समस्त पापों को नष्ट करने वाला शिव तत्वज्ञान

पवित्र शिव महापुराण
पृष्ठ संख्या- 558 – 559
कोटिरुद्रसंहिता

सूत जी ने ऋषियों को जैसा शिव तत्त्व ज्ञान के बारे में जैसा सुनाया ठीक वैसा .........

सूत जी ने कहा- ऋषियों मैने जैसा शिव ज्ञान सुना है वैसा मै तुम लोगों को बता रहा हूँ तुम सब लोग सुनों, यह अत्यंत गुड़ और मोक्षस्वरूप है। ब्रह्मा, नारद, सनकादिक, मुनि व्यासः तथा कपिल – इनके समाज में इन्ही लोगों ने निश्चित करके ज्ञान का जो स्वरूप बताया है उसे ही यथार्थ ज्ञान समझना चाहिए। सम्पूर्ण जगत शिवमय है यह ज्ञान सदा अनुशीलन करने योग्य है। सर्वज्ञ विद्वान को निश्चित रूप से जानना चाहिये कि शिव सर्वमय है। ब्रह्मा से तृणपर्यन्त जो कुछ जगत दिखाई देता, यह सब शिव ही है। वे महादेव जी ही शिव कहलाते हैं। जब उनकी इच्छा होती है, तब वे इस जगत की रचना करते हैं। वे ही सबको जानते हैं, उनको कोई नही जानता। वे इस जगत की रचना करके स्वयं इसके भीतर प्रविष्ट होकर भी इससे दूर हैं। वास्तव में उनका इसमें प्रवेश नही हुआ है; क्योंकि वे निर्लिप्त, सचिदानंद स्वरूप हैं। जैसे सूर्य आदि ज्योतियों का जल में प्रतिबिम्ब पड़ता है वास्तव में जल के भीतर उनका प्रवेश नही होता है, उसी प्रकार साक्षात शिव के विषय में समझना चाहिये। वास्तुतः तो वे ही सबकुछ हैं, मतभेद समझना ही अज्ञान है। क्योंकि शिव से भिन्न किसी दैत्य वस्तु की सत्ता नही है। सम्पूर्ण दर्शन में मतभेद ही दिखाया जाता है, परन्तु वेदांती नित्य अदैत्य तत्व का वर्णन करते हैं। जीव परमात्मा शिव का ही अंश है, लेकिन अविद्या से मोहित होकर अवश हो रहा है और अपने को शिव से भिन्न समझता है। अविद्या से मुक्त होने पर वह शिव ही हो जाता है। शिव सबको व्याप्त करके स्थित है और सम्पूर्ण जंतुओं में व्यापक है। वे जड़ और चेतन-  सबके ईश्वर होकर स्वंय ही सबका कल्याण करते हैं। जो विद्वान पुरूष वेदांत मार्ग का आश्रय ले उनके साक्षात्कार के साधना करता है, उसे वह साक्षात्कार रूप अवश्य प्राप्त होता है। व्यापक अग्नितत्व प्रत्येक काष्ठ में स्थित है; परन्तु जो उस काष्ठ का मंथन करता है वही असंदिग्ध रूप से अग्नि को प्रकट करके देखता है। उसी तरह जो बुद्धिमान यहां भक्ति आदि साधनों का अनुष्ठान करता है, उसे अवश्य शिव का दर्शन प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। सर्वत्र केवल शिव है, शिव है, शिव है; दूसरी कोई वस्तु नही है। वे शिव भ्रम से ही सदा नाना रूपों में भासित होते हैं।
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जैसे समुद्र, मिट्टी और सुवर्ण (सोना-चांदी) उपाधि भेद से नाना तत्वों को प्राप्त होते हैं,  उसी प्रकार भगवान शंकर भी उपाधियों से ही नाना प्रकार के रूप में भासते हैं। कार्य और कारण में वास्तविक भेद नहीं होता। केवल भ्रम से भरी हुई बुद्धि के द्वारा ही इसमें भेद की प्रतीति होती है। भ्रम दूर होते ही भेद बुद्धि का नाश हो जाता है। जब बीज से अंकुर उत्पन्न होता है तब वह नाना तत्वों को प्रकट करता है; फिर वह अन्त में बीज  रूप में ही स्थिति होता है, और अंकुर नष्ट हो जाता है। ज्ञानी बीज रूप में स्थित है और नाना प्रकार के विकार अंकुर रूप है। उन विकार रूप अंकुरों की निवृत्ति हो जाने पर पुरूष फिर ज्ञान रूप स्थित होता है- इसमें अन्यथा विचार नही करना चाहिए। सब कुछ शिव है, और शिव ही सब कुछ है। शिव तथा नही है। उनकी शरण लेकर जीव संसार बंधन से छूट जाता है। ब्राह्मणों! इस प्रकार वंहा पधारे ऋषियों ने निश्चय करके जो यह ज्ञान की बात बताई है, इसे अपनी बुद्धि के द्वारा प्रयत्न पूर्वक धारण करना चाहिए।
मुनिस्वारों! तुमने जो कुछ पूछा था वह सब कुछ मैने तुम्हे बात दिया। इसे तुम्हे प्रयत्न पूर्वक गुप्त रखना चाहिए। बताओ अब और क्या सुनना चाहते हो। ऋषि बोले- व्यासः शिष्य! आपको नमस्कार है। आप धन्य हैं, शिव भक्तों में श्रेष्ठ हैं। आपने हमे शिवतत्त्व संबंधी परम् उत्तम ज्ञान का श्रवण कराया है। आपकी कृपा से हमारे मन की भ्रांति मिट गयी। हम आपसे मोक्षदायक शिवतत्त्व का ज्ञान पा कर बहुत संतुष्ट हैं।
सूत जी ने कहा- द्विजो जो नास्तिक हो, श्रद्धाहीन हो और हठ हो, जो भगवान शिव का भक्त न हो तथा इस विषय को सुनने की रुचि न रखता हो, उसे इस तत्वज्ञान का उपदेश नही देना चाहिये।
व्यास : जी ने इतिहास, पुराणों, वेदों और शास्त्रों का बारंबार विचार करके उनका सार निकाल कर मुझे उपदेश दिया है। इसका एक बार श्रवण मात्र से सारे पाप भस्म हो जाते हैं, अभक्त (जो भक्त नही है) भक्ति प्राप्त होती है,  और जो भक्त है उसकी भक्ति बढ़ती है, दोबारा सुनने से उत्तम भक्ति प्राप्त होती है। तीसरी बार सुनने से मोक्ष प्राप्त होता है। अतः भोग और मोक्ष फल की इच्छा रखने वाले लोगों को बारंबार इसका श्रवण करना चाहिए। उत्तम फल को पाने के उद्देश्य से इस पुराण की पांच आवृतियाँ करनी चाहिए। ऐसा करने पर मनुष्य उसे अवश्य पाता है इसमें संदेह नहीं है; क्योंकि यह व्यास जी का वचन है। जिसने इस उत्तम पुराण को सुना है उसे कुछ भी दुर्लभ नही है।
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यह शिव विज्ञान भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। यह भोग और मोक्ष देने वाला शिव भक्ति को बढ़ाने वाला है। इस प्रकार मैने शिव पुराण की यह चौथी आनंददायिनी तथा परम् पुण्यमयी सहिंता कही है, जो कोटिरुद्रसंहिता के नाम से विख्यात है।

जो पुरूष एकाग्रचित्त हो भक्तिभाव से इस सहिंता को सुनेगा या सुनायेगा, वह समस्त भोगों का उपभोग करके अंत में परमगति को प्राप्त कर लेगा।

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