श्रीराम ने सिखाया दूसरे के सुख में हर्षित होना -दिनेश मालवीय

श्रीराम ने सिखाया दूसरे के सुख में हर्षित होना -दिनेश मालवीय

dinesh

श्रीराम का चरित्र युगों-युगों से भारत में आदर्श माना जाता रहा है. हम उनकी भगवान् के रूप में पूजा करते हैं. उनमें अनेक ऐसे दैवीय गुण हैं, जो सामान्य मनुष्यों में नहीं मिलते. उन्होंने मनुष्य के रूप में जो महानतम आदर्श प्रस्तुत किये हैं, उनमें दूसरों के सुख में हर्षित होना भी शामिल है.

राम को जब वनवास होता है, तो वह अपनी माता कोशल्या के पास अनुमति लेने जाते हैं. माता जब इस बात पर दुःख व्यक्त कर उदास होती हैं, तो राम उनसे कहते हैं कि भाई भरत को राज्य मिल रहा है, इससे मुझे बहुत प्रसन्नता है. इसके पहले भी जब उनको यह जानकारी मिलती है कि उन्हें राज्य दिया जा रहा है, तो वह मन में यही सोचते हैं कि रघुकुल में यही एक अनुचित रीति है कि सबसे बड़े भाई को राज्य दिया जाता है. उनके मन में तब भी यही भाव रहता है कि राज्य भरत को मिल जाए.

 

 

यह आदर्श आज के समय में मिलना बहुत मुश्किल है. अधिकतर लोग अपने दुःख के कारण नहीं, बल्कि दूसरों के सुख के कारण दुखी हैं. दूसरे की सुख-सम्पत्ति की बात तो छोडिये, हम किसी के भीतर अच्छे गुण देखकर तक दुखी हो जाते हैं. जिस भी मनुष्य में राग-द्वेष भरा हो, वह आध्यात्मिक रूप से कभी उन्नत नहीं हो सकता.

इस सन्दर्भ में एक बहुत प्रचलित प्रसंग सहज ही याद हो आता है. एक बार एक व्यक्ति ने किसी से प्रेरणा लेकर भगवान् शंकर की बहुत आराधना की. वह आराधना तो करता था, लेकिन उसके मन में अपने पडौसी के प्रति बहुत द्वेष भावना थी. भगवान् शंकर तो ठहरे भोलेनाथ और अवढर दानी. जिस पर प्रसन्न हो गये, तो फिर उसकी पात्रता आदि कहाँ देखते हैं. इसी कारण उन्हें कई बार खुद परेशानियों का समना करना पड़ता है. उनसे वरदान पाकर कई लोग उनके ही शत्रु होकर उनको सताने लगे. भस्मासुर का बहुत प्रसिद्ध उदाहरण है.

बहरहाल, शंकरजी ने उस भक्त की आराधना से प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा. शंकर जी बोले कि तू जो कुछ मांगेगा, उसका दोगुना तेरे पड़ौसी को मिल
जाएगा. उस व्यक्ति के मन में अपने पड़ौसी के प्रति बहुत बैर भाव था, क्योंकि वह उससे अधिक गुणवान था. लिहाजा उसने शंकरजी से यह वरदान माँगा कि मेरी एक आँख फूट जाए. उसका भाव यह था कि यदि उसकी एक आँख फूट जाए तो पड़ौसी की दोनों ऑंखें फूट जाएँगी. इस पर लोग हँस सकते हैं, लेकिन यह मनुष्य की बहुत आम प्रवृति का द्योतक है. हमारे देश में अधिकतर संदेश कथाओं के माध्यम से ही दिए गये हैं.

मनुष्य में इसी प्रवृत्ति को देखते हुए संत तुलसीदास ने “रामचरितमानस” में अनेक उदहारण दिए हैं, जिनमें दूसरे का नुकसान करने के कारण कई लोग खुद भी बर्बाद होने को राजी हो जाते हैं. उन्होंने ऐसे लोगों को खल कहकर उनकी वंदना तक की है. असल में यह व्यंग्य है. तुलसीदास जी लिखते हैं कि मैं सच्चे भाव से दुष्टों को प्रणाम करता हूँ, जो बिना ही प्रयोजन, अपना हित करने वाले के भी प्रतिकूल आचरण करते हैं. दूसरे के हित की हनी ही जिनकी दृष्टि में लाभ है. जिनको दूसरे के उजड़ने में हर्ष और बसने में विषाद होता है. वे दूसरे की बुराई करने में सहस्त्रबाहु के सामान वीर हैं. वे दूसरे के दोषों को हज़ार आँहों से देखते हैं. दूसरे के हित रूपी घी के लिए जिनका मन मक्खी के सामान है. घी में गिर कर मक्खी उसे खराब कर देती है, लेकिन खुद भी मर जाती है. ओले खेती को नुकसान पहुंचाकर खुद भी नष्ट हो जाते हैं.

मुझे भी कुछ प्रसंग याद आ रहे हैं. एक बार मेरे घर के सामने रहने वाले सज्जन अपना मकान तुड़वाकर नया बनवा रहे थे. मेरे पास रहने वाले एक सज्जन मेरे पास आये. वह कहने लगे कि, “देखिये सामने वाले महोदय कितना बड़ा और शानदार मकान बनवा रहे हैं. अरे, हमने उन्हें इसी शहर में चप्पल चटकाते घुमते देखा है. खूब दो नंबर की कमाई आ गयी है.”

उनका दुःख यह था कि सामने वाला नया मकान क्यों बना रहा है. सामने वाले का मकान बनने से न उन्हें कोई नुकसान होने वाला और न उसने इसमें उनकी कोई मदद मांगी है. लेकिन इसका कारण ईर्ष्या है. यदि उसने भगवान् राम के आदर्श को माना होता तो वह यह कहता कि,” सामने बड़ा सुन्दर मकान बन रहा है. इससे हमारी कॉलोनी की शोभा बढ़ेगी. उन्होंने काफी मेहनत करके पैसा जुटाया है. उनके बच्चे भी कमाने लगे हैं. अब जाकर वह मकान बना पा रहे हैं.”

कॉलोनी में एक सज्जन ने कार खरीदी. कुछ लोग कानाफूसी करने लगे कि, “भैया, अब तो वो कार वाले बन गये हैं. हमें उन्हें साइकिल पर ही देखा है.” यदि इन लोगों ने राम का आदर्श अपनाया होता तो कहते कि, “चलो अच्छा हुआ कि उन्होंने कार ले ली. शहर बहुत बढ़ गया है, कार बहुत ज़रूरी हो गयी है. उन्हें कार लेने की स्थति में आने में बहुत समय लगा.”

यही स्थिति पूरे समाज की है. ऐसे लोग बहुत विरले हैं, जो दूसरे के सुख या सम्पन्न को देखकर प्रसन्न और हर्षित होते हैं. भगवान् राम ने यही आदर्श सामने रखा है.

Priyam Mishra



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