गुजरात की समृद्ध संत-परम्परा-दिनेश मालवीय

गुजरात की समृद्ध संतपरम्परा

-दिनेश मालवीय

गुजरात सदा से ही अद्वितीय वीरता, समृद्धि और शिष्टता के लिए जाना जाता रहा है. लेकिन यहाँ भक्ति का प्रवाह भी किसी तरह कम नहीं रहा. यहाँ संतों की एक बहुत समृद्ध परम्परा रही है. इन संतों ने अपने पवित्र आचरण और वाणी के माध्यम से समाज में समानता और सद्भावना के साथ ही ईश-भक्ति की चेतना का प्रसार किया. गुर्जरों के इस प्रदेश ने ही विश्व को शान्ति-दूत महात्मा गांधी दिए. यहाँ के महान संतों में भक्तशिरोमणि नरसी मेहता. मूलदास, अख, मेकण, गिरधर, सहजानंद, मुक्तानंद, दयानंद, गंगाबाई और पानबाई जैसी विभूतियाँ शामिल हैं. यहाँ वल्लभ और रामानंद सम्प्रदाय के शिष्यों का बहुत प्रभाव रहा.

नरसी मेहता– नरसी मेहता गुजरात के परम संतों में गिने जाते हैं. उनका बहुत प्रसिद्ध भजन-“वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाने रे” महात्मा गांधी का सबसे प्रिय भजन था. इनकी भक्ति निर्गुण और सगुण दोनों स्वरूप की है. वह सम्पूर्ण विश्व को ही ईश्वर का रूप मानते थे. वह जातिभेद को पूरी तरह नकारते थे. वह शूद्र कहे जाने वाले लोगों तक के चरणस्पर्श कर लेते थे.उनके इसी आचरण के कारण कथित ज्ञानियों द्वारा उनका बहुत विरोध भी किया गया, लेकिन वह अपने मार्ग पर अडिग रहे. उन्होंने ने ही समाज में अछूत माने जाने वाले लोगों के लिए “हरिजन” शब्द का प्रयोग किया, जिसे महात्मा गांधी ने भी अपनाया.

संत मांडण– यह भी गुजरात के अग्रणी संतों में आते हैं. वह श्रीजोशी मदन के शिष्य थे. वह स्वामी रामानंद से भी बहुत प्रभावित रहे. उन्होंने राम की भक्ति, नाम-स्मरण, गुरु के महत्त्व और अहंकार को त्यागने का उपदेश देकर जनमानस को चेतन किया. जातिभेद और आडंबरों का उन्होंने डटकर विरोध किया. उनके अनुसार, जो घूमता रहे, वो फकीर है, जो रमता रहे वह साधु है और जो सत्य की राह पर चले वही हिन्दू या मुसलमान है.

भक्त लीरलबाई– इनका जन्मएक लोहार परिवार में हुआ और वह नाथपंथ की अनुयायी थीं. एक बार प्रसिद्ध संत देवायन के साथ उनकी आध्यात्मिक चर्चा हुयी और लिरालबाई ने उनकी अनेक आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान कर उनका मार्गदर्शन किया. उन्होंने आने ग्रंथों की भी रचना की.

महर्षि दयानंद सरस्वती– यह भारत की सबसे महान विभूतियों में गिने जाते हैं. उन्होंने बचपन से ही वेदों की हजारों ऋचाएं याद कर ली थीं. उन्होंने इक्कीस वर्ष की उम्र में घर त्याग दिया और धर्म के सच्चे स्वरूप के प्रसार में सारा जीवन लगा दिया. उन्होंने इसके लिए पूरे भारत की यात्रा की.

महर्षि दयानंद सरस्वती ने 1875 में मुम्बई में आर्य समाज की स्थापना की. उन्होंने हिन्दू समाज के नव-जागरण और कुरीतियोंओ को दूर करने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया. वैसे तो सम्पूर्ण भारत में उनका नाम था लेकिन पश्चिमी प्रान्तों में उन्हें विशेष सफलता मिली.

महर्षि ने माना कि यज्ञोपवीत धारण करना सभी का अधिकार है. उन्होंने लाखों शूद्रों और अछूत कहे जाने वाले लोगों को यज्ञोपवीत धारण करवाया. उन्होंने संस्कृत भाषा के अध्ययन पर सभी का अधिकार माना. इसके लिए उन्होंने संस्कृत और वेद के अध्ययन के लिए गुरुकुलों की स्थापना की. महर्षि ने घोषणा की कि यज्ञ करने का अधिकार सभी को है. उन्होंने पिछड़े और अछूत वर्ग के ऐसे हजारों लोग तैयार किये जो यज्ञ करवाते थे. उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति जन्म से नहीं, कर्म से ब्राह्मण होता है.

स्त्रीशिक्षा को उन्होंने बहुत महत्त्व दिया. उन्होंने महिलाओं के लिए भी यज्ञोपवीत की व्यवस्था की. उन्होंने शुद्धि आन्दोलन चलाकर दूसरे धर्मों में चले गये लोगों के लिए हिन्दू धर्म में वापस आने का मार्ग खोल दिया. उनकी प्रेणणा से हजारों लोग अपने मूल धर्म में वापस आये. उन्होंने वैदिक संस्कृति का प्रसार किया. वह जगह-जगह जाकर ढोंग, पाखंड और जातिगत भेदभाव के खिलाफ प्रचार करते थे.

