जब सब कुछ एक ही है तो किस से घृणा, किस से नफरत, जब सब आपस में जुड़े ही है तो फिर उस सत्य स्वरूप प्रेम से ही सबको देखो| उसी को अभिव्यक्त करो|

इसी प्रेम से हम अपने वास्तविक स्वरूप से जुड़ते हैं|

धर्म सिर्फ एकत्व की शिक्षा देता है| अपने अंदर जितना एकत्व को महसूस करोगे उतना ही प्रेम बढ़ेगा| उतना ही आत्मविश्वास बढ़ेगा| प्रेम और आत्मविश्वास  मिलकर हमारे अंदर की शक्ति को जागृत करेंगे|

धर्म जिस आत्मा की बात करता है वो कोई अज्ञात तत्व नहीं है|

जिसको ज्ञान होता है वो कौन है?

जिसको ये पता चलता है कि ये मैं हूं वो कौन है?

और आत्मा गायब हो जाए तो क्या ये शरीर बता सकता है कि मेरा नाम फला फला है|

बुद्धि से आत्मा नहीं दिखेगी आत्मा को देखना है तो भावना को प्रबल करना पड़ेगा|

हम ईश्वर को इतिहास के पात्रों में ढूंढते हैं|  हम उसे खोजते हैं  हजारों साल पहले पैदा हुए उन लोगों में जिन्होंने ईश्वरत्व का श्रेष्ठ प्रमाण दिया था|

लेकिन ईश्वर सिर्फ पास्ट की विषय वस्तु नहीं है| ईश्वर भूत नहीं है जो सिर्फ अतीत में प्रकट होता था| ईश्वर तो वर्तमान है जो हर काल में, हर क्षण में, हर व्यक्ति के अंदर प्रकट होता है, और उसी की वजह से ये जगत जीवित दिखाई देता है|

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