शबरी पिछले जन्म में रानी थी -दिनेश मालवीय

शबरी पिछले जन्म में रानी थी

-दिनेश मालवीय

भारत में एकसे एक परम भगवत भक्तों की बहुतबड़ी परम्परा परंपरा है. इस परम्परा में एक भी स्त्री भक्त शबरी का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है. इश्वर के प्रति उसका सच्चा अनुराग और निश्छल भक्ति ईश्वर की भक्ति करने वालों के लिए एक आदर्श है. कहते हैं कि ईश्वर के प्रति निष्काम अनुराग जन्म-जन्म तक तपस्या और सद्कर्मों से प्राप्त होता है.

यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे कि वन के भीतर बहुत दरिद्रता में रहकर भगवान की भक्ति करने वाली शबरी पिछले जन्म में एक रानी थी. वह अपने राजा पति के साथ प्रयाग गयी थी. लेकिन परदा प्रथा बहुत अधिक होने के कारण उसे परदे में ही रहना पड़ा, जिसके कारण वह संत के दर्शन से वंचित रह गयी. उसे अपने रानी होने पर बहुत दुःख हुआ. उसने गंगा जी से वर माँगा कि आगे मैं किसी उच्च कुल में जन्म न लूँ और मुझे सुन्दर रूप नहीं मिले. अगले जन्म में मुझे केवल संतों का संग ही मिले. गंगाजी ने उसे यह वरदान दे दिया.

अगले जन्म में शबरी ने भील जाति में जन्म लिया और वह रूपवान नहीं थी. वह साधु-संतों के दर्शन और सत्संग तथा समर्थ गुरु ऋषि मतंग की कृपा से भगवान की परम भक्त बनी और उसने भगवान के साक्षात दर्शन कर मोक्ष लाभ प्राप्त किया. शबरी बे भक्ति की इतनी ऊंची अवस्था प्राप्त कर ली थी की भगवान श्रीराम ने उसके जूठे बैर तक खाए.

भक्तमाल में ऐसा उल्लेख मिलता है कि शबरी वन में निवास करती थी. उसके मन में साधु-संतों की सेवा की बड़ी इच्छा थी. परउसके मन में यह संकोच रहता था  कि  उसका शरीर नीच कुल का है, लिहाजा संतगण उसकी सेवा स्वीकार नहीं करेंगे. इस संकोच के चलते वह उनके पास भी नहीं जाती थी. रात के पिछले पहर में वह छुपकर संतों के आश्रम में जाकर लकड़ियों के बोझ रख आती थी. सुबह-सुबह वह नदी में स्नान करने जाने वाले संतों के मार्ग को बुहार कर साफ़ कर देती थी. कोई भी उसकी इस सेवा को नहीं देख पाता था.

वन में मतंग नाम के एक बहुत उच्च कोटि के ऋषि रहते थे. वह परम विरक्त और भक्तिरस से परिपूर्ण थे. उन्होंने सोचा की तपोवन में ऐसा कौन आ गया है, जो बिना बताये चोरी से सेवा करता है. उन कामन ऐसा करने वाले को देखने के लिए व्याकुल हो उठा. उन्होंने इसका पता लगाने के लिए अपने शिष्यों को पहरे पर लगा दिया. शिष्यों ने उसे पकड़लिया. वह बेचारी संकोच के कारण रोने लगी और मतंगजी के पैरों परगिर गयी. उसे देखते ही ऋषि मतंग की आँखों से जलधारा बह निकली. शबरी के मन में अपनी जाति को लेकर जो संकोच था उसे बाहर करने के लिए ऋषि ने शिष्यों से कहा कि भक्ति से पवित्र हुयी इस स्त्री को आश्रम में एक पर्णकुटी बनाकर दी जाए. उन्होंने उसे राम नाम का मंत्र दिया.

अपना अंतिम समय आने पर मतंगजी ने शबरी से कहा कि मेरी तपस्या पूरी हो गयी है और अब मैं प्रभु की आज्ञा से उनके धाम जा रहा हूँ. तुम इसी आश्रम में रहकर भजन करो और यहीं तुम्हें भगवान के साक्षात दर्शन होंगे. उसने गुरु की आज्ञा का पालन किया और वहीँ भगवान की भक्ति करते हए गुरु के आश्वासन के आधार पर उनकी राह देखती रही. वह वन में से बेर चुन-चुन कर लाती और उन्हें चखकर देखती. जो मीठे होते उन्हें अलग रख देती कि जब श्रीराम आएँगे तो कहीं उन्हें खट्टे बेर न खाने पड़ें.

भगवान तो अन्तर्यामी हैं. वह ऋषियों से शबरी का पता पूछते-पूछते उसके आश्रम में पहुँचे. शबरी ने उन्हने साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और उसकी आँखों से आंसुओं की झड़ी लग गयी. उसने एकत्रित किये गये बेर उन्हें खाने को दिए, जिन्हें भगवान ने यह जानकर भी बहुत प्रेमपूर्वक खाया कि वे उसके जूठे हैं. खाते हुए उन्होंने उनकी प्रशंसा भी की.

श्रीराम का दर्शन और उनकी कृपा प्राप्त कर शबरी परम धाम को गयी.

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