छोटी-छोटी चीज़ों में धर्म निहित.. दिनेश मालवीय


स्टोरी हाइलाइट्स

धर्म की बहुत तरह से व्याख्या की जाती रही है. यह इतना व्यापक विषय है कि, इसे किसी भी परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता...

छोटी-छोटी चीज़ों में धर्म निहित.. दिनेश मालवीय   धर्म की बहुत तरह से व्याख्या की जाती रही है. यह इतना व्यापक विषय है कि, इसे किसी भी परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता. इसका रहस्य इतना सूक्ष्म है कि, बड़े से बड़े ज्ञानीजन भी इसे लेकर भ्रमित हो जाते हैं. कोई लोग पूजा-पाठ, प्रार्थना, ध्यान, योग, आदि को ही धर्म समझने लगते हैं, लेकिन ये धर्म नहीं, धर्म की भावभूमि में पहुँचने के सहायक मात्र हैं. धर्म बहुत छोटी-छोटी बातों में निहित है. धर्म की बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग, व्यवहारिक जीवन में सच्चे अर्थों में धार्मिक नहीं हो पाते. हम जीवन में हर दिन बहुत-सी ऎसी बातें और ऐसे कार्य करते हैं, जिन्हें हम धर्म का कार्य समझते हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता. दान को धर्म का बहुत महत्वपूर्ण अंग माना गया है. दान देने वाला सचमुच बहुत महान होता है. लेकिन दान किसे, कैसे और कब देना चाहिए, इस सम्बन्ध में शास्त्रों ने कुछ निर्देश दिए हैं. दान के विषय में जो सबसे महत्वपूर्ण निर्देश दिया गया है, वह यह है कि, इसकी चर्चा किसीसे नहीं करनी चाहिए. इस सम्बन्ध में भारत में एक  बहुत सुंदर प्रसंग ध्यान पढ़ा था.   जमशेदजी मेहता कराची के बहुत बड़े सेठ थे. उन्हें खुद भी पता नहीं था कि, वह कितने धनवान हैं. धन कभी उनके सिर पर नहीं चढ़ा, यानी उन्हें कभी उसका अभिमान नीं हुआ.  एक बार कराची में एक अस्पताल का निर्माण किया जा रहा था. लोग जमशेदजी से चन्दा माँगने पहुंचे. उन्होंने बताया कि यदि आप दस हज़ार रूपये का चन्दा देंगे, तो अस्पताल में उनके नाम की पट्टी अस्पताल के मुख्य द्वार पर लगायी जाएगी. इसी कारण बहुत से लोगों ने दस हज़ार रूपये का चन्दा दिया है. आप भी इतनी राशि देंगे तो आपके नाम की पट्टिका भी लगाई जाएगी. जमशेदजी ने अपने मुनीम को बुलाकर दस हज़ार रूपये से चालीस रूपये कम देने का निर्देश दिया. मुनीम ने कहा कि जब इतनी बड़ी रकम दे ही रहे हैं, तो चालीस रूपये क्यों कम कर रहे हैं. जमशेदजी ने कहा कि, मैं अस्पताल में अपने नाम की पत्तिकान्हीं लगवाना चाहता.मैं मानवता की सेवा के लये दान दे रहा हूँ, अपना नाम कमाने के लिए नहीं. जमशेदजी की बात में धर्म का मर्म छिपा है. दान को गुप्त रखने से ही मतलब नहीं, यह बात बहुत छोटी-छोटी बातों पर लागू होती है. रसखान ने एक जगह लिखा है कि, दान देते समय आपकी नज़र नीची होनी चाहिए, ताकि पाने वाला अपने को छोटा महसूस नहीं करे. उनका बहुत प्रसिद्ध दोहा है-   देनहार कोई और है भेजत सो दिन रेन लोग भरम हम पै धरें याते नीचे