धर्म का प्रारंभ भय से नही गंभीर चिंतन से हुआ …

धर्म का प्रारंभ भय से नही गंभीर चिंतन से हुआ …

सभ्यता के आदिकाल से ही संसार के प्राय: सभी सभ्य देशो में धर्म की चर्चा होती रही है। सभ्य ही क्या, सभ्य समाज में भी बिना धर्म के तात्पर्य को ठीक तरह हृदयंगम किये, धर्म और उसके कृत्यों का किसी-न-किसी रूप में प्रचलन रहा है। अनेक देशों में धर्म के साथ दर्शन जुड़ गया है किन्तु कई जगह वह अपने तक ही सीमित रहा है। वहाँ पूजोपासना या अन्य सम्बन्धित कर्मकाण्डों के अतिरिक्त कोई गम्भीर चिन्तन उसके साथ न जुड़ पाया। धर्म का प्रारंभ भय से हुआ अथवा किसी गंभीर चिंतन से, इस विषय पर विवाद हो सकता है। किन्तु यह निर्विवाद है कि उसके मूल में श्रद्धा रही है। धीरे-धीरे कई समाजों में धर्म ने सम्प्रदायों का रूप ले लिया और इस प्रकार वह अनेक खण्डों में विभक्त हो गया। दर्शन की भी यही स्थिति हुई। एक विषय पर भिन्न-भिन्न चिन्तकों ने परस्पर विरोधी मत प्रकट किये। 

किन्तु धार्मिक और दार्शनिक सम्प्रदायों में एक मूलभूत अन्तर यह था (और भारत में यह बात सर्वाधिक रूप में पनपी) कि विभिन्न दार्शनिक मतों के प्रवर्तक एक ही धर्म के अनुयायी थे और इसी प्रकार अनेक धर्माचार्यों में भी किसी विशेष दार्शनिक तथ्य के सम्बन्ध में एक मत था। कई देशों में ऐसा न हुआ। वहाँ धर्म दर्शन से पूर्णतः असंपृक्त बना रहा। इसलिए जब धर्म के पृथक-पृथक सम्प्रदाय बने तो उनमें स्पर्धा बढ़ी और धीरे-धीरे वह स्पर्धा विद्वेष में परिणत हो गई। फलत: एक धार्मिक सम्प्रदाय ने दूसरे का दमन किया और राजकीय शक्ति के सहारे उसने स्वयं को शेष समाज पर चाहे या अनचाहे, थोपने का प्रयास किया।

यूरोप में ऐसा ही हुआ। मध्यपूर्व देशों की भी गाथा यही है। सौभाग्यवश भारत में ऐसा नहीं हुआ। साँची, विदिशा, खजुराहो आदि के अवशेष इस बात के साक्षी हैं कि परस्पर स्पर्धी या विपरीत होते हुये भी वैदिक, बौद्ध एवं जैन दर्शनों ने एक दूसरे की धार्मिक भावना का सम्मान किया। उनके अनुयायियों ने एक दूसरे के धार्मिक स्थानों, मन्दिरों, विद्यालयों को दान दिये, भले ही दार्शनिक क्षेत्र में वे एक-दूसरे के कटु आलोचक रहे हों।

यूरोपीय धार्मिक सम्प्रदायों और भारत में प्रविष्ट आक्रान्ताओं की धर्मान्धता एवं उससे उत्पन्न परिणामों को देखकर अनेक लोगों ने धर्म का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया। वे धर्म को परस्पर लड़ाने वाली वस्तु कहने लगे। कुछ लोगों ने उसकी उपमा अफीम से दी है। अनेक लोगों ने धर्म की खिल्ली उड़ायी । 

उन्नीसवी और बीसवी शताब्दी में जितना धर्म के विरुद्ध कहा गया है, उतना उसके पक्ष में नहीं। धार्मिक आचार्यों के अधिकारों में भी कमी कर दी गयी। विश्व का जनमत धर्म के प्रति विशेष आकृष्ट नहीं है। शिक्षित और सांस्कृतिक समाज के विद्वानों के विषय में तो यह बात और अधिकारपूर्वक कही जा सकती है। इतना होने पर भी विश्व का अधिकाँश जनमत किसी-न-किसी रूप में धर्म से आबद्ध है। धर्म के संकीर्ण स्वरूप के स्थान पर उदारता को स्थान दिया जा रहा है। विश्व के चिंतन एक दूसरे को अधिक समीप लाने का प्रयल कर रहे हैं। भारत में भी महात्मा गांधी के प्रयलों के फलस्वरूप एक धर्म में दूसरे धर्म के प्रति आदर-भाव बढ़ा है।

वैज्ञानिक आविष्कारों, उद्योग-धंधों के विकास, यातायात की सुविधा आदि के कारण भी विश्व के अनेक धर्म एक-दूसरे के अधिक समीप आ गये हैं और एक धर्म अनुयायी अन्य धर्मानुयायियों की बात अधिक सहिष्णुता से सुनने लगा है । भारत में भी धर्म की कल्पना यूरोप से सर्वथा भिन्न थी । यहाँ धर्म कर्मकाण्डों से सम्बन्धित न था अपितु कर्मकाण्ड और अनुष्ठान धर्म के लिए साधनमात्र थे। 

धर्म का लक्ष्य था – अभ्युदय और नि:श्रेयष की सिद्धि, जिसके भीतर लौकिक और अलौकिक दोनों प्रकार के कल्याणों का समावेश हो जाता है। मनु ने धर्म की जो परिभाषा दी है, उसके अन्तर्गत निर्दिष्ट तत्व सामाजिक कल्याण एवं प्रगति के लिए अपरिहार्य है । मनुस्मृति आदि महत्वपूर्ण ग्रन्थों में सामाजिक और व्यावहारिक नियमों एवं कर्तव्यों के अर्थ में धर्म शब्द का प्रयोग हुआ है। चाहे सामाजिक विधियाँ हों या व्यक्तिगत जीवन के नियम, सभी कुछ धर्म के क्षेत्र के भीतर आ जाता है। वस्तुतः भारतीय जीवन के प्रत्येक अंग पर किसी न किसी रूप में धर्म का प्रभाव देखा जा सकता है किन्तु यह धर्म अपने संकुचित अर्थ से सर्वथा भिन्न है। यह अंग्रेजी रिलीजन का अनुवाद नहीं है। रिलीजन का अर्थ बड़ा संकुचित है जबकि भारतीय धर्म-समस्त जीवन-पद्धति को आत्मसात् कर लेने वाला व्यापक शब्द। ऐसा धर्म और दर्शन किसी भी शिक्षण-प्रणाली का अनिवार्य अंग हो सकता है। 


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