ऋषि परम्परा- 2

ऋषि परम्परा- 2

सप्तर्षि

सनातन धर्म के अनुसार हर मनवंतर में धर्म और मर्यादा की रक्षा और उनकी दीक्षा के लिए सात ऋषियों का आविर्भाव होता है. इन्हें ही सप्तर्षि कहते हैं. उनके तप, शक्ति और ज्ञान के प्रभाव से संसार में सुख और शान्ति सुख और शान्ति रहती है. हरिवंश पुराण, विष्णु पुराण, पद्म पुराण, मत्स्य पुराण आदि के अनुसार स्वायम्भुव मनवंतर में और कुछ मतों के अनुसार वैवस्वत मनवंतर में भी सात ऋषि होते हैं. वे हमेशा ध्रुव की परिक्रमा करते हुए विश्व का धारण-पोषण करते हैं. ये ऋषि हैं-मरीचि, अत्रि, अंगीरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ट.

आइये ऋषियों का संक्षेप में परिचय प्राप्त करते हैं.

 मारीचि
यह ब्रह्माजी के मानसपुत्र और एक प्रधान प्रजापति हैं. इन्हें द्वितीय ब्रह्म भी कहा गया है. वे हमेशा ब्रह्मा की तरह श्रृष्टिकार्य में लगे रहते हैं. कभी-कभी इन्द्रसभा में उपस्थित होकर दण्डनीति का मंत्रित्व की करते हैं.पुराणों में इनकी अनेक पत्नियों का वर्णन मिलता है, जिनमें एक तो दक्षप्रजापति की पुत्री सम्भोती और दूसरी एक ब्राह्मण की पुत्री धर्मव्रताहै. इनके अनेक पुत्र हैं, जिनमें कश्यप और मनु शामिल हैं. इन्हीं की वंश-परम्परा से यह सारा जगत परिपूर्ण और सुरक्षित है. इन्हें भगवान का अंशावतार कहा जाता है.

मरीचि में भगवान की पालनशक्ति का प्रकाश हुआ. ब्रह्मा ने इन्हें पद्म पुराण के कुछ अंश सुनाये. जैसे ब्रह्मा के पुत्रों में सनकादि निवृतिपरायण हैं, वैसे ही मरीचि आदि प्रव्रत्तिपरायण हैं. इन्होंने ही भृगु को  दण्डनीति की शिक्षा दी है. ये सुमेरु के एक शिखर पर निवास करते हैं. महाभारत में इन्हें चित्रशिखण्डी कहा गया है. ब्रह्मा ने पुष्कर क्षेत्र में जो यज्ञ किया था, उसमें ये अच्छावाक पद पर नियुक्त हुए थे. दस हजार श्लोकों से युक्त ब्रह्म पुराण का दान पहले ब्रह्मा ने इन्हीं को किया था. वेदों में भी इनकी बहुत चर्चा है और प्राय: सभी पुराणों में इनके चरित्र का उल्लेख मिलता है.

                                      मारीचि

अत्रि 
ये भी ब्रह्मा के मानसपुत्र और प्रजापति हैं. ये दक्षिण दिशा में रहते हैं. इनकी पत्नी अनसूया कपिल की बहन हैं. महर्षि अत्रि अपने नाम के अनुसार गुणातीत हैं. इस दम्पती को जब ब्रहमाजी ने श्रष्टि करने की आज्ञा दी तो इन्होंने इसके पहले तपस्या करने का विचार किया और कठिन तपस्या की. इनके तप का लक्ष्य ईश्वर के दर्शन करना था. इनकी श्रधा के साथ की हुयी दीर्घ साधना से भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्मा इनके सामने प्रकट हुए. दोनों पति-पत्नी ध्यान में इतने लीन थे कि उन्हें इन त्रिदेवों के आने का पता ही नहीं चला. उन्होंने इन्हें जगाया और वरदान माँगने को कहा. इन्होंने तीनों देवों को पुत्र रूप में माँगा . तीनों देवों ने इसी वरदान के फलस्वरूप उनके पुत्रों के रूप में अवतार लिया.विष्णु के अंश से दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा और शंकर के अंश से दुर्वासा का जन्म हुआ.

