साधना और ध्यान के स्टेप्स…

Sadhna-Newspuran-02
Some points for Spiritual Aspirants

साधकों के लिये ध्यान देने वाली कुछ बातें :-

(1) शिष्य अभिमान ना करे
(2) जलन ना करे
(3) किसी का बुरा ना सोचे
(4) आलस्य बिलकुल ना हो
(5) कहीं भी ममता ना हो, गुरु के चरणों में दृढ़ अनुराग हो
(6) कोइ काम हड़बड़ाकर ना करे, हर काम प्रेम से करे
(7) सदा परमार्थ के सम्बन्ध मे ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा बनाये रखे
(8) किसी के गुणों में दोष ना निकाले और व्यर्थ की बात ना करे
(9) यम, नियमों का पालन करे तथा उससे भी बढ़कर अपने गुरु की सेवा करे
(10) जो कर्म बहिर्मुख बनाने वाले अथवा सकाम हो, उन्हें ना करे

श्रीमद भागवत -11/10
गुरु भगवान के अनंत शुक्राने !!

योग का आठवां अंग ध्यान अति महत्वपूर्ण हैं। एक मात्र ध्यान ही ऐसा तत्व है कि उसे साधने से सभी स्वत: ही सधने लगते हैं, लेकिन योग के अन्य अंगों पर यह नियम लागू नहीं होता। ध्यान दो दुनिया के बीच खड़े होने की स्थिति है।

ध्यान की परिभाषा : तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम।। 3-2 ।।-योगसूत्र अर्थात- जहां चित्त को लगाया जाए उसी में वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। धारणा का अर्थ चित्त को एक जगह लाना या ठहराना है, लेकिन ध्यान का अर्थ है जहां भी चित्त ठहरा हुआ है उसमें वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। उसमें जाग्रत रहना ध्यान है।

That is, where the mind is applied, it is meditation to keep the attitude constant. The meaning of perception is to bring the mind to a place or stay, but meditation means meditation is a constant movement of instinct wherever the mind is staying. Staying awake in it is meditation.

ध्यान का अर्थ : ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं होता। एकाग्रता टॉर्च की स्पॉट लाइट की तरह होती है जो किसी एक जगह को ही फोकस करती है, लेकिन ध्यान उस बल्ब की तरह है जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है। आमतौर पर आम लोगों का ध्यान बहुत कम वॉट का हो सकता है, लेकिन योगियों का ध्यान सूरज के प्रकाश की तरह होता है जिसकी जद में ब्रह्मांड की हर चीज पकड़ में आ जाती है।

क्रिया नहीं है ध्यान : बहुत से लोग क्रियाओं को ध्यान समझने की भूल करते हैं- जैसे सुदर्शन क्रिया, भावातीत ध्यान और सहज योग ध्यान। दूसरी ओर विधि को भी ध्यान समझने की भूल की जा रही है।

बहुत से संत, गुरु या महात्मा ध्यान की तरह-तरह की क्रांतिकारी विधियां बताते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि विधि और ध्यान में फर्क है। क्रिया और ध्यान में फर्क है। क्रिया तो साधन है साध्य नहीं। क्रिया तो ओजार है। क्रिया तो झाड़ू की तरह है।

आंख बंद करके बैठ जाना भी ध्यान नहीं है। किसी मूर्ति का स्मरण करना भी ध्यान नहीं है। माला जपना भी ध्यान नहीं है। अक्सर यह कहा जाता है कि पांच मिनट के लिए ईश्वर का ध्यान करो- यह भी ध्यान नहीं, स्मरण है। ध्यान है क्रियाओं से मुक्ति। विचारों से मुक्ति।

Many saints, gurus or mahatmas tell different types of revolutionary methods like meditation, but they do not tell that there is a difference between method and meditation. There is a difference between action and meditation. Action is not a means. The verb is a tool. Action is like a broom. Even sitting with eyes closed is not meditation. It is also not a meditation to remember an idol. Chanting the garland is also not meditation. It is often said that meditate on God for five minutes – this too is meditation, not remembrance. Meditation is freedom from actions. Freedom from thoughts.


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