NP SPECIAL: केरल में संत और उनके सामाजिक उत्थान के प्रयास : Saints and their social upliftment efforts in Kerala : DINESH MALVIYA

केरल में संत और उनके सामाजिक उत्थान के प्रयास

Shankara and his four disciples

-दिनेश मालवीय

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भारत का बहुत छोटे लेकिन स्वर्ग की तरह सुंदर प्रदेश केरल को कुदरत ने अपनी दौलत से भरपूर नवाज़ा है.यहाँ पर सिन्धु सागर, हिन्द महासागर और बंगाल की खाड़ी का संगम भी है. यहाँ बोली जाने वाली मलयालम भाषा भी बहुत समृद्ध है. इस प्रदेश में भी अन्य प्रांतों की तरह सामाजिक समरसता और समाज में एकता की चेतना के प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किये.

मलयालम के विद्वानों ने संस्कृत के धर्म-ग्रंथों का मलयालम में अनुवाद किया. ‘रामचरितम’, ‘भगवत गीता’. ‘कृष्णगाथा’, ‘अध्यात्मरामायणम’ आदि ग्रंथ मलयालम में लिखे गये. ‘खण्ड-रामायणम’ मलयालम की प्राचीन सुंदर कृति है. मलयालम की भक्ति की कविताओं में श्रीकृष्ण भक्ति की प्रधानता है.

नाथमत केरल के मध्यकालीन भक्ति साहित्य को नाथयोग ने बहुत अधिक प्रभावित किया. नाथ सम्प्रदाय में सभी जातियों के लोग शामिल थे. वे किसी भी प्रकार के जातिगत भेदभाव को स्वीकार नहीं करते थे.

नायन्मार तथा आलवारों का प्रभाव– मलयालम में भक्ति साहित्य के लेखन पर तमिल भाषा और आलवारों और नायान्मारों का बहुत प्रभाव है. कुलशेखरालवार केरल के शासक थे, जो आगे चलकर प्रसिद्ध आलवार भक्त हो गये. आलवारों ने भक्ति में सभी जातियों को बराबर का अधिकार दिया. इससे निम्न मानी जाने वाली जातियों को सम्मान मिला. मलयालम के लोगीतों में ‘पाणप्पटटू’ विशेष रूप से उलेखनीय है. यहाँ भक्त तिरुपपाण बहुत प्रसिद्ध हुए.

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निरणम कवि चौदहवीं शताब्दी के दूसरे भाग से ही यह मलयाली क्षेत्र में राम और कृष्ण भक्ति की कविताओं का बहुत लेखान हुआ. इनमें मलयालम भाषा के कृष्णभक्त कवियों में ‘निरणम’ प्रमुख थे. इनमें तीन कवि प्रमुख थे, जिनमें माधव पणिक्कर, शंकर पणिक्कर और राम पणिक्कर शामिल हैं. माधन ने ‘श्रीमद्भागवतगीता’ का मलयालम में अनुवाद किया. शंकर पणिक्कर ने ‘श्रीकृष्ण विजय’ और ‘भारात्माल’ नामक दो ग्रंथों की रचना की. राम पणिक्कर ने ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘ब्रह्माण्ड पुराण’, ‘शिवरात्रि महामत्मय’, ‘भागवत के दशम स्कंध’ आदि की रचना की.

यह सभी कवि गाँव-गाँव जाकर अपनी कविताओं के माध्यम से जन-जागरण और भक्ति के प्रसार का कार्य करते थे.

श्री चेरुशेरी नाम्बूतिरी- यह बहुत प्रसिद्ध रामकाव्य रचयिता हुए हिं. इनकी ‘कृष्णगाथा’ नाम की पुस्तक के गीतों ने मलयाली समाज पर बहुत गहरा प्रभाव डाला. इन पदों को सुर-लय के साथ गया जात है और भक्तगण नृत्य भी करते हैं.

आचार्य तुन्जत्तु रामानुजन अजुत्ताच्छन– यह एक महाकवि और मलयालम में काव्य के पिता मने जाते हैं. एजुत्ताच्छन का अर्थ ‘भाषा का पितामह होता है.मलयालम भाषा और साहित्य को समृद्ध बनाने में इनकी बहुत महत्ववपूर्ण भूमिका रही.  इन्होंने योग की भी दीक्षा ली थी. इस महाकवि ने ‘अध्यात्मरामायण’, ‘माहाभारत’ ,श्रीमद्भागवत’, ‘देवी महात्म्य’,’ ‘ब्रह्माण्ड पुराण’, हरिनामकीर्तन; अरु ‘चिन्तारत्न’ नामक ग्रंथों की रचना की. उनपर नाथ पंथ का गहरा प्रभाव था. उन्होंने कई ग्रंथों में योग के विभिन्न अंगों उसकी प्रक्रियाओं का विस्तार से वर्णन किया. केरल प्रांत में उन्होंने सामाजिक चेतना और सामाजिक चेतना के प्रसार में बहुत उल्लेखनीय कार्य किया. उन्होंने भजन बहुत सरल भाषा में लिखे. श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का उन्होंने मनोहारी चित्रण किया है.

अध्यात्म रामायण (मलयालम)- आचार्य एजुत्ताच्छन द्वारा रचित ‘अध्यात्मरामायण’ का पाठसिर्फ केरल प्रांत में होता है. यह इस प्रदेश की सबसे अधिक पूजनीय ग्रंथ और लोकसाहित्य है. केरल में संक्रांति से शुरू होने वाले सूर्यमास को कर्कट मास या रामायण मास भी कहा जाता है. इस मास में इस रामायण का पाठ किया जाता है. इसके पहले यहाँ ‘;रामचरित’ ‘खण्ड रामायण’ ‘भाषा रामायण; और ‘चम्पू’ आदि रामायण कथाओं की रचना हुयी.

