हरियाणा के संत -दिनेश मालवीय

हरियाणा के संत

-दिनेश मालवीय

आमतौर पर हरियाणा को वहाँ के लोगों की जिन्दादिली, उन्नत कृषि और सम्पन्नता की भूमि के रूप में जानते हैं. यह बहुत हद तक सही भी है. यह छोटा-सा प्रदेश भारत की शान है. लेकिन यह बात कम ही लोग जानते हैं कि प्राचीन काल में अदृश्य सरस्वती नदी इसी भू-भाग से होकर बहती थी. इसके तट पर ऋषियों ने वेदों का अध्ययन किया. उन्होंने यहाँ ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों और उपनिषदों की रचना की. सबसे बड़ी बात तो यह कि इतिहास प्रसिद्ध महाभारत युद्ध भी इसी प्रांत के कुरुक्षेत्र में हुआ. विश्व के सबसे अद्भुत आध्यात्मिक ग्रन्थ “भगवतगीता” का भगवान् श्रीकृष्ण के श्रीमुख से इसी भूमि पर प्राकट्य हुआ. नाथ और सिद्ध पंथ के बहुत महान योगी यहाँ हुए हैं. भक्त सूरदास की जन्मस्थली भी हरियाणा ही है. यहाँ पर अनेक संतों के साथ अनेक पंथ भी हुए हैं, जिन्होंने सामाजिक समरसता बढाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.

संत गरीबदास- यह हरियाणा के बहुत महान संत हुए हैं. परम संत दादूदयाल इनके पिता और गुरु थे. इन्होंने तेईस हज़ार से अधिक वाणियों की रचना की, जिनमें धार्मिक पाखण्ड, जातिगत भेदभाव और अन्य सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठायी गयी है. यह वाणियाँ “बाबा गरीबदास की वाणी” शीर्षक से ग्रंथ के रूप में प्रकाशित हैं. उनके हज़ारों शिष्य थे, जो हर जाति और वर्ग के थे. कहते हैं कि संत गरीबदास के बारे में सुनकर बादशाह मोहम्मद शाह ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया. संत ने कहा कि केवल दो प्रकार के लोग ही राजदरबार में जाते हैं. एक तो वो जो अपराधी हैं और राजा से माफ़ी चाहते हैं. दूसरे वो जो खुशामद करने कुछ पाना चाहते हैं. मुझे इन दोनों में से कुछ नहीं करना. ऐसा कहकर उन्होंने दरबार में जाने से साफ़ मन कर दिया. बहरहाल बहुत अनुनय-विनय करने के बाद वह एक बार दिल्ली दरबार में गये और अपने उपदेशों से बादशाह पर बहुत गहरी छाप छोड़ी. उन्होंने गरीबपंथ की स्थापना की.

                                                          संत गरीबदास                                                                      

संत चरणदास- संत चरणदास से चरणदासी पंथ की स्थापना की. निर्गुण ब्रह्म को मानने वाला यह संत बहुत कम उम्र में दिल्ली आकर शुकदेवजी का शिष्य बन गया. गुरु ने इन्हें चरणदास नाम दिया. उन्होंने चौदह वर्ष तक एक गुफा में योग-ध्यान साधना की. इसके बाद उन्होंने समाज में सदाचरण और अध्यात्म का प्रसार किया. वह दीन-दुखियों की सेवा को भगवान की सेवा मानते थे. इनकी दो प्रसिद्ध महिला शिष्या भी हुयीं, जिनका नाम सहजोबाई और दयाबाई था. इन्होंने ने भी संतजी के काम को आगे बढाने में बहुत मदद की. सहजोबाई का ग्रंथ “सहज प्रकाश” और दयाबाई का ग्रंथ “दयाबोध” है.चरणदास के शिष्यों में गृहस्थ और वैरागी दोनों थे. वे सभी लोग “श्रीमद्भागवत” को बहुत मानते थे.

                                                           संत चरणदास                                                                                          

जैतराम महाराज- अट्ठारहवीं शताब्दी में हुए यह संत स्वामी गरीबदास के ही सुपुत्र थे. वह आजीवन ब्रह्मचारी रहे. इनकी वाणियों का संग्रह “सतगुरु श्री जैतरामजी महाराज की वाणी” के रूप में प्रकाशित है. वह निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे, लेकिन अवतार और पौराणिक कथों का सुंदर वर्णन करते थे और भजन भी गाते थे.

