कर्नाटक में संत-परम्परा -दिनेश मालवीय

कर्नाटक में संत-परम्परा

-दिनेश मालवीय

दक्षिण भारत के इस प्रमुख प्रांत में भक्ति की दो धाराएँ प्रमुख रूप से प्रचलित हैं- वीरशैव संप्रदाय की शिव-भक्ति धारा और वैष्णव सम्प्रदाय की विष्णु-भक्ति धारा. रामानुजाचार्य चोल राजाओं के क्षेत्र तमिलनाडु को छोड़कर कर्नाटक के होयसल राजाओं के पास आ गये. उन्होंने मेलुकोट को अपना केंद्र बनाकर धार्मिक और सामाजिक सुधार का अभियान चलाया. इन दोनों सम्प्रदायों के संतों ने समाज में सुधार और भक्ति-भाव के प्रसार की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किये.

अल्लम प्रभु- यह बारहवीं शताब्दी में एक बहुत प्रतिभाशाली लिंगायत संत हुए, जिनके सामाजिक समरसता के प्रयासों को आज भी अनुकरणीय माना जाता है. उनका मानना था कि पूरी प्रकृति एकता और सामजंस्य के दर्शन से आनंद से अभिभूत है. ऊपर से अलग-अलग दिखने वाली चीजें भीतर से एक ही हैं. वह कहते हैं कि निर्विकार और निराकार ईश्वर सब जगह व्याप्त है. वह न यह है, न वह है; न सुख है, न दुःख है; न पुण्य है न पाप है; न प्रभु है न दास है; न कर्म है न कारण. इसलिए सभी समान हैं और समाज में किसी भी प्रकार का भेदभाव रखना उन्हें स्वीकार नहीं है. उनके प्रभाव से अन्य अनेक संतों ने भी आध्यात्मिक ऊँचाई प्राप्त की, जिनमें बसवणणा, अक्कमहादेवी और सिद्धराम सिद्ध योगी आदि शामिल हैं.

                                                अल्लम प्रभु

बसवेश्वर- इन्होंने अनेक विषयों का गहन अनुशीलन किया और राजा बिज्जल के मंत्री हो गये. उन्होंने नव समाज की रचना की दिशा में कार्य करने के लिए ‘अनुभव मण्डप’ के नाम से एक लोकतांत्रिक व्यवस्था बढाने वाला संगठन स्थापित किया. इसमें यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया कि जिस व्यक्ति को जितनी न्यूनतम आवशयकता है, उतना धन ले और शेष धन समाज की प्रगति में समर्पित करे. इस संगठन में अक्क महादेवी नाम कि एक योग्य संत कवयित्री भी थीं. इस संघ में सभी जातीय समाज के लोग थे, जिनमें आपस में कोई भेदभाव नहीं था. बसवेश्वर ने शारीरिक परिश्रम और जीवनयापन के लिए काम करने की आवश्यकता पर बल दिया.
                                                   बसवेश्वर

अक्क महादेवी- कन्नड़ साहित्य में अक्क देवी का बहुत ऊँचा स्थान है. वह भक्ति-ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी थीं. उन्होंने स्त्री जाग्रति की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया. कर्नाटक में उन्हें घर-घर में जाना जाता है. अक्क महादेवी ने चेन्नमल्लिकार्जुन (शिव) को ही अपना पति माना और उन्होंने लौकिक विवाह करने से मना कर दिया.उन्होंने घर-परिवार छोड़कर सारा जीवन जन-सेवा और शिव-भक्ति में समर्पित कर दिया. वह दिगंबर रहती थीं. इस कारण समाज में उनका कुछ विरोध भी हुआ, लेकिन उनकी पवित्रता और भक्ति इतनी उच्च कोटि की थी कि समाज उनके सामने नतमस्तक हो गया. उनके मन में जड़-चेतन, पशु-पक्षी वन-पर्वत सभी शिवमय थे. उनके द्वारा रचित महत्वपूर्ण ग्रंथों में ‘योगांग त्रिविध’ ‘शटीय वचन’ ‘अक्कगल पीटिके’ शामिल हैं.
                                                अक्क महादेवी