ऐसी भी कथा मिलती है कि महर्षि अत्रि ब्रह्मा के नेत्र से प्रकट हुए थे और अनसूया दक्ष प्रजापति की कन्या थीं. इन्होंने अनेक बार बड़ी-बड़ी आपत्तियों से जगत की रक्षा की है. एक बार पुरानी शत्रुता के कारण सूर्य पर राहु ने आक्रमण कर दिया और सूर्य अपने स्थान से च्युत होकर गिर पड़े. उस समय महर्षि अत्रि के तपोबल और शुभ संकल्प से उनकी रक्षा हुयी और जगत जीवन और प्रकाश से शून्य होते-होते बचा. महर्षि अत्रि की चर्चा वेदों में भी आती है. इनकी दृष्टि इतनी शीतल और अमृतमयी है कि वह चंद्रमा के रूप में आज भी जगत को शीतलता, अमृत और शान्ति प्रदान कर रही है. धर्मशास्त्रों में ‘अत्रिसन्हिता’ एक प्रधान स्मृति है जो हमें कर्तव्यों का निर्णय करने में बहुत सहायक है.
                                      अत्रि 

अंगिरा 
यह भी ब्रह्मा के मानसपुत्र और प्रजापति हैं. इनकी तपस्या और उपासना इनती कठोर थी कि इनका तेज और प्रभाव अग्नि की अपेक्षा से अधिक बढ़ गया. उस समय अग्निदेव ने देखा कि अंगिरा के तपोबल के सामने मेरी तपस्या और प्रतिष्ठा फीकी हो रही है, तब वह ग्लानि के साथ उनके पास आये और अपने कल्याण की प्रार्थना की. इस पर महर्षि अंगिरा ने कहा कि आप अग्नि के रूप में देवताओं को भोजन पहुंचायें और स्वर्ग चाहने वालों को मार्ग बताएं. मैं आपको पुत्र रूप में वरण करता हूँ. अग्निदेव ने बहुत प्रसन्नता के साथ उनकी बात मानी और बृहस्पति नाम से उनके पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हुए.

अंगिरा की पत्नी दक्ष प्रजापति की पुत्री स्मृति थीं जिनसे अनेक पुत्र और कन्याएं उत्पन्न हुयीं.शिव पुराण में कथा आती है कि युग-युग में भगवान शिव व्यासावतार ग्रहण करते हैं. उनमें वाराह्कल्प में वेदों के विभाजक, पुराणों के प्रदर्शक और ज्ञानमार्ग के उपदेष्ट अंगीरा ही व्यास थे. वाराह्कल्प के नवें द्वापर में महादेव ने ऋषभ नाम से अवतार ग्रहण किया. उस समय उनके पुत्र रूप में महर्षि अंगिरा थे. महर्षि अंगिरा ने एक स्मृति की भी रचना की, जिसमें धर्म-कर्म का बड़ा सुंदर निरूपण हुआ है.

संक्षेप में महर्षि अंगिरा सप्तर्षियों में एक के रूप में जगत को धारण करते हैं. वह ज्ञान, भक्ति और कर्म के विस्तार के द्वारा सुप्त जीवों को जाग्रत करके भगवान की ओर अग्रसर करते हैं.

                                    अंगिरा 


पुलस्त्य 
यह भी ब्रम्हा के मानसपुत्र हैं. ये भी अपनी तपस्या, ज्ञान और दैवी संपदाओं के माध्यम से जगत के कल्याण में संलग्न रहते हैं. इनका स्वभाव इतना दयालु है कि जब एक बार अपनी दुष्टता के कारण रावण को कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के यहाँ बंदी होना पड़ा, तब इन्होंने उससे उसे मुक्त करने का अनुरोध किया. उसने इनके अनुरोध को स्वीकार कर रावण को मुक्त कर दिया. इन्हीं की पत्नी हविर्भू से विश्र्वा हुए, जिनके पुत्र कुबेर, रावण आदि हुए. इनके पुत्र दत्तोली ही स्वायम्भु मनवंतर में ऋषि अगस्त्य हुए. ऋषि पुलस्त्य ने ही देवर्षि नारद को वामन पुराण की कथा नई. जब पराशर क्रोध में राक्षसों के नाश के लिए एक यज्ञ कर रहे थे तब वशिष्ट के परामर्श से पुलस्त्य का अनुरोध मानकर उन्होंने यज्ञ बंद कर दिया, जिससे पुलस्त्य ऊपर बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें शास्त्रों का पारदर्शी बना दिया. ऋषभ ने पुलस्त्य के आश्रम में रहकर ही तपस्या की थी. महाभारत और पुराणों में भी इनकी काफी चर्चा है.
                                      पुलस्त्य 

