हिन्दू धर्म में “शक्ति“

हिन्दू धर्म में “शक्ति“

विष्णु शक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा। अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते॥

(वि० पू० ६। ७। ६१) इस श्लोक में तीन शक्तियोंका उल्लेख है-पारा विष्णु- शक्ति, अपरा क्षेत्रज्ञ शक्ति और तीसरा विद्या कर्म नामक शक्ति। जीवात्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। तीसरी शक्ति कर्म है। इसीका नामान्तर अविद्या भी है। इसी अविद्याख्य कर्मशक्तिसे वेष्टित होकर क्षेत्रज्ञ नाना प्रकार के संसारतापोंको प्राप्त होता है और नाना योनियों में जाता है। जैसा कि विष्णु पुराण में कहा गया है

नित्यनिर्दोषनिस्सीमकल्याणगुणशालिनी अहं नारायणी नाम सा सत्ता वैष्णवी परा।

(लक्ष्मी० ० ०३।१) अर्थात् महालक्ष्मी कहती हैं कि मैं नित्य, निर्दोष, सीमा रहित, कल्याण गुणों वाली नारायणी नाम वाली वैष्णवी परा सत्ता हूँ। ऊपर ‘शक्ति’ शब्द की व्याख्या हो चुकी है। कारणों में अपृथसिद्ध रहनेवाला कार्योपयोगी धर्म ही शक्ति है।

वह शक्ति दो प्रकारकी है-कुछ तो केवल राम पुत्र है, और कुछ धर्म और धर्मी उभयरूप है। अग्न्यादि भावों की उष्णता आदि शक्तियाँ केवल धर्म हैं। क्षेत्रज्ञ-शक्ति धर्म और धर्मी उभयरूप है।

क्षेत्रज्ञ ईश्वर के प्रति विशेषण होकर धर्म बनते हुए भी स्वयं अनेक धर्मों वाला है, शक्तिमान भी है। इन दो प्रकारकी शक्तियों में भी श्री महालक्ष्मी द्वितीय कोटि की शक्ति है। स्वयं परमात्मा का विशेषण होती हुई धर्म होकर भी वह अनेक गुणधर्म वती एवं शक्तिमान भी है।

पहले जो ‘विष्णु शक्तिः परा प्रोक्ता’ इत्यादि विष्णु पुराण के वचन उद्धृत किये थे, उनमें जो ‘विष्णु शक्ति’ कही गयी है वह क्या है? इस विषयमें व्याख्याकारों ने नाना प्रकार के मत प्रदर्शित किये हैं, किन्तु हम यह समझते हैं कि वह विष्णु शक्ति ही ‘अहंता ‘ नामवाली महालक्ष्मी है।

उसके वचन में अपरा शक्ति और अविद्याशक्ति के विषयमें जैसा स्पष्टीकरण किया गया है वैसा स्पष्टीकरण विष्णु शक्ति के विषय में नहीं किया गया है, केवल एक विष्णु शक्ति का उल्लेख मात्र कर दिया गया है। किन्तु इसका स्पष्टीकरण अहिर्बुध्य संहिता के निम्नलिखित वचनसे हो जाता है।

अहिर्बुध्न्यसंहिता के तीसरे अध्याय में ‘तस्य शक्तिश्च का नाम’ अर्थात् उस परब्रह्म की शक्ति का क्या नाम है? नारद के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए अहिर्बुध्य कहते हैं

शक्तयस्सर्वभावानामचिन्त्या अपृथस्थिताः। स्वरूपे नैव दृश्यन्ते दृश्यन्ते कार्यतस्तु ताः॥२॥ सूक्ष्मावस्था हि सा तेषां सर्वभावानुगामिनी। इदन्तया विधातुं सा न निषेद्धुं च शक्यते ॥ ३ ॥ सर्वैरननुयोज्या हि शक्तयो भावगोचराः ।४तामादिशक्तिं धिय।भावाभावानुगा तस्य सर्वकार्यकरी विभोः॥५॥

अर्थात् समस्त भावोंकी अपृथक्स्थित शक्तियाँ अचिन्त्य हैं। पदार्थोंकी शक्तियाँ कार्यद्वारा ही दृश्यमान होती हैं स्वरूपतः नहीं। यह समस्त भावोंके साथ-साथ रहनेवाली सूक्ष्मावस्था है। उसको ‘यह है वह शक्ति’ इस तरह दिखला कर सिद्ध नहीं कर सकते, किन्तु ‘नहीं’ भी नहीं कर सकते। बालों में रहने वाली शक्तियां तर्क का विषय नहीं हैं, इसी प्रकार परमात्मा की शक्ति भी चन्द्रमा के साथ चाँदनी की भाँति सर्व भावों में रहती है। भावरूप और अभावरूप पदार्थों में रहने वाले परमात्मा की वह शक्ति ही समस्त कार्यों को करती है। इस प्रकार सामान्यतया निरूपण करनेके पश्चात् जगत्तया लक्ष्यमाणा सा लक्ष्मीरिति गीयते। श्रयन्ती वैष्णवं भावं सा श्रीरिति निगद्यते॥ ९ ॥ अव्यक्तकालपुंभावात्सा पद्मा पद्म मालिनी। कामदानाच्च कमला पार्यायसुखयोगतः॥१०॥ विष्णोस्सामर्थ्यरूपत्वाद्विष्णुशक्तिः प्रगीयते॥११॥

इन श्लोकों में उसी परब्रह्म शक्ति के लक्ष्मी श्री, पद्मा, पद्म मालिनी, कमला इत्यादि नाम निर्वाचन पूर्वक बताकर उसीको विष्णुशक्ति बताया है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि विष्णु पुराणोक्त परा विष्णु शक्ति श्री महालक्ष्मी ही हैं, जिनके कमला, पद्मा, श्री इत्यादि नामान्तर भी हैं। वही अहंता नामसे भी कही जाती हैं।


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