भक्त कवि कुंचन नम्बयारकुंचन नम्ब्यार गुरु नारायण भट्टतिरि के शिष्य थे. उन्होंने संस्कृत के सभी ग्रंथों का अध्ययन किया था. उन्होंने ईश्वर की भक्ति के साथ-साथ काव्य, नृत्य, अभिनय, वाद्य अआदी के एक साथ उपयोग करने की नयी पद्धति चलायी, जिसके अनुसार एक आदमी विशेष वेशभूषा में रंगमंच पर उपस्थित होता है. वह किसी पौराणिक या वीररसपूर्ण कथा को कावे के रूपमें कहता जाता है. इस पद्धति को ‘तुल्लुल’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है नृत्य.

समाज सुधार की दिशा में नम्ब्यार ने बहुत व्यापक कार्य किया. उनके बाद अन्य अनेक संतों ने इस कार्य को आगे बढाया.

श्री नारायण गुरु– यह केरल प्रांत के विशिष्ट संतों में गिने जाते हैं. इन्होंने भी समाजसुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया. रविन्द्रनाथ टैगोर ने उनके बारे में कहा कि-“ अपने जीवन में इतना महान आध्यात्मिक व्यक्ति मैंने कोई नहीं देखा”.

Sree Narayana Guru

उस समय केरल की सामाजिक दशा बहुत शोचनीय थी. स्वामी विवेकानंद ने इस सामाजिक दुर्व्यवस्था को देखर कहा था कि ‘केरल एक पागलखाना’ है. इस संत ने इस बुरी दशा में सुधार लाने के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया.

नारायण गुरु ने घोषणा की कि वह ‘अरुविप्पुरम में शिवरात्रि के दिन शिवमंदिर की स्थापना करेंगे. शिवलिंग को नदी से निकालकर लाने और उसकी मंदिर में स्थापना का कार्य उन्होंने ही किया. वह हर वर्ष एक ने मंदिर की स्थापना करते थे. श्रीनारायण गुरु जिन मंदिरों की स्थापना करते थे वे बहुत विशाल नहीं होते थे. लेकिन इतने सुंदर और स्वच्छ होते थे कि लोग सहज ही उनकी ओर खिंचे चले आते थे. उनकी प्रेरणा से हजारों लोगों ने शराब पीना छोड़ दिया. उन्होंने पशुबलि जैसी बुराइयों को भी समाप्त करवा दिया.

श्री नारायाण गुरु ने वरकला नामक स्थान पर वैदिक विद्यालय की स्थापना की और वहाँ देवी सरस्वती की प्रतिमा की प्रतिष्ठा करवाई. उस समय एड्वा आदि लोगों को मंदिर के किनारे की सड़कों पर चलने की अनुमति नहीं थी. श्री नारायण गुरु ने इसके लिए सत्याग्रह किया और इस बुरी प्रथा को समाप्त करवाया. महात्मा गाँधी और विनोबा भावे ने भी इस आन्दोलन का सर्थन किया. उन्होंने लड़कियों के पढने की व्यवस्था की और खानपान सम्बन्धी अनेक बेतुके निषेधों को समाप्त करवाया.

समाज सुधार के कार्यों को आगे बढाने के लिए “श्री नारायण धर्म संगम’की स्थापना हुयी, जिसमें सभी जातियों के लोग सन्यासी थे और सामाजिक कार्य करते थे.

Chattambi Swamikal

श्रीचटटाम्बि स्वामीगल– यह श्री नारायण गुरु के अभिन्न सहयोगी थे. एक बहुत समृद्ध परिवार में जन्म लेने की बावजूद उन्होंने दीन-दुखियों की स्थिति देखकर उनके उत्थान के लिए संघर्ष किया. नारायण गुरु और सामीगल एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते थे. समाज में फूट और दुरावस्था का लाभ लेकर ईसाई प्रचारक लोगों को ईसाई बनाने का कार्य कर रहे थे. उन्होंने इसे रोकने की दिशा में बहुत अच्छा कार्य किया. उनकी रचनाओं में “ख्रिस्तमछेद्नम” और ‘प्राचीन मलयालम” प्रसिद्ध हैं. उन्होंने सभी जातियों को सम्मान दिलाने और सभी जातियों को वेदों के अध्ययन में सुविधा के लिए “वेदाधिकारनिरूपणम’ नामक ग्रन्थ की रचना की. वह स्वयं एक श्रेष्ठ योगी थे और उन्होंने योग का भी काफी प्रसार किया. अपनी केरल यात्रा के दौरान स्वामी विवेकानंद ने उससे भेंट कर उनसे “चिन्मंत्र” का ज्ञान प्राप्त लिया.

महात्मा अय्न्काली– यह भी केरल के एक महान संत हुए हैं, जिन्होंने समाज के भोलेभाले लोगों को विधर्मियों के कुप्रचार का शिकार होने से बचाने की दिशा में बहुत काम किया.छूआछूत को दूर करने और सामाजिक समरसता के लिए उनके द्वारा किये गये कार्य अद्वितीय हैं.

महाकवि करुप्पन– यह भी एक ऐसे संत-कवि हुए हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में चेतना लाने और भेदभाव समाप्त करने में बहुत उल्लेखनीय भूमिका का निर्वाह किया. वह संस्कृत के बहुत अच्छे विद्वान् थे. उन्होंने अपनी भावपूर्ण कवितओं ने जातिगत विद्वेष को समाप्त करने का भरसक प्रयास किया. उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में ‘जाति कुम्मि’ और ‘उद्यान विरुन्नु’ प्रसिद्ध हैं.


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