माधवाचार्य- कर्नाटक में यह एक बहुत प्रसिद्ध संत-विद्वान् हुए हैं. इन्होंने आठ वर्ष की आयु में सन्यास ग्रहण कर लिया था. एक बार उन्होंने बादशाह जलालुद्दीन खिलजी को समझाया कि किसी भी भाषा में, किसी भी देश के व्यक्ति का भगवान एक ही है. उसकों सभी भाषाओं में अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है. श्रीमद्भागवतगीता का भाष्य लिखते समय मध्वाचार्य ने कहा कि जाति व्यवस्था का शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं है. अध्यात्म के विषय में ज्ञान रखने वाले सभी व्यक्ति श्रेठ हैं. उन्होंने चालीस ग्रंथों की रचना की जिनमें जटिल विषयों को बहुत सरल भाषा में प्रस्तुत किया. इनमें ‘श्रीमद्भागवतगीता’, ‘ब्रह्मसूत्र’, ‘दस उपनिषद’, ‘श्रीमद्भागवत’, ‘महाभारत’ तथा ‘ऋग्वेद’ के प्रथम तीन अध्यायों पर उनके भाष्य बहुत लोकप्रिय और प्रसिद्ध हुए. उन्होंने कर्नाटक और महाराष्ट्र में भक्ति का व्यापक प्रसार किया.
                                              माधवाचार्य

विद्यारण्य स्वामी- इनकी प्रारम्भिक शिक्षा स्वामी शंकरानंद के पास हुयी और आगे अध्ययन के लिए इन्हें कांची के गुरु विद्यातीर्थ के पास भेज दिया गया.उस समय अलाउद्दीन के सेनापति मालिक काफूर ने बड़ी सेना के साथ श्रीरंगम मंदिर को लूटकर ध्वस्त कर दिया. काफूर ने रामेश्वरम में अपना विजय स्तम्भ और मस्जिद का निर्माण करवाया. इस दुर्दशा के बाढ़ माच्वाचारी श्रीरंगम पहुँचे और यह सारा विध्वंस देखकर उनके मन में बहुत पीड़ा हुयी.

उन्होंने इस अत्याचार और आतंकवाद के विरुद्ध समाज को संगठित करना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया. माधवाचार्य ने श्रृंगेरी पीठ के भारती कृष्णतीर्थ से संन्यास दीक्षा ली और उन्हें संन्यास का नाम मिला-स्वामी विद्यारण्य.

एक दिन हक्क और बुक्क नाम के दो तरुण घोड़े पर बैठकर उनके पास आये और उनसे आशीर्वाद की याचना कि. स्वामीजी ने कहा कि कभी हम इस भूमि पर शासक थे, लेकिन अब हम सब खोकर अपना आसरा ढूंढ रहे हैं. मोहम्मद बिन तुगलक इन दोनों युवकों को को बंदी बनाकर ले गया और उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बना लिया. लेकिन वह किसी तरह भागकर निकल आये और उन्हें पुन: शुद्ध करके हिन्दू बना लिया गया. इनका नाम हरिहर राय (हक्क) और बुक्क राय(बुक्क) हो गया.

स्वामी विद्यारण्य के मार्गदर्शन में हक्क और बुक्क ने जातिवाद को समाप्त कर समाज को संगठित किया. स्वामीजी की प्रेरणा से पम्पा क्षेत्र में एक नवीन नगर की स्थापना की गयी, जो आगे चलकर ‘विजयनगर साम्राज्य’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ. स्वामीजी ने इस राज्य में सभी सम्प्रदायों और धर्मों को सामान रूप से आदर दिलवाया. यह साम्राज्य बहुत लम्बे समय तक एक सशक्त और समृद्ध बना रहा. स्वामीजी की प्रतिमा आज भी हम्पी के विरूपाक्ष मंदिर में प्रतिष्ठित है.
                                               विद्यारण्य स्वामी

दासकूट परम्परा- माधवाचार्य की शिष्य परम्परा निरंतर मजबूत होती गयी और आगे चलकर इसका नाम ‘दासकूट’ पड़ गया. इसमें शामिल सभी भक्त ‘दास’ या  ‘हरिदास’ कहलाये. इन हरिदासों ने भक्ति के हज़ारों पदों की रचना कर भक्ति का प्रसार किया. इन्होंने जातिगत ऊँच-नीच की भावना को समाप्त कर सभी को एक साथ जोड़ा. इन्होंने आलवारों की संकीर्तन पद्धति को अपना लिया. इस परम्परा में पादराय बहुत प्रसिद्ध हुए उन्होंने अनेक भक्तिपरक रचनाएँ कीं, जिनमें ‘भ्रमरगीत’, वेणुगीत’,’गोपीगीत’ शामिल हैं. ‘हरिकीर्तन तरंगिणी में भी उनके साथ पद शामिल हैं.

