संस्कार: महाराजा रघु का कर्तव्य-पालन

संस्कार : महाराजा रघु का कर्तव्य-पालन………….
जरा से लालच के लिए अपने कर्तव्य से मुकर जाना साधारण-सी बात है। यही कारण है कि आदमी ना जीते जी कोई प्रतिष्ठा पाता है और ना मरने के बाद भी उसका कोई यश रह जाता है। कीट-पतंगों की तरह जीते हुए कीट-पतंगों की तरह जीवन समाप्त हो जाता है। ऐसे मिथ्या समय में संस्कार स्तंभ के माध्यम से प्रस्तुत है। महाराजा रघु के कर्तव्य पालन का एक प्रसंग।

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सूर्यवंश में जैसे इक्ष्वाकू, अजमीढ़ आदि राजा बहुत प्रसिद्ध हुए हैं, उसी प्रकार महाराजा रघु भी बड़े प्रसिद्ध, पराक्रमी, नीतिमान, धर्मात्मा, भगवद्भक्त और पवित्रजीवन हो गए हैं। इन्हीं के नाम से 'रघुवंश' प्रसिद्ध हुआ। इसीलिए भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के रघुवर, राघव, रघुपति, रघुवंशविभूषण, रघुनाथ आदि नाम हुए। ये बड़े धर्मात्मा थे। इन्होंने अपने पराक्रम से समस्त पृथ्वी को अपने अधीन कर लिया था। चारों दिशाओं में दिग्विजय करके ये समस्त भूमिखण्ड के एकछत्र सम्राट हुए। ये प्रजा को बिल्कुल कष्ट नहीं देना चाहते थे। 'राज्यकर' भी बहुत ही कम लेते थे और विजित राजाओं को केवल अधीन बनाकर छोड़ देते थे, उनसे किसी प्रकार का कर वसूल नहीं करते थे।

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एक बार ये दरबार में बैठे थे कि इनके पास कौत्स नाम के एक स्नातक ऋषि कुमार आए। अपने यहां स्नातक को देखकर महाराज ने उनका विधिवत स्वागत-सत्कार किया। ऋषिकुमार ने विधिवत उनकी पूजा ग्रहण की और कुशल पूछी। थोड़ी देर बाद ऋषिकुमार चलने लगे, तब महाराज ने कहा-आप कैसे पधारे और बिना कुछ अपना अभिप्राय बताए लौटे क्यों जा रहे हैं?

ऋषिकुमार ने कहा- 'राजन!' मैंने आपके दान की ख्याति सुनी है, आप अद्वितीय दानी हैं। मैं एक प्रयोजन से आपके पास आया था, किंतु मैंने सुना है कि आपने यज्ञ में अपना समस्त वैभव दान कर दिया है। यहां आकर मैंने प्रत्यक्ष देखा कि आपके पास अर्घ्य देने के लिए भी कोई धातु का पात्र नहीं है और आपने मुझे मिट्टी के पात्र से अर्घ्य दिया है, अतः अब मैं आपसे कुछ नहीं कह सकता।

राजा बोले- मुझे अपना अभिप्राय बताइये, मैं यथासाध्य पूरा करने की चेष्टा करूंगा।

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स्नातक ने कहा- 'राजन!' मैंने अपने गुरु के यहां रहकर वेदों का अध्ययन किया है। जब मैंने गुरुजी से गुरुदक्षिणा के लिए प्रार्थना की, तो उन्होंने कहा-'हम तुम्हारी सेवा से ही संतुष्ट हैं, मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए।' गुरुजी के ऐसा कहने पर भी मैं बार-बार उनसे गुरुदक्षिणा के लिए आग्रह करता रहा। तब अंत में उन्होंने झल्लाकर कहा- 'अच्छा तो दक्षिणास्वरूप चौदह लाख स्वर्णमुद्राएं लाकर हमें दो। मैं इसीलिए आपके पास आया था।

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महाराज ने कहा- मेरे हाथों में धनुष-बाण के रहते हुए कोई विद्वान ब्रह्मचारी ब्राह्मण मेरे यहां से विमुख हो जाए, तो मेरे राज-पाट, धन-वैभव को धिक्कार है। आप बैठिए, मैं कुबेर-लोक पर चढ़ाई करके उनके यहां से धन लाकर आपको अवश्य दूंगा।

महाराज ने सेना को सुसज्जित होने की आज्ञा दी। बात की बात में सेना सुसज्जित हो गयी। निश्चय हुआ कि कल प्रस्थान होगा। प्रातः काल कोषाध्यक्ष ने आकर महाराज से निवेदन किया कि राजन् ! रात्रि में स्वर्ण की वर्षा हुई और समस्त कोष स्वर्णमुद्राओं से भर गया है। महाराज ने जाकर देखा कि सर्वत्र स्वर्ण मुद्राएं भरी हैं। वहां जितनी स्वर्ण मुद्राएं थीं, उन सबको महाराज ने ऊंटों पर लदवाकर ऋषिकुमार के साथ भेजना चाहा। ऋषिकुमार ने देखा- ये मुद्राएं तो नियत संख्या से बहुत अधिक हैं, तब उन्होंने राजा से निवेदन किया 'महाराज!' मुझे तो केवल चौदह लाख ही चाहिए। इतनी मुद्राओं का मैं क्या करूंगा, मुझे तो केवल कामभर के लिए चाहिए।

महाराज ने कहा- ये सब आपके ही निमित्त आयी हैं, आप ही इन सबके अधिकारी हैं, आपको ये  सब मुद्राएं लेनी ही होंगी। आपके निमित्त आए हुए द्रव्य को भला, मैं कैसे रख सकता हूं?

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ऋषिकुमार ने बहुत मना किया, किंतु महाराज मानते ही नहीं थे। अंत में कौत्स को जितनी आवश्यकता थी, वे उतना ही द्रव्य लेकर अपने गुरु के यहां चले गए। शेष जो धन बचा, वह सब ब्राह्मणों को दे दिया गया। ऐसा दाता पृथ्वी पर कौन होगा, जो इस प्रकार याचकों का मनोरथ पूर्ण करे? अंत में महाराजा अपने पुत्र अज को राज्य देकर तपस्या करने वन में चले गए। अज के पुत्र महाराज दशरथ हुए, जिन्हें श्रीराम के पिता होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। राजधर्म के आदर्श के रूप में महाराज रघु का नाम सदा स्मरणीय है।

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