धर्म साधना और आडम्बर

धर्म साधना और आडम्बर

DhramSkhisha-Newspuran

कई प्रकार की भ्रामिक स्थितियों का निर्माण हो गया है,कई प्रकार के आडंबर हैं और सत्य कहे तो सारा जगत आडंबर में ही जीवन जी रहा है। बात कड़वी मगर सकते हैं।

परमहंस योगानंद प्रिय एक बात बताएं, मंदिरों में आप जाती है? कभी आप जाए तो देखें कि अपराहन के काल में मंदिरों के पट बंद कर दिए जाते हैं, ईश्वर के विश्राम करने का काल है, नारियों को मंदिरों में प्रवेश नहीं करवाने दिया जाता है, नारी अशुद्ध होती है।

प्रिय जिस जननी ने जगत के पुरुष जने, पीर पैगंबर अवतार जने वह अशुद्ध कहां से हो गई? जिस महापुरुष के दर्शन करने के लिए जन जा रहे हैं और उस महापुरुष के दर्शनों के लिए हम सत्य कह रहे हैं अविका एक नारी को आप वहां तक नहीं जाने देते तो क्या वह महापुरुष गगन से प्रकट हुए हैं?

प्रिय उन्होंने भी तो किसी माता की कोख का ही तो सहारा लिया होगा तभी तो धरा पर आए, तो जब आप उस नारी को अशुद्ध मानकर उस महापुरुष के दर्शन नहीं करने देते तो इसका अर्थ यह हुआ उस नारी से उत्पन्न वह पुरुष महापुरुष जिसके आप दर्शन कर रहे हैं वह भी अशुद्ध है क्योंकि प्रकट तो वह भी नारी की कोख से ही हुए हैं, क्या यह मिथ्या वचन है प्रिय?

ईश्वर के दरबार के पट बंद होते हैं यह विश्रांत का हाल है विश्राम काल है प्रिय सारे जगत का संचालन करने वाला विश्राम करेगा कैसे?

इस पर दृश्य निष्क्षेप करने की आवश्यकता है दृष्टि डालने की आवश्यकता है।प्रिय बेटी ईश्वर के प्रति विश्वास ने आज अंधविश्वास का स्वरूप गढ़ लिया है। भौतिकता, हम फिर से अपनी बात पर आ जाए भौतिकता का होना आवश्यक किस लिए, अगर स्थूल देह नहीं होंगी तो आपका कारण जागृत होकर के सूक्ष्म की ओर बढ़ेगा कैसे? कारण का स्वयं कोई शरीर नहीं होता प्रिय वह ज्योति स्वरूप आत्मा है किंतु तपोबल करने के लिए उसे देह की आवश्यकता पड़ती है। उसे हाथ और पैर चाहिए प्राणायाम आसन नियम संयम आदि सब गुणों का पालन करने के लिए उसे शरीर की आवश्यकता पड़ेगी और शरीर कौन स्थूल देह होंगी।

स्थूल शरीर है, वह पुरुषार्थ करने का सामर्थ स्थूल दे देता है तो फिर बाह्य जगत का आज हमारा मानव समाज भौतिक जगत की वस्तुओं को इतना हीन क्यों मानता है क्या हम गलत कह रहे हैं? हीन तो मानता है प्रिय, यह देखो... इनकी दृष्टि देह पर जाती है यह देखो...

भौतिकता में ही फंसे हैं यह देखो.... तो भौतिकता में फंसे नहीं है। भौतिकता तो हमने ग्रहण ही किए हैं, भौतिक शरीर तो हमें ईश्वर से ही मिला है और आपको धन्यवाद करना चाहिए अपने ईश्वर का कि आपको मानव देह प्राप्त हुई।दूसरी योनीयां तरसती है कि मानव देह प्राप्त हो और हम ईश्वर तक जाने का कोई साधन कर ले, आपको प्राप्त हो गई तो आप तो भाग्यशाली है प्रिय, क्योंकि यह शरीर ही आपको वह पुरुषार्थ प्रदान करता है कि आप ईश्वर तक जाएं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हुआ प्रिय कि संपूर्णतया आप भौतिकता में ही फंस जाए।

हमने कहा दस प्रतिशत भौतिकता नब्बे प्रतिशत आध्यात्मिकता।किसी भी चीज की अति विनाश का ही कारण बनती है इसीलिए सभी में सामंजस्यता का होना तालमेल का होना अत्यंत आवश्यक है प्रिय।प्रिय बिटिया सामंजस्य होगा तो आप देखेंगे तराजू के तौल में सभी सम गए।प्रिय यही ब्रह्म ज्ञान है स्वयं को जान लें तो ब्रह्मा को जानना सरल हो जाएगा क्योंकि ब्रह्म तो आपने सभी में है कण कण में है।

अविका


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