श्रीकृष्ण न होते तो महाभारत का परिणाम कुछ और होता -दिनेश मालवीय

श्रीकृष्ण न होते तो महाभारत का परिणाम कुछ और होता

-दिनेश मालवीय

बचपन में हर जन्माष्टमी को माँ एक आरती गाती थीं, जसकी एक पंक्ति में कहा गया है कि- “नाथ पांडव को अपनाए, विजय भारत में करवाए”.

इस पंक्ति का अर्थ बहुत तो समझ नहीं आता था, लेकिन इतना जरूर समझ आता था कि यदि श्रीकृष्ण पांडवों के साथ नहीं होते तो, महाभारत युद्ध का परिणाम दुर्योधन, यानी असत्य के पक्ष में जाना निश्चित था. आगे चलकर मैंने इस सम्बन्ध में माँ से कुछ प्रश्न किये जिनके उत्तरों और कुछ और बड़ा होकर शास्त्रों को पढने पर यह बात पूरी तरह समझ में आ गयी, कि युद्ध तो सच पूछिए श्रीकृष्ण ने ही किया. युद्ध के हीरो अर्जुन और सभी योद्धा तो माध्यम भर थे.

श्रीकृष्ण ने स्वयं परमात्मा होते हुए भी अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार किया. इस भूमिका में उन्होंने अर्जुन के जीवन की रक्षा की. श्रीकृष्ण जानते थे कि जबतक कर्ण अर्जुन से अधिक बलवान है. जब तक उसके कवच-कुंडल उसके पास हैं, तबतक उसे पराजित करना संभव नहीं है. उन्होंने देवराज इंद्र को भेजकर कर्ण से कवच-कुण्डल उतरवा लिए. इसके बावजूद कर्ण बहुत बलशाली था. श्रीकृष्ण ने जान बूझ कर अनेक बार अर्जुन का कर्ण से सीधा सामना नहीं होने दिया. लेकिन जब सामना हो ही गया, तब गुरु परशुराम के श्राप के कारण कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस गया. वह पहिया जमीन से निकालने में लग गया. भगवान ने अर्जुन से कहा कि यही समय है कि कर्ण का वध कर दो. अर्जुन ने ना-नुकर की तो श्रीकृष्ण ने उसे लगभग डाँटते हुए ऐसा करने को कहा. तब कहीं अर्जुन ने उसका वध किया.

कर्ण के पास एक ऐसी अमोघ शक्ति थी, जिसे उसने अर्जुन के वध के लिए बचा कर रखा था. श्रीकृष्ण इस रहस्य को जानते थे. उन्होंने युद्धभूमि में ऐसी स्थ्तियाँ पैदा कर दीं कि मजबूर होकर कर्ण को इस शक्ति का भीम-पुत्र घटोत्कच पर प्रयोग करना पड़ा. यदि ऐसा नहीं होता तो अर्जुन का बचना मुश्किल था.

गांधारी का पांडवों के प्रति कोई बुरा भाव नजर कभी नहीं आया, लेकिन जब उसने पाया कि उसके निन्यानवे पुत्र मारे गये हैं और अकेला दुर्योधन बचा है, जो भीम के साथ गदा युद्ध करने जा रहा है, तो उसने दुर्योधन का शरीर वज्र का करने का निश्चय किया. उसने कहा कि वह नग्न होकर उसके सामने आये. श्रीकृष्ण ने लीला करके दुर्योधन से कहा कि युवा होकर भी माता के सामने नग्न जाओगे. इस पर दुर्योधन ने अपनी जाँघों पर केले का पत्ता लपेट लिया. जब गांधारी ने आँखें खोलकर दुर्योधन का शरीर वज्र का बना दिया, तो केले के पत्ते की वजह से उसका जांघ का हिस्सा कमजोर रह गया. भीम ने इसी हिस्से पर प्रहार कर उसका वध किया.

अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु के छलपूर्वक वध में प्रमुख भूमिका निभाने वाले सिन्धु नरेश जयद्रथ का वध भी श्रीकृष्ण की युक्ति से ही हो सका, अन्यथा अर्जुन को अपनी शपथ के अनुसार अग्नि में प्रवेश कर जाना होता. उन्होंने छल से सूरज को कुछ क्षण के लिए छुपा दिया और जयद्रथ समझा कि सूर्यास्त हो गया. वह बाहर आ गया और अर्जुन ने उसका वध कर दिया.

अपाराजेय द्रोण और भीष्म पितामह का वध भी श्रीकृष्ण की सूझबूझ और युक्ति के कारण ही हो सका. इन दोनों का वध नहीं होता तो यह युद्ध कभी पांडवों के पक्ष में जा ही नहीं सकता था. शिखंडी को अर्जुन के आगे रख कर उन्होंने भीष्म का वध करवाया जबकि द्रोण का वध युधिष्ठिर से आधा झूठ बुलवाकर करवा दिया.

इसके अलावा घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक को भी उन्होंने युक्ति से युद्ध भूमि से दूर रखा. उसका प्रण था कि जो भी पक्ष हार रहा होगा वह उसके पक्ष में लड़ेगा. ऎसी स्थिति मी वह कौरवों की तरफ से मैदान में उतर जाता. श्रीकृष्ण जानते थे कि इससे पांडव बहुत संकट में पड़ जायेंगे. उन्होंनेयुक्ति से काम लिया. वह ब्राह्मण का भेष बनाकर बर्बरीक के पास गये और उसका शीश दान में माँग लिया. वह महादानी था, लिहाजा उसने अपना सिर दान कर दिया. श्रीकृष्ण ने उसे कलियुग में अपने नाम से पूजित होने का जिस जगह वह शीश रखा था उसका नाम खाटू था. इसीलिए उसे खाटू श्याम कहा जाता है. भारत और दूसरे देशों में रहने वाले हिन्दू खाटू श्याम को अपना आराध्य मानकर उनकी पूजा करते हैं.

इस प्रकार हम देखते हैं, कि यदि भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी युक्तियों से महाभारत युद्ध् में पांडवों की मदद न की होती तो उनका विजय पाना संभावित नहीं था. माँ के द्ववारा गयी जाने वाली आरती की इस पंक्ति का अर्थ अब मुझे पूरी तरह समझ में आ गया है.

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