ऋषि शाण्डिल्य -दिनेश मालवीय

ऋषि शाण्डिल्य

-दिनेश मालवीय

यह महान ऋषि कश्यप वंश के महर्षि देवल के पुत्र थे. यह रघुवंश के राजा दिलीप के पुरोहित थे. इन्होंने एक प्रसिद्ध संहिता की भी रचना की. यह शातानीक के पुत्रकामेष्टी यज्ञ में प्रधान ऋत्विक थे. ऋषि शाण्डिल्य ने प्रभास क्षेत्र में शिवलिंग स्थापित कर दिव्य सौ वर्ष तक कठोर तपस्या और भक्ति की. भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर इन्हें तत्वज्ञान, भगवतभक्ति और अष्टसिद्धियों का वरदान दिया.

‘छांदोग्य उपनिषद’ और ‘वृहदारण्यक उपनिषद’ में शाण्डिल्य के प्रसंग हैं. ‘पंचरात्र’ की परम्परा में शाण्डिल्य को प्रामाणिक आचार्य माना गया है.

विश्वामित्र ऋषि जब राजा त्रिशंकु से यज्ञ करवा रहे थे, तब शाण्डिल्यजी होता के रूप में वहाँ उपस्थित थे. भीष्म की शरशय्या पर भी इनकी उपस्थिति का उल्लेख मिलता है. इनके बारह पुत्र थे, जिनमें से शंख और लिखित नामक पुत्रो ने धर्मस्मृतियों की रचना की.

ऋषि शाण्डिल्य ने श्रुतियों और गीता का भक्तिपरक तात्पर्य निर्णय करने के लिए एक छोटे लेकिन बहुत महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘भक्तिसूत्र’ और “शाण्डिल्य संहिता’ का प्रणयन किया. हेमाद्रि के ‘लक्षण प्रकाश’ में उन्हें आयुर्वेदाचार्य कहा गया है.

शाण्डिल्यजी के अनुसार जीवों का ब्रह्म भाव में डूब जाना ही मुक्ति है. जीव ब्रह्म से बहुत अभिन्न है. उनका आवागमन स्वाभाविक नहीं है, लेकिन जपाकुसुम के सान्निध्य से स्फटिक मणि की लालिमा की तरह अंत:काकरण की उपाधि से ही होगा है. जिस प्रकार जपाकुसुम के सान्निध्य में रहते लालिमा की निवृत्ति नहीं हो सकती, वैसे ही जब तक अंत:करण है, तब तक आवागमन से नहीं बचा जा सकता. ईश्वर की प्राप्ति के लिए भक्ति से बेहतर कोई उपाय नहीं है.

भक्ति से त्रिगुणात्मक अंत:करण का लय हो जाता है और ब्रह्मानंद का प्रकाश हो जाता है. इससे आत्मज्ञान भी व्यर्थ नहीं होता, क्योंकि अश्रद्धा रूपी मल को दूर करने के लिए ज्ञान की आवश्यकता है. गीता में अनेक बार भक्ति के साधन के रूप में ज्ञान चर्चा आती है. भक्त का लक्षण ईश्वर में परम अनुराग है. इससे जीव भगवन्मय हो जाता है.

इस प्रकार महर्षि शाण्डिल्य ने भगवत्भक्ति की उपयोगिता और ज्ञान की अपेक्षा भक्ति की श्रेष्ठता सिद्ध की है. भक्ति के प्रकार, उसके साधन और उसके विघ्नों की निवृत्ति आदी का उन्होंने बहुत स्पष्ट दार्शनिक विवेचन किया है. भगवान के भक्तों को इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिए.

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