आंध्रप्रदेश के संत और सामाजिक समरसता में उनकी भूमिका -दिनेश मालवीय

आंध्रप्रदेश के संत और सामाजिक समरसता में उनकी भूमिका

-दिनेश मालवीय

दक्षिण भारत का आंध्रप्रदेश ऐसे महान योगियों और संतों की भूमि रहा है, जिन्होंने स्वयं आध्यात्मिक रूप से परम अवस्था को प्राप्त करने के साथ ही सामाजिक विसंगतियों को दूर करने में बहुत उल्लेखनीय कार्य किये. इनमें से कुछ संतों ने देश की आज़ादी की लड़ाई में भी सक्रिय भागीदारी की और इसके लिए जन-चेतना को भी जाग्रत किया.

श्रीकृष्णमाचार्य ने भक्ति साहित्य को सुलभ बनाने के लिए तेलुगु भाषा में संकीर्तन साहित्य की रचना की. इसी कारण उन्हें तेलुगु का आदिकवि कहा जाता है. इन्होंने ही भक्त नम्मालवार के ‘द्रविणदेव’ का तेलुगु में अनुवाद किया. इस प्रदेश के अन्य प्रसिद्ध संतों में अन्नामाचार्य. संत वेमना, कवयित्री रामभक्त मोल्ला, वीर ब्रह्मनेंद्र स्वामी, कोंडयाचार्य स्वामी, वशिष्ठ गणपति मुनि, मलयाल स्वामी और अल्लरी के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है.

कवयित्री मोल्ला- यह तेलुगु भाषा की पहली कवयित्री हैं. इन्होंने तेलुगु में रामकाव्य की रचना कर बहुत ख्याति और लोकप्रियता प्राप्त की. वह आजीवन बरह्मचारिणी रहीं और उनकी रचनाएँ लोकमानस में सीधी उतरने वाली थीं.  वह श्रीराम की अनन्य भक्त थीं और ज्ञान, योग आदि से भक्ति को श्रेष्ठ माना. उनके अनुसार कोई भी भक्ति कर सकता है. इसमें जाति-वर्ण आदि का कोई भेद नहीं है.भगवान के प्रति अनन्य प्रेम और भक्ति के कारण वह उनके और सीता माता के वियोग की कथा को उन्होंने नहीं लिखा. उनके द्वारा रचित ‘मोल्ला रामायण’ बहुत लोकप्रिय है.
                                               कवयित्री मोल्ला

भक्त अन्नमाचार्यलु- यह बहुत छोटी उम्र में ही पैदल यात्रा करते हुए तिरुपति पहुँच गये और वहीँ बस गये. उनमें भक्ति काव्य रचने की विलक्षण प्रतिभा थी. वह आंध्र में सूर और मीरा की तरह प्रसिद्ध थे. उन्होंने अपने इष्टदेव का बहुत स्वरूपों में वर्णन किया है. उनका मानना है कि वही व्यक्ति ऊँची जाति का माना जाएगा, जिसके जीवन में भगवान की भक्ति का प्रमुख स्थान हो. उन्होंने कथित ऊंची जाति के लोगों का विरोध सहकर भी व्यवहारिक भाषा और लोकगीत शैली में भक्ति साहित्य की रचना की. उनका संकल्प था कि राजा,रंक, पंडित और पामर सभी उनकी रचनाओं को पढ़ें और सुनें. उन्होंने अपनी रचनाओं को ‘पंचमवेद’ कहा.
                                            भक्त अन्नमाचार्यलु

संत वेमना- संत वेमना को आंध्र का कबीर कहा जाता है. उनका प्रराम्भिक जीवन वैभव में बीता, लेकिन आगे चलकर वह विरक्त हो गये. उन्होंने अपना सारा धन परोपकार में लगा दिया और निर्धन हो गये. वह निर्वस्त्र ही जंगल में रहने लगे और साधना करते-करते सिद्ध हो गये. उन्हें हर जिव और जड़-चेतन मे ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होने लगा. उनके द्वारा रचित “योगी वेमना का शतक” नामक ग्रंथ बहुत आसान भाषा में लिखा गया है. उन्होंने जीवनभर जातिगत भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष किया. वह समाज में सद्गुणों को बढ़ावा देते थे और इसमें लोगों का मार्गदर्शन भी करते थे.

संत वेमना कबीर की तरह मूर्तिपूजा और अवतारवाद का खंडन करते थे. वह समाज में व्याप्त सभी कुरीतियों का अंत करना चाहते थे. संत वेमना के सामाजिक चेतना बढाने के कार्य बहुत उल्लेखनीय हैं. वह मानते थे कि भक्ति मनुष्य को देवता के स्तर तक ऊँचा उठा सकती है. सर्वशक्तिमान ईश्वर की पूजा आत्मज्ञान से करनी चाहिए.
                                                  संत वेमना

पोतुल्लरी वीर ब्रह्मेन्द्र स्वामी- इन्होंने तमाम तरह के विरोध सहकर भी भक्ति और सामाजिक सुधार के अपने मार्ग को नहीं छोड़ा. उन्होंने बाहरी आडम्बरों का बहुत विरोध किया. भगवान के सामने सभी समान हैं. उनके शिष्यों में सभी जाति-वर्ण के लोगों के साथ ही सिद्ध्या (मुस्लिम) और अन्य लोग भी शामिल थे. वह सभी को साथ बैठाकर उनके साथ भोजन करते थे.