                                                        जैतराम महाराज                                                                         

राधास्वामी पंथ- इस पंथ का आज पूरे विश्व में प्रसार है. इसके अनुयाइयों की संख्या लाखों में हैं. इसका प्रारम्भ 1861 में स्वामी शिवदयाल महाराज ने किया. आगे चलकर यह तीन शाखाओं में विभाजित हो गया- व्यास शाखा (हरियाणा), दयालबाग़ शाखा (आगरा) और परिषद् संगठित शाखा. इनकी साधना पद्धति कबीर से बहुत मिलती है.

                                                           राधास्वामी पंथ                                                                
स्वामी नितानंद- यह बीरबल के वंश में पैदा हुए थे. बचपन में इनका नाम नंदलाल था. इनके गुरु गुमानदास ने दीक्षा के बाद इनका नाम नितानंद रख दिया. इनकी रचनाएँ “सत्य सिद्धांत प्रकाश” के नाम से प्रकाशित हैं. वह गुरु को ही ईश्वर का अवतार मानते थे. उनका कहना था कि घट-घट में बसे होने के बाद भी राम के दर्शन सद्गुरु की कृपा के बिना संभव नहीं हैं. ईश्वर को बाहर खोजना व्यर्थ है. वह हर व्यक्ति के अंतर में बसा हुआ है. इन्होंने नितानंदी पंथ की स्थापना की, जिसमें बहुत सारे संत हुए.

संत परमानन्द- इन्होंने परमानंदी पंथ की स्थापना की और भक्ति के अनेक पदों की रचना कि. इनका प्रकाशन “परमानन्द ज्ञान आनंद उदय सागर” और “हंस चेतावनी” के नाम से मिलता है. इनकी साधना पद्धति को “आनंद योग” कहा जाता है.

संत मंगतराम- बीसवीं शताब्दी में हुए इन संत ने समतापंथ की स्थापना की. इन्होंने बहुत कम उम्र में ही योग-ध्यान साधना शुरू कर दी थी और उन्हें बहुत अच्छी अनुभूतियाँ भी हुयीं. वह जीवन भर अविवाहित रहे. उन्होंने सारा जीवन समाज में समरसता बढ़ाने और आडम्बरों के उन्मूलन में लगा दिया. इनके ग्रंथों में “श्री समता प्रकाश”, श्री समता विलास”. “समता आध्यात्मिकता पंथ”, “समता दीपक”, “आध्यात्मिक प्रश्नमाला”, “समता दर्पण” और “समता सन्देश” शामिल हैं.

नामधारी सम्प्रदाय- आध्यात्मिकता की अलख जगाने वाले इस पंथ को कूका सम्प्रदाय भी कहा जाता है. युवा होकर वह सेना में भर्ती हो गये. आध्यात्मिक भाव जागने पर नौकरी छोड़कर संत हो गये. उन्होंने देश को आजाद कराने का संकल्प लिया और आध्यात्मिकता के साथ ही आजादी की लड़ाई में भी सहयोग किया. इनके अनुयाइयों का अंग्रेजों से सीधा संघर्ष हुआ. इस संघर्ष में उनके सैंकड़ों अनुयायी शहीद हुए. हरियाणा और पंजाब में यह सम्प्रदाय आज भी विशिष्ट स्थान रखता है. सतनाम में आस्था रखने के कारण इन्हें नामधारी कहा जाता है. इसमें जातिगत भेदभाव और आडम्बरों का कोई स्थान नहीं है.

इसके अलावा हरियाणा में सिख संप्रदाय का बहुत बोलबाला है. साथ ही यहाँ उदासी संप्रदाय और निर्मला सम्प्रदाय का भी बहुत प्रभाव है. संत घीसादास और उनके पंथ का भी बहुत प्रभाव है.


 

NEWS PURAN DESK 1



हमारे बारे में

न्‍यूज़ पुराण (PURAN MEDIA GROUP)एक कोशिश है सत्‍य को तथ्‍य के साथ रखने की | आपके जीवन में ज्ञान ,विज्ञान, प्रेरणा , धर्म और आध्‍यात्‍म के प्रकाश के विस्‍तार की |
News Puran is a humble attempt to present the truth with facts. To spread the light of knowledge, promote scientific temper, inspiration, religion and spirituality in your life.


संपर्क करें

0755-3550446 / 9685590481



न्‍यूज़ पुराण



समाचार पत्रिका


श्रेणियाँ