धर्माधर्म प्रत्यक्ष प्रमाण गम्य नहीं है

धर्माधर्म प्रत्यक्ष प्रमाण गम्य नहीं है

नेत्र आदि प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा रूप आदि स्व-स्व लौकिक विषयोंका ही प्रत्यक्ष हो सकता है, रूपादिसे रहित होनेके कारण अलौकिक धर्माधर्मका नहीं। पशु-पक्षी आदि रूपवान् पदार्थोंकी गतिका प्रत्यक्ष नेत्रसे होता है, ऐसा लोकव्यवहारमें माना जाता है।


दर्शन मर्मज्ञों का तो कहना है कि रूपरहित होने के कारण नेत्र द्वारा गति का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता। इसका अनुभव प्रयोग के द्वारा भी कराया जा सकता है। घड़ी की घंटेवाली सूईकी गति अतिमन्द होने के कारण पूर्ण सावधानी से देखने पर भी नेत्रद्वारा गृहीत नहीं होती है पंखे आदि यन्त्रों की अतितीव्र गतिका भी प्रत्यक्ष नहीं होता। अत: अतितीव्र तथा अति मन्द गति का प्रत्यक्ष नहीं होता, इसमें किसी को विवाद नहीं हो सकता। मध्यम गति का प्रत्यक्ष नहीं होता है, इस बात का अनुभव करने के लिये एक नये स्वच्छ विद्युत्मापक यन्र (मीटर)-को लीजिये, एक छोटे पावर के बल्ब को जलाकर मंत्र से दर खड़े होकर पूर्ण मनोयोग से देखने पर भी आपको यन्त्रकी गतिका प्रत्यक्ष नहीं होगा, किंतु जब काला या लाल चिल आयेगा तब आपको गति का प्रत्यक्ष अवश्य होगा।

अब यहाँ यह विचार कीजिये कि यदि वह मध्यम गति प्रत्यक्ष के योग्य नहीं थी तो काला निशान आने पर उस मध्यम गतिका 12 प्रत्यक्ष कैसे हुआ? और यदि वह प्रत्यक्ष-योग्य थी तो उसका पहले प्रत्यक्ष क्यों नहीं हुआ? तब आपको उक्त अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा यह ज्ञान हो जायगा कि नेत्र तो वस्तुत: पदार्थके रूपमात्रको ग्रहण करनेमें ही समर्थ हैं, नेत्र तो काले निशान के भिन्न-भिन्न स्थान-स्थित चित्रों का ही ग्रहण करते हैं, नेत्र के पीछे लगी हुई बुद्धि ही भिन्न भिन्न स्थानों की तारतम्यता पर विचार कर गतिका निर्णय देती है। नेत्रद्वारा चित्रों का ग्रहण और नेत्र के पीछे लगी हुई बुद्धि द्वारा गतिका निर्णय अति सूक्ष्मता से होने के कारण हम ऐसा समझते हैं कि नेत्रद्वारा गति का प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है यह बात श्रोत्र आदि अन्य इन्द्रियों द्वारा गृहीत स्व-स्व विषयोंकी गति-मन्दता, उत्कृष्टता आज के बारे में भी समझ लेनी चाहिये।

उक्त विचार से यह स्पष्ट निर्णय हो जाता है कि जब रूपरहित लौकिक गति आदिका ही नेत्र आदि प्रत्यक्ष प्रमाणों द्वारा प्रत्यक्ष नहीं होता तब रूपादिहीन अलौकिक धर्माधर्मका नेत्रादिद्वारा प्रत्यक्ष न हो तो इसमें कहना ही क्या है? यहाँ यह भी ध्यानमें रख लेना चाहिये कि भौतिक विज्ञान के चित्र भी नेत्र आदि इन्द्रियों के विषयों को ही लघु-विशाल, सूक्ष्म-स्थूल, विशद-अविशद रूपोंमें दिखा सकते हैं, अतः भौतिक विज्ञान के यंत्रों द्वारा भी लौकिक गति तथा अलौकिक धर्माधर्मका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता।


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