जीवन की सात मर्यादाएं

DINESH MALVIYA

जीवन को एक स्वतंत्र और स्वच्छंद प्रवाह मानने वालों की कमी नहीं रही. लेकिन जीवन में स्वतंत्रता और स्वच्छंदता प्राप्त करने का मतलब यह नहीं है कि उसमें कोई मर्यादा नहीं होती. भारत में जीवन की जैसी स्वतंत्रता की अवधारणा की गयी है, वह तो अनूठी है. इसमें मोक्ष और मुक्ति जैसी अवधारणा है, जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलती. विश्व के अन्य धर्मों की अवधारणा स्वर्ग और नरक तक सीमित है. लेकिन भारत में इससे आगे मुक्ति की बात कही गयी है, जो जीवन का परम लक्ष्य है.
वैदिक दर्शन में मुक्ति कि योग्यता प्राप्त करने के लिए सात मर्यादाएं निश्चित की गयी हैं.मर्यादा का अर्थ सीमा है. इन सीमाओं का उल्लंघन न करना हर मनुष्य का कर्तव्य है. इनकी अवहेलना पाप की श्रेणी में आता है. ये मर्यादाएं इस प्रकार हैं- 1. चोरी न करना 2. व्यभिचार न करना 3. नास्तिकता न होना 4. गर्भपात न कराना 5. शराब न पीना 6. दूषित कर्म को बार-बार न करना और 7. पाप करने के बाद उसे छिपाने के लिए झूठ बोलना.
आइये अब इन मर्यादाओं पर संक्षेप में कुछ चर्चा की जाए.
चोरी करने को बहुत बड़ा पाप माना गया है. चोरी का अर्थ किसीकी कोई वास्तु चुरा लेने तक सीमित नहीं है. किसीकी कोई वस्तु हथिया लेने का भाव रखना भी चोरी की श्रेणी में आता है. संक्षेप में कहा जा सकता है कि जो मेरा नहीं है उसे उसे मैं अपना कहूँ, वह चोरी है. मसलन, मैंने जो लेख या कविता नहीं लिखी उसे अपने नाम पर सार्वजनिक रूप से पढूँ या किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा किये गये काम का खुद श्रेय लेने की कोशिश करूँ यह भी चोरी है. इस तरह की चोरी आजकल बहुत बढ़ गयी है.
व्यभिचार वह है जो धर्म और समाज द्वारा जीवन को सुचारू चलाने के लिए आचरण के विपरीत है. पति द्वारा अपनी पत्नी के अलावा और पत्नी द्वारा अपने पति के आलावा किसी अन्य पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध बनाना व्यभिचार कहा जाता है. आज सामाजिक और धार्मिक नियंत्रण में कमी के कारण व्यभिचार की घटनाएं ज्यादा बढ़ गयी हैं. पहले यह शर्म की बात हुआ करती थी, लेकिन आजकल इसमें लोगों में शर्म या संकोच का भाव कम ही दिखाई देता है.
नास्तिकता का चलन भी आज खूब बढ़ता जा रहा है. नास्तिकता का अर्थ है ईश्वर में विशवास न होना. वैसे तो भारतीय दर्शन में नास्तिक दर्शन को भी मान्यता दी गयी है और ईश्वर में विश्वास करने को अनिवार्य नहीं माना गया है. लेकिन यह बहुत ऊंची सोच है, जिस तक पहुँच पाना आसान नहीं होता. चेतना की बहुत ऊँचाई पर पहुँच कर व्यक्ति नास्तिक जैसा लगने लगता है. लेकिन यहाँ जिस नास्तिकता की बात हो रही है, वह सामान्य चेतना वाले लोगों द्वारा ईश्वर पर विश्वास न करने और मनमाना आचरण करने वालों के सन्दर्भ में है. ईश्वर की सत्ता को मानने और उससे डरने के कारण बहुत से अनैतिक काम करने में मनुष्य संकोच करता है. इस अर्थ में नास्तिकता पाप है.
भ्रून्हात्या या गर्भपात करना भी पापों में शामिल है. किसी भ्रूण को माँ के पेट में ही नष्ट करना या करवा देना या इसमें मदद करना बहुत बड़ा पाप माना गया है. किसी जीव को जन्म लेने से पहले ही समाप्त कर देना मानवीयता और प्रकृति के नियम के विरुद्ध है. आजकल बेटे की चाहत में लोग गर्भावस्था में ही होने वाले बच्चे का लिंग परिक्षण करवाते हैं और कन्या का भ्रूण पाय जाने पर उसे नष्ट करवा देते हैं. हालाकि आजकल इसके विरुद्ध कानून बन गया है, लेकिन फिर भी लोग इससे बाज नहीं आते. कुछ डॉक्टर भी इस पाप में सहायक होते हैं. इस पाप से बचना चाहिए. यह बहुत बुरे परिणाम देता है.
शराब पीने का चलन आजकल लगातार बढ़ता जा रहा है. शराब को हरएक धर्म में निन्दित और हराम माना गया है. इसका कारण यह है कि यह हमारी आध्यात्मिक प्रगति में बाधक है. आध्यात्मिक प्रगति के लिए होश में रहना अर्थात सचेत रहना ज़रूरी है, जबकि शराब हमें गाफिल करती है. वर्तमान में शराब पीने को बहुत महिमामंडित भी किया जा रहा है और इसे पीने के लिए परोक्ष रूप से प्रोत्साहित भी किया जा रहा है. विशेषकर नयी पीढी के युवा जीवन के संघर्षों में पस्त होकर या अवसाद को दूर करने के लिए शराब का सहारा ले रहे हैं. लेकिन यह आगे चलकर बहुत घातक सिद्ध होने वाली है. यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बिगाड़ कर जीवन में नरक जैसा बना देगी.
मनुष्य जीवन में गलतियाँ सभी से होती हैं. ऐसा कोई नहीं है, जो गलतियाँ नहीं करता. हमसे कुछ दूषित कर्म भी हो जाते हैं. लेकिन उन कर्मों को बार-बार नहीं करना चाहिए. उनके लिए मन में पछतावा करते हुए उन्हें दुबारा नहीं करने का संकल्प लेना चाहिए.
दूषित कर्म करके मनुष्य उन्हें छुपाने के लिए झूठ पर झूठ बोलता चला जाता है. एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलता है. ऐसा करना बहुत बड़ा पाप है. किसी भी व्यक्ति को अपना पाप और बुरा काम छुपाने के लिए झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए. ऐसा करने से पाप के संस्कार और गहरे होते चले जाते हैं और हम पापों से कभी विमुख नहीं हो पाते.

इन सात वैदिक मर्यादाओं का पालन करके हम अपने जीवन को निर्दोष और पवित्र बना कर जीवन के परम लक्ष्य मुक्ति के लिए खुद को तैयार कर सकते हैं.


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