पुलह 
महर्षि पुलह भी ब्रह्मा के मानसपुत्र और सोलह प्रजापतियों में एक हैं. ये भी अन्य ऋषियों की तरह जगत के हितसाधन में लगे रहते हैं. उन्होंने अपने पिता ब्रहामजी की आज्ञा से दक्ष प्रजापति और महर्षि कर्दम की कन्याओं को पत्नी रूप में ग्रहण कर श्रृष्टि की वृद्धि की. अनेक योनि और जातियों की संतान इनसे हुयीं. इन्होंने महर्षि सनंदन की शरण ग्रहण करके सम्प्रदाय की रक्षा करते हुए तत्त्वज्ञान का संपादन किया. फिर अपने शरणागत जिज्ञासु गौतम को उसका दान करके जगत में उसका विस्तार किया. जगत की आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक शान्ति के लिए ये निरंतर तपस्या में संलग्न रहते हैं. पुराणों में इनकी चर्चा भी अनेक स्थानों पर आती है.
                                     पुलह
क्रतु 
यह भी ब्रह्मा के मानसपुत्र और एक प्रजापति हैं. इन्होंने अपने पिता ब्रह्माजी की आज्ञा से कर्दम प्रजापति की पत्नी देवहूति से उत्पन्न क्रिया और दक्ष प्रजापति की सन्नति नाम की कन्या को पत्नी रूप में स्वीकार. उनके द्वारा बालखिल्य नाम के पुत्र हुए, जो भगवान सूर्य के रथ के आगे-आगे उनकी ओर मुंह करके स्तुति करते हुए चलते हैं. इन्हीं ब्रह्मर्षियों की महामहिम तपस्या की शक्ति ही सूर्य का धारण करती है.

महर्षि क्रतु ही वाराह्कल्प में वेदों के विभाजक, पुराणों के प्रदर्शक और ज्ञानोपदेष्टा व्यास हुए. पुराणों में इनकी चर्चा अनेक जगह मिलती है.

वशिष्ठ 
महर्षि वशिष्ठ की उत्पत्ति का वर्णन पुराणों में अलग-अलग रूप में आता है. ये कहीं  ब्रह्मा के मानसपुत्र, कहीं आग्नेय पुत्र और कहीं मित्रावरुण के पुत्र कहे गये हैं. कल्पभेद से ये सभी बातें सही हैं. महान तपस्वी वशिष्ठ के चरित्र से हमारे धर्मशास्त्र, इतिहास और पुराण भरे पड़े हैं. इनकी पत्नी देवी अरुंधती हैं, जो स्वयं भी महान तपस्विनी हैं. वह सप्तर्षिमण्डल के पास ही अपने पति की सेवा में संलग्न रहती हैं.

जब वशिष्ठ के पिता ब्रह्मा ने भूमण्डल में आकर सूर्यवंशी राजाओं का पुरोहित बनने को कहा, तब इन्होंने उस कार्य को बड़ी हिचकिचाहट प्रकट  करते हुए इसलिए स्वीकार किया कि इस वंश में आगे चलकर भगवान् श्रीराम का अवतार होगा. पुरोहिताई के कार्य को ब्राह्मण अच्छा नहीं मानते.

वशिष्ठजी ने हमेशा लोककल्याण के लिए कार्य किया. किसी भी प्राकृतिक आपदा आने पर उन्होंने अपने तपोबल से सबकी रक्षा की. इन्होंने इक्ष्वाकु और निमि से आने यज्ञ करवाए. अपने पूर्वजों के असफल होजाने से निराश भागीरथ ने उन्हीं की प्रेरणा से गंगा का अवतरण धरती पर करवाया. जब राजा दिलीप संतानहीन होने के कारण दुखी थे, तब इन्होंने अपनी गौ नंदिनी की सेवाविधि बताकर रघु जैसे योग्य पुत्र रत्न की प्राप्ति करवाई.

दशरथ के निराश होने पर वशिष्ठ ने ही उन्हें पुत्रकामेश्ठी यज्ञ करने की प्रेरणा दी. इस तरह एक पुरोहित के रूप में उन्होंने अपना पुरोहित जीवन सफल किया. उन्होंने श्रीराम को ‘योगवाशिष्ठ’ जैसे अपूर्व ज्ञानमय ग्रंथ का उपदेश दिया, जो परम लोक कल्याणकारी है.
                                     वशिष्ठ 


हमारे बारे में

न्‍यूज़ पुराण (PURAN MEDIA GROUP)एक कोशिश है सत्‍य को तथ्‍य के साथ रखने की | आपके जीवन में ज्ञान ,विज्ञान, प्रेरणा , धर्म और आध्‍यात्‍म के प्रकाश के विस्‍तार की |
News Puran is a humble attempt to present the truth with facts. To spread the light of knowledge, promote scientific temper, inspiration, religion and spirituality in your life.


संपर्क करें

0755-3550446 / 9685590481



न्‍यूज़ पुराण



समाचार पत्रिका


श्रेणियाँ