गिरधर रामायण– श्रीगिरधर परम वैष्णव संत थे. वह भक्त कवि होने के साथ-साथ व्याख्यान देने में भी बहुत निपुण थे.उन्होंने रामचरित को विभिन्न राग-रागिनियों में रचा और गाया. उनका वही भक्तिगान संग्रह “गिरधर रामायण” के रूप में प्रसिद्ध है. यह सात खण्डों में विभाजित है. इसका गुजरती भाषी प्रदेश में “श्रीरामचरितमानस” की तरह पाठ किया जाता है.

संत अखा– यह एक स्वर्णकार परिवार के थे और एक टकसाल में नौकरी करते हुए उन्हें प्रबल वैराग्य हो गया. उन्होंने अपनी जमीन और जागीर सब बेच दी और सद्गुरु की खोज में जिकल पड़े. मथुरा में गोकुल के निकट आकर उन्होंने गोसईं गोकुलनाथ से वैष्णवी दीक्षा ली. इसके बाद वह काशी में ब्रह्मानंद सरस्वती की शरण में रहे.

अखाजी ने आर्थित रूप से सम्पन्न होने पर भी फकीर्री को अपनाया. अखाजी ने लम्बे समय तक काशी में निवास कर संतों के सत्संग में गूढ़ ज्ञान प्राप्त किया. उनका चिंतन बहुत परिपक्व था. उन्होंने कई ग्रंथों की रचना की. उनका मानना था कि वेदान्त के प्रसार से ही सनातन धर्म की रक्षा संभव है. ज=हजारों लोगों ने उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया. कुछ भक्त उन्हें पंजाब लेकर गए, जहाँ उन्होंने “जूलणा” नाम से रचनाएं कीं.

संत अखा ने गुजराती और हिन्दी दोनों भाषाओं में साहित्य की रचना की. उन्हें गुजरात का कबीर कहा जाता था. उन्होंने निरार्थंक कर्मकांडों और आडम्बरों का निर्भीकता से प्रबल विरोध किया. उनकी प्रमुख रचनाओं में “श्री एकलक्ष रमणी”, “कुण्डलिया”, “धुआसा”, “जकड़”, “ब्रह्मलीला”” “संतप्रिया” आदि शामिल हैं.

मेकरणदास– इस परम पवित्र संत ने श्रीगंगोजी नामक एक सत्पुरुष को अपना गुरु वरन किया और उनके उपदेश के अनुसार आपस में अभीवादन के लिए “जुहार” की जगह “राम-राम” शब्द का प्रयोग बढाया.

उनके छोटे भाई एक मुस्लिम होगये और “पीर पतंग शाह” नाम रख लिया. उन्होंने उसे पुन: हिन्दू धर्म में वापस कराया. वह गाँव-गाँव जाकर भिक्षा मांगकर जीवन निर्वाह करते हुए धर्म और भक्ति का प्रसार करते थे. उन्होंने कई वर्षों से बंद पड़े हिंगलाज देवी के दर्शन के मार्ग को फिर से शुरू करवाया. मेकणनाथ ने समाज सेवा के लिए चार अखाड़ों की स्थापना की.

स्वामी सहजानंद– इन्हें स्वमीनारायण भी कहा जाता है. उनका बचपन का नाम घनश्याम था. बहुत कम उम्र में ही उन्होंने वेदों सहित सभी प्रमुख ग्रंथों का गहन अद्ययन कर लिया. इसके बाद उन्होंने घर त्याग दिया और “नीलकंठ वर्णी” नाम धारण किया. उन्होंने भारत भर की व्यापक यात्रा की और इसके बाद गुजरात के लोज गाँव में आ गये. वहाँ वह स्वामी रामानंद के शिष्य हो गये. स्वामी रामानन्द ने उन्हें इक्कीस वर्ष की उम्र में अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. भागवती दीक्षा के बाण उनका नाम “सहजानंद स्वामी हो गया. इस रूप में उन्होंने नि:स्वार्थ सेवा का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया.स्वामी सहजानंद ने समाज की कुरीतियों और आडम्बरों को दूर करने के लिए “स्वामीनारायण संप्रदाय” की स्थापना की.

स्वामी मुक्तानंद– स्वामिनारायण सम्प्रदाय के ही एक सन्यासी स्वामी मुक्तानंद बहुत प्रसिद्ध संत हुए. वह स्वामी सह्जानान्द्जी के गुरुभाई थे. इनकी हिन्दी में रचित “विवेकचिंतामणि” और “सत्संगशिरोमणि” पुस्तकें बहुत प्रसिद्ध हैं. उन्होंने अपना पूरा जीवन आध्यात्मिक साधना और गरीबों की सेवा में लगाया.

संत मूलदास– यह भी गुजरात के प्रमुख संतों में शामिल हैं. समाज में असमानता, आडम्बर और जातिगत भेदभाव के उन्मूलन में उनकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही.

वैष्णव पद्मनाभ– यह रामानंदी परंपरा के बहुत प्रतिभाशाली संत हुए हैं. उन्होंने अपने पवित्र आचरण और शुभकर्मों से समाज में बहुत ऊंचा स्थान प्राप्त किया. संत पद्म्नाभ कबीर से भी बहुत प्रभावित थे.

 

 


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