हिन्दू धर्म के स्त्रोत (Sources of Hindu Religion)

 हिन्दू धर्म के स्त्रोत (Sources of Hindu Religion)

 हिन्दू धर्म का विकास किसी एक व्यक्ति अथवा एक किताब (ग्रन्थ) के माध्यम से नहीं हुआ। इसका विकास अनेक महर्षियों, साधकों, चिन्तकों के प्रयासों तथा दीर्घ अनुभवों से हुआ है।अतः हिन्दू धर्म का कोई एक स्रोत नहीं है। कुछ प्रमुख स्रोत इस प्रकार हैं:


1.श्रुति या वेद- वेद, समाज के सदस्यों को सम्पूर्ण जीवन का निर्वाह करने के लिए प्रेरणा, मार्गदर्शन व निर्देश देने का कार्य करते हैं। वेदों में वर्णित व्यवस्थाओं से धीरे-धीरे प्रथाओं व परम्पराओं का विकास हुआ। ये प्रथाएँ और परम्