उन्हें तेलुगु साहित्य में दार्शनिक कविता का जन्मदाता माना जाता है. उन्होंने लुहार, बढई, सुनार, कंसेरा और शिल्पकार जातियों को संगठित कर ‘पंचाणव’ नामक संगठन की स्थापना की.इस प्रकार इस नवगठित सामजिक समूह का नाम ‘विश्वकर्मा’ पड़ गया. आंध्र में मुस्लिमों का शासन था, वीर भी बड़ी संख्या में मुस्लिम उनके शिष्य हो गये. इनमें मोहम्मद बेग खान, अब्दुल्ला कुतुबशाह, मोहम्मद मीर जुमला और मोहम्मद रजा अली, अब्दुल वहाब खान, अब्दुल अजीज सिद्दी, आदि प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं. इन लोगों ने उन्हें मठों की स्थापना के लिए जमीनें भी दान कीं. ‘कालज्ञानम तत्वम’ उनकी अनुपम रचना है.
                                        पोतुल्लरी वीर ब्रह्मेन्द्र स्वामी

कोंडाचार्य स्वामी- इन्होंने उपेक्षित और वंचित वर्ग के लोगों को सम्मान दिलाने के लिए जीवनभर ठोस प्रास किये. तीर्थयात्रा करते हुए जब एक बार वह आदिलाबाद जिले के बीब्रा नाम के गाँव में गये तो उन्होंने देखा कि वीरशैव मत को मानने वाले लोग अन्य छोटी समझी जाने वाली जातियों को गाँव से बाहर निकाल रहे हैं. स्वामीजी ने वीरशैव लोगों को समझाया कि ऐसा भेदभाव उचित नहीं है, क्योंकि सभी में परमात्मा का निवास है. उनकी बात का बहुत प्रभाव हुआ और सभी लोग गाँव में मिलजुलकर रहने लगे. वह शूद्रों के घरों में जाकर भोजन करते थे और प्रवचन देते थे. इसका समाज में बहुत सकारात्मक असर हुआ. आंध्रप्रदेश में सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने वाले संतों में उनका नाम अग्रणी है.

वशिष्ठ गणपति मुनि- यह एक ऐसे संत थे , जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए होने वाले संघर्ष में सक्रिय भाग लिया. वह आध्यात्मिक साधना के साथ ही सामजिक भेदभाव दूर करने की दिशा में हमेशा जागरूक और सक्रिय रहे. उन्होंने 1923 में काकीनाडा अधिवेशन के समय अपने भाषण में सामाजिक बुराइयों को दूर करने का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि महिलाएं भी जनेऊ धारण कर सकती हैं और यज्ञ,श्राद्ध अदि कर्मों में भागीदार हो सकती हैं. इस अधिवेशन में उन्होंने छूआछूत समाप्त्र करने की एक व्यापक योजना प्रस्तुत की. गांधीजी से किसी बात पर मतभेद हो जाने पर उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया और शेष जीवन भक्ति और समाजसेवा में लगा दिया.

मलयाल स्वामी- यह केरल क्षेत्र के निवासी और श्री नारायण गुरु के शिष्य थे. स्वामी तिरुपति में बालाजी वेंकटेश्वर के दर्शन करने गये और उनका मन वहाँ ऐसा रमा कि वहीं बस गये. उन्होंने गोगर्थम में बारह वर्ष साधना कि और उसके बाद श्रीव्यासाश्रम नाम से एक आश्रम बनाकर वहाँ रहने लगे. वह गाँव-गाँव में भ्रमण कर सामाजिक बुराइयों को दूर करने का कार्य करते थे. उन्होंने ‘यथार्थ भारती’नाम से पत्रिका का प्रकाशन किया. उन्होंने ‘सनातन वेदांत सभा’ के माध्यम से बड़े-बड़े आध्यात्मिक सम्मेलन किये.

अल्लूरी सीताराम राजू- यह एक महान देशभक्त संत थे. शिक्षा के समय से ही वह आसपास के वनवासी लोगों के बीच आने-जाने लगे. उन्होंने पूरे भरत की यात्रा की. वह जीवन भर सन्यासी रहे और उन्होंने कृष्णादेवी पेठ के नीलकंठेश्वरी मंदिर में अपना डेरा जमाकर कठोर साधना की. उन्होंने आदिवासियों के बीच नरबलि, मदिरापान और अन्य बुराइयों को समाप्त किया. उन्होंने अंग्रेजों द्वारा लोगों पर किये जा रहे अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष किया. उनकी प्रेरणा से हजारों लोग धनुष-वाण, लाठी-भाले आदि लेकर अंग्रेजी सेना से मुकाबला करते थे. उन्होंने वनवासियों की पंचायतें गठित कीं. लोग अपने मुकदमें लेकर अंग्रेजों के पास नहीं जाते थे और उन्हें टेक्स भी नहीं देते थे. अंग्रेजों की विशाल सेना और आधुनिक आग्नेय हथियारों के सामने आदिवासी कब तक संघर्ष करते? आखिर निर्दोष लोगों के जीवन की रक्षा के लिए अल्लूरी सीताराम में आत्मसमर्पण कर दिया. उन्हें एक पेड़ से बांधकर गोली मार दी गयी.
                                             अल्लूरी सीताराम राजू

कंदकूरि वीरेश लिंगम पन्तुलु- यह बहुत प्रसिद्ध भक्त और साहित्यकार थे. उन्होंने अपना सारा जीवन समाज के नवजागरण के लिए समर्पित कर दिया. तेलुगु साहित्य में उन्होंने सामाजिक, आर्थिंक, धार्मिक और अन्य विषयों पर प्रचुर लेखन किया. सामाजिक परिवर्थान की दृष्टि से उन्होंने ‘राजशेखर चरित्रम’ की रचना की, जिसमें सामाजिक बुराइयों पर मर्मान्तक प्रहार किये गये हैं. उन्होंने सामाजिक नवजागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.
                                           कंदकूरि वीरेश लिंगम पन्तुलु


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