श्रीराम और रामायण लोकव्यापी -दिनेश मालवीय

श्रीराम और रामायण लोकव्यापी

-दिनेश मालवीय

भारत के इतिहास में 5 अगस्त 2020 को एक स्वर्णिम अध्याय लिखा जा रहा है. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस दिन एक नए युग का श्रीगणेश होने जा रहा है. भगवान श्रीराम के जन्म-स्थान पर सैंकड़ों वर्षों के संघर्षों और हजारों लोगों की बलिदानी के बाद भव्य श्रीराम मंदिर का शिलान्यास होने जा रहा है. पूरे भारत ही ही नहीं, दुनिया के अनेक देशों में रहने वाले हिन्दुओं के मन में इसे लेकर अपर उत्साह और उल्लास है. भगवान श्री राम जन-जन के ह्रदय में बसे हैं. साहित्य, कला, संगीत, चित्रकारी सहित कला की सभी लोक और शास्त्रीय विधाओं में श्रीराम प्रमुख विषय रहे हैं.

दुनिया में शायद ही ऐसा कोई और चरित्र हो जिस पर इतना अधिक लिखा गया हो. हालाकि देश-काल और परिस्थिति के अनुरूप उनके वर्णन और कथानक में विविधता है, लेकिन मूल चरित्र एक ही है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने श्रीराम को शील, शक्ति और सौन्दर्य का समन्वय निरूपित किया है. राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त ने कहा कि- "राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बनजाए सहज स्वाभाव्य है."

श्रीराम के चरित्र को आदिकवि वाल्मीकि ने सबसे पहले काव्य रूप में रचा. गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस करोड़ों हिन्दुओं के मन में इस तरह रची-बसी है कि वह उनके जीवन का अविभाज्य अंग बन गयी है. भारत के लगभग सभी प्रदेशों की स्थानीय भाषाओं में रामायण की रचना करने का लोभ वहाँ के प्रतिष्ठित कवि संवरण नहीं कर पाए. उन्होंने अपनी भाषा में रामायण लिखकर  अपने जीवन और कवि-कर्मकी सार्थकता मानी.

तमिल में महर्षि कम्ब ने 'कम्बरामायण' लिखी जोबहुत ही अद्भुत साहित्यिक कृति है. मराठी ने संत एकनाथ ने "भावार्थ रामायण" की रचना की, जिसे मराठी भाषी लोग बहुत श्रद्धा से पढ़ते हैं. बंगाली में महकवि कृतिदास ओझा ने रामायण लिखी जिसे 'कृतिवास रामायण' के नाम से जाना जाता है. तेलुगु में गोनबुद्धा रेड्डी ने 'रंगनाथ रामायण' लिखी. कन्नड़ में अभिनव पम्प नाग्चंद्र ने 'रामचन्द्र चरित' की रचना की. मलयालम में तुनवत्त एलुताच्च्म ने और चक्वस्त ने उर्दू में रामायण की रचना की. उड़िया में सारला दास ने' विलंका रामायण' की रचना की. संस्कृत में ही 'अद्भुत रामायण' भी है. असमिया में शंकर देव ने' राम विजय नाटक' लिखा,. हिमाचल प्रदेश में पहाड़ी लोक रामायण है तो पंजाबी में भी रामकाव्य की समृद्ध परम्परा है. हरियाणा' हरियाणवी' रामायण है. इसके अलावा भी अनेक रामायण हैं, जैसे आनन्द रामायण, राधे श्याम रामायण, बरवे रामायण, केशव की रामचंद्रिका आदि. तुलसीदास ने स्वयंकहा है कि- "नाना भाँति राम अवतारा, रामायण सत कोटि अपारा."

उर्दू में भी रामकाव्य कोई कम नहीं है. उर्दू के महान शायर अल्लामा इकबाल ने श्रीराम को " इमामे हिन्द" कहा है और उनके चरित्र को लेकर एक बड़ी नज़्म लिखी है. रामायण का उर्दू में अनेक लोगों ने अनुवाद किया. जगन्नाथ लाल "खुश्तर" ने मसनवी की तर्ज पर रामायण का उर्दू में अनुवाद किया. पंडित सूरजभान ने "वाकयेरामचंदर" शीर्षक से रामायण का अनुवाद किया. हफीज जालंधरी ने "अंजुमरामकथा" की रचना की.   नफीसा खलीली ने "राम कहानी" लिखी". श्रीराम पर बड़ी संख्या में उर्दू नज़में लिखी गयीं.

विभिन्न अंचलों के लोक गीतों में श्रीराम का चरित्र बहुत महत्वपूर्ण विषय रहा है.

भारत ही नहीं दुनिया के अनेक देशों में श्रीराम की कथा का बहुत प्रचलन है. तिब्बत, खोतान, चीन, मंगोलिया, साइबेरिया, जापान, इंडोनेशिया, थाईलैंड, सूरीनाम, मॉरिशस, कम्बोडिया, लाओस, म्यामार, श्रीलंका, फिलीपींस सहित अनेक देशों में श्रीराम को अपना आराध्य मानने वालों की कमी नहीं है. वहां रामायण बहुत लोकप्रिय है.

भारतीय समाज को संस्कारित बनाए रखने में रामलीला और कथा कारों के प्रवचन की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है. जो लोग पढ़े-लिखे नहीं थे या जो रामायण को नहीं पढ़ सकते थे, उन्होंने इन्हीं के माध्यम से श्रीरामके उदात्त चरित्र और गुणों को जीवन में उतारा. उनका चरित्र लोग व्यवहार में इतना अधिक बसा हुआ है कि आधुनिक युग की लाख बुराइयों के बाद भी अभी तक हमारा पूरी तरह सांस्कृतिक पतन नहीं हुआ है और न होगा. अनपढ़ व्यक्ति को भी रामचरित मान की कुछ चौपाइयां मुखाग्र मिल जाती हैं. बड़े शहरों में तो बहुत कम, लेकिन कस्बों और गांवों में लोग आज भी आपस में मिलने पर 'राम राम' ही करते हैं. मैंने बुंदेलखंड में देखा कि मुस्लिम भी किसी हिन्दू परिचित से मिलने पर 'राम राम' या 'जय रामजी की' कहकर ही अभिवादन करते हैं.

श्रीराम का चरित्र इतना उदात्त और आदर्श है कि कोई भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता. उन्होंने संबंधों और कर्तव्यपालन के ऐसे उच्च मानदंड स्थापित किये हैं, जो किसी को भी उनके प्रति श्रद्धावन तक  कर देते हैं. वे केवट को गले लगाते हैं, तो जटायु को पिता के जैसा सम्मान देते हैं, उन्होंने वानर भालुओं को अपना प्रिय बनाया. भीलनी शबरी के जूठी बैरखाए. कभी किसी का तिरस्कार नहीं किया. यहाँ तक कि अपने परम शत्रु रावण तक का वह सम्मान करते थे. पिता के वचन का पालन करने के लिए उन्होंने विशाल साम्राज्य को तिनके की तरह त्याग दिया. उनकेचेहरे पर शिकन तक नहीं आयी.

हमकह सकते हैं कि आज अयोध्या में श्रीराम मंदिर के शिलान्यास के साथ ही भारतके साथ ही विश्व में मानव मूल्य आधारित व्यवस्था का शुभारम्भ होगा..

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