कर्नाटक की दास परम्परा में आगे चलकर ‘दास पंथ’ चल पड़ा, जिसमें अनेक आध्यात्मिक लोग हुए. इनमें पुरंदरदास, कनकदास, विजयदास, जगन्नाथदास, वेंकटदास उल्लेखनीय हैं.

पुरंदरदास- यह एक श्रेठ संत, श्रीकृष्ण और विट्ठल के अनन्य भक्त, कवि और संगीतज्ञ थे. उन्होंने धर्मग्रंथों का सार सरल स्थानीय भाषा में लिखा, जो बहुत लोकप्रिय हुआ. कुछ अन्य ग्रंथों का उन्होंने कन्नड़ में अनुवाद भी कार्वाया. उन्होंने जातिगत भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष किया और सामाजिक समानता को बढ़ावा दिया.
                                                 पुरंदरदास

कनकदास- यह भी कर्नाटक के बहुत लोकप्रिय ‘हरिदास’ हुए हैं. वह भगवान् श्रीकृष्ण के भक्त थे. वह बहुत वीर और दानवीर भी थे. इसी कारण इन्हें कनकनायक कहा जाने लगा. व्यासदेव से दीक्षा लेकर वह ‘मध्वमत’ के अनुयायी बन गये. उन्होंने कागिनेले में आदिकेशव का सुंदर मंदिर बनवाया. उनका अधिकांश समय भजन-पूजन और कीर्तन में ही बीतता था. वह एक बहुत बड़े समाजसुधारक भी थे, जिन्होंने समाज के सभी बुराइयों के खिलाफ जीवनभर संघर्ष किया.
                                                कनकदास

कनक खिडकी-उडुपी के श्रीकृष्ण मंदिर की दीवार पर एक छोटी-सी चौकोर खिडकी है, जिसे कनक खिडकी कहा जाता है. कनकदास छोटी जाति के थे, लिहाजा उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया. कई मील पैदल चलकर वह प्रभु के दर्शन नहीं कर पाए. वह मंदिर के बाहर खड़े थे और उन्हें कहीं से भी मूर्ति के दर्शन नहीं हो रहे थे. वह दुखी हो गये. मूर्ति पूर्वाभिमुख थी. कनकदास ने मंदिर के पिछवाड़े जाकर भगवान से दर्शन देने की प्रार्थना कि और तन्मय होकर भजन गाने लगे. अचानक घनघोर वर्षा होने लगी और पिछवाड़े की दीवार गिर पड़ी. हजारों लोगों ने देखा कि श्रीकृष्ण की मूर्ति अर्धवृत्ताकार घूमकर पश्चिम की ओर हो गयी. दीवार की दरार से कनकदास भगवान् के दर्शन कर रहे थे. तभी से इसे ‘कंकन किंडी’ या ‘कनक खिडकी’ कहा जाने लगा. उनकी पाँच रचनाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं- ‘नरसिंह स्तोत्र’, ;मोहन तरंगिणी’, ‘रामधान्य मंत्र’, ‘हरिभाक्तिसार’ आर ‘नलचरित्र’.

तोरवे रामायण-  कर्नाटक में कुमार वाल्मीकि द्वारा रचित ‘तोरवे रामायण’ घर-घर में लोकप्रिय है. इसके अलावा इस प्रांत का कीर्तन साहित्य, नाट्य परम्परा, हरिकथा-शिवकथा परम्परा भी बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय हैं.

कर्नाटक में पेजावर स्वामी ने भी सामाजिक एकता और समरसता को बढाने में महत्वपूर्ण कार्य किया. इस कार्य के लिए वह गाँव-गाँव जाते थे.



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