षण्मुखी-मुद्राः(Shanmukhi mudra)- षण्मुखी-मुद्रा….तत्त्वज्ञान या विद्यातत्त्व देने वाली योग मुद्रा

षण्मुखी-मुद्राः(Shanmukhi mudra)- षण्मुखी-मुद्रा….तत्त्वज्ञान या विद्यातत्त्व देने वाली योग मुद्रा

षण्मुखी-मुद्रा

(shanmukhi mudra)षण्मुखी-मुद्राः-षण्मुखी-मुद्रा अन्य सभी मुद्राओं में एक ‘अहं’ भूमिका वाली मुद्रा है । इतनी प्रभावी अन्य कोई मुद्रा नहीं होती । इसके प्रारम्भिक अभ्यास में या अभ्यास के शुरूआत में थोड़ी-बहुत मात्रा में कठिनाई या परेशानी होती है जो कुछ दिनों के बाद ठीक होकर स्वाभाविक गति-विधि में बदल जाती है । प्रत्येक मानव जो मानवता का यथार्थ आनन्द लेना चाहता हो तो उसे यह मुद्रा अवश्य करनी चाहिये । तत्त्वज्ञान या विद्यातत्त्वं तो आनन्द प्रदान करने वाली यानी आनन्द बांटने वाली तथा मुक्ति और अमरता देने वाली सर्वोत्तम् पद्धति है परन्तु लेने वाली उत्तम-पद्धति षण्मुखी मुद्रा(shanmukhi mudra) ही होती है और किसी भी मुद्रा में वह आनन्द तथा अभीष्ट लाभ नहीं मिल पाता है जिसकी प्राप्ति तथा अनुभूति षण्मुखी मुद्रा(shanmukhi mudra) में होती है ।

पञ्च-तत्त्वों की पृथक्-पृथक् अनुभूति तथा पहचान करने की यह अन्य समस्त अनुभूति परक जानकारियों की श्रेष्ठ और उत्तम पद्धति है । पञ्च-पदार्थ-तत्त्वों तथा आत्म-ज्योति या दिव्य-ज्योति या ब्रह्म-ज्योति की पृथक्-पृथक् अनुभूति करनी हो तो यह मुद्रा अवश्य करनी चाहिये । अभीष्ट वस्तु प्राप्ति की भी श्रेष्ठतर तथा उत्तमतर पद्धति है । सक्षम गुरु के बगैर लाभ सन्देह ही होता है ।

षण्मुखी-मुद्रा की प्रक्रियाः- षण्मुखी मुद्रा की प्रक्रिया में दोनों नासापुटों (नासाछिद्रों) को दोनों मध्यमा अंगुलियों से; दोनों कानों को हाथ के दोनों अंगूठों से; दोनों नेत्रों को हाथ की दोनों तर्जनी अगुंलियों से तथा मुख को शेष अनामिका तथा कानी अंगुलियों से अच्छी प्रकार बन्द करके दृढ़तापूर्वक स्थिर भाव से नाक, नेत्र, श्रोत और मुख के द्वारा इनकी कोई अपनी क्रिया या गति-विधि न हो सके, तत्पश्चात् ध्यान-साधना ये तीसरी दृष्टि या शिव-नेत्र या दिव्य-दृष्टि से भू-मध्य स्थित आज्ञा-चक्र में स्थिर-भाव से देखा जाय । इस प्रक्रिया से मन शरीर में इन्द्रियों के द्वारों को बन्द देखकर विषय-भोग हेतु बाह्य वृत्तियों से अवरोधित हो जाता है, तब इसकी परेशानी बढ़ जाती है और वह भीतर ही भीतर सब तरफ आनन्द की खोज में व्यग्र हो जाता है । अन्दर ही अन्दर जिधर जाता है उधर ही अन्धकारमय देखता है। ब्रह्माण्ड भी उसे अन्धकारमय ही दिखलायी देता है जिससे उसकी परेशानी और व्यग्रता और ही बढ़कर आत्म-रक्षार्थ आत्मा की तलाश या खोज में लग जाता है । अभ्यास की दृढ़ता से चिदानन्द रूप ब्रह्मदर्शन करने में सफल हो जाता है और जब तक मुद्रा की स्थिति रहती है तब तक मन (योगियों की दृष्टि में), जीव (ज्ञानियों की दृष्टि में) बाह्य विषय-भोगी वृत्तियों से निवृत्त रहता हुआ आत्मानन्द या चिदानन्द या ब्रह्मानन्द या दिव्यानन्द रूप आत्म-ज्योति या चेतन ज्योति या ब्रह्म-ज्योति या दिव्य-ज्योति का दरश-परश करता हुआ उसी आनन्दमय अवस्था में पड़ा रहता है जो असम्प्रज्ञात् या निर्विकल्प या निर्बीज या निर्विचार समाधि-अवस्था कहलाता है । यही योग-साधना; स्वर-संचार-साधना तथा मुद्रा की अन्तिम अवस्था या उपलब्धि है । यही चेतन-आत्मा की स्थिति है ।
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Priyam Mishra



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