सर्पगंधा : उच्च रक्तचाप (High BP) वातिक उन्माद, अनिद्रा एवं अन्य मानसिक विकारों को शमन करने में सर्वोत्तम औषधि

 

सर्पगंधा

sarpgandha-Newspuran
Best medicine for extinguishing high blood pressure (high blood pressure), rheumatism, insomnia and other mental disorders
लैटिन नाम : Rauwolfia Serpentina.
Family: Apocynaceae.
हिन्दी : छोटा चाँद, धवल बरुआ, पागल बूटी।
गुजराती : अमोल पोंदी।
मराठी : अडकई सापसन।

परिचय हिमालय के तराई क्षेत्र में विशेषकर देहरादून शिवालिक पहाड़ी के क्षेत्र से लेकर आसाम तक, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि प्रान्तों में इसकी खेती भी की जाती है तथा स्वयं भी उत्पन्न होती है। इसका क्षुप देखने में सुन्दर तथा १ से ३ फुट तक ऊँचा होता है। इसके पत्र हरे रंग के चमकीले ३ से ७ इंच तक लम्बे, १.५ से २.५ इंच चौड़े, भालाकार, तीक्ष्णाग्र होते हैं। पत्र प्रत्येक गांठ पर ३ से ४ की संख्या में चक्राकार रूप में होते हैं । पुष्प श्वेत या गुलाबी रंग के गुच्छों में होते हैं। फल छोटे मटर के समान जो कच्ची अवस्था में हरे तथा पकने पर बैंगनी काले रंग के हो जाते हैं। मूल सर्प की तरह टेढ़ा-मेढ़ा लगभग १६ इंच तक लंबे, अँगूठे के समान मोटा तथा लम्बी धारियों से युक्त होता है। मूलत्वक् धूसर पीत वर्ण का तथा अंदर का काष्ठ श्वेत वर्ण का, स्वाद में तो कड़वा तथा गंधहीन होता है।

रासायनिक संगठन

इसके मूल में एक तैलीय राल और सर्पेण्टाइन, सर्पेण्ट नाइन आदि अनेक क्षार होते हैं।
गुण : रुक्ष।
वीर्य : उष्ण।
प्रभाव : निद्राजनन।
प्रयोग
रस : तिक्त।
विपाक : कटु।

यह नींद को लानेवाला, ज्वर नाशक, गर्भाशय उत्तेजक एवं विषनाशक है। It is a sleep inducer, fever destroyer, uterine stimulant and antidote

अतिसार, उदरशूल, विषम ज्वर व प्रसूति के समय होने वाले उपक भी इसका उपयोग करते है। सर्पविष में सर्पगंधा मूल को १ से २ तो जल में घिसकर पिलाते हैं तथा सर्पदंश स्थान पर इसका लेप भी करते हैं। बिहार में इसे पागल बूटी भी कहते हैं। बहुत से चिकित्सक इससे पागलों की सफल चिकित्सा करते हैं।

आजकल यह उच्च रक्तचाप (High blood Pressure) वातिक उन्माद, अनिद्रा एवं अन्य मानसिक विकारों को शमन करने में सर्वोत्तम औषधि है। रक्तचाप की अधिकता होने पर पहले केवल इसे ही प्रयोग करना चाहिये। यदि ६ सप्ताह तक प्रयोग करने पर इससे विशेष लाभ न मिले तब अन्य औषधियाँ इसके साथ मिलाकर देते हैं।

प्रयोज्य अंग

मूल।

१ से २ ग्राम।

मंत्र

विशिष्ट योग

सर्पगंधा चूर्ण, सर्पगंधा योग, सर्पगंधा वटी।

सर्पगंधानिद्राप्रदा हृदवसादिनी,
कफवात हरा
कामावसादिनी चैव हन्ति शूल ज्वर कृमि ।
अनिद्रांभूतमुन्मादमपस्मारं भ्रमं
तथा,
अग्निमान्द्य विषं रक्त वाताधिक्यं व्यपोहति ॥


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