नैन   धर्म वास्तव में एक आंतरिक अनुशासन है. कोई किसी भी धर्म को मानता हो, लेकिन यदि वह आंतरिक अनुशासन का पालन नहीं करता तो वह धार्मिक हो ही नहीं सकता. ज्यादातर लोग बहुत गलत बातों को धर्म मान बैठते हैं. इनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं होता. एक संत से कभी एक किस्सा सुना था. ऊंची कही जाने वाली जाति का एक आदमी मरने वाला था. उसने अपने जीवन में शायद ही कोई ऐसा बुरा काम हो, जो नहीं किया होगा. उसने जीवनभर अनगिनत लोगों का दिल दुखाकर धन बटोरा. व्यभिचार के मामले में तो उसकी बराबरी का आदमी पूरे शहर में नहीं था. जब वह मरने वाला था तो, उससे पूछा गया कि, आपने जीवन में क्या कभी कोई धर्म का काम किया है. वह बहुत शान से बोला कि, सब कुछ करने के बाद भी मैंने एक बहुत बड़ा  धर्म का काम किया है. लोगों  की  उत्सुकता जागी. उसने  कहा कि,मैंने कभी किसी छोटी जाति के व्यक्ति का छुआ पानी नहीं पिया. ऐसी-ऎसी बातों को लोग धार्मिकता समझकर  अपना पूरा जीवन निरर्थक ही बिता देते हैं. स्वामी विवेकानंद ने अपने विदेश प्रवास के दौरान अपने गुरु भाइयों और शिष्यों को जो पात्र लिखे हैं, “पत्रावली” के रूप में प्रकाशित हैं. इन पत्रों में उन्होंने इस सम्बन्ध में लोगों को ख़ूब लताड़ा है. उन्होंने कहा कि, भारत में अब सारा धर्म चौके-चूल्हे और छूआछूत तक ही सिमट कर रह गया है.       यदि आप अपने काम को ईमानदारी  से नहीं करते, तो आप धार्मिक हो ही नहीं सकते. भले ही आप सुबह-शाम घंटों तक पूजन करते हों, लेकिन यदि आपके व्यवहार और आचरण में पवित्रता और ईमानदारी नहीं हो, तो यह धार्मिकता नहीं है. यदि आप अपनी वाणी से भी किसीका मन दुखाते हैं या उसका अपमान करते हैं, तो  आप धार्मिक हो ही नहीं सकते. इस विषय में स्वामी विवेकानंद की पुस्तक “व्यावहारिक जीवन में वेदांत” बहुत मार्गदर्शक सिद्ध हो  सकती है. हमेशा दूसरों में दोष और कमियां और खुद में खूबियाँ देखने की आदत भी आपको धार्मिक नहीं बनने देती. यदि आप बस में बैठकर जा रहे हैं और आपके पास ही कोई बुजुर्ग या अशक्त व्यक्ति खड़े होकर यात्रा कर रहा हो, तो आप उसे अपने पास जगह नहीं देते या उसके लिए अपनी सीट नहीं छोड़ देते, तो यह धर्म के विरुद्ध है. कार्यालय में देर से जाते हैं, काम करने में टालामटोली करते हैं या जानबूझकर काम में देरी करते हैं, तो आपका सारा धार्मिक कर्मकाण्ड व्यर्थ ही सिद्ध होगा. यदि आप घर में अपने माता-पिता या बुजुर्गों का ख्याल नहीं रखते तो आप धार्मिक नहीं हो सकते. बच्चों और पत्नी के प्रति आपके जो कर्तव्य हैं, उनका पालन नहीं करते तो आप धार्मिक नहीं  हैं. यदि आप झूठ बोलते हैं या किसीकी कोई चीज लेकर उसे लौटाते नहीं हैं, तो आप धार्मिक नहीं हो सकते. इस तरह के आंतरिक अनुशासन का पालन ही धर्म है. सिर्फ कर्मकाण्ड या पूजा-पाठ से लाभ तभी होगा, जब आप इस अनुशासन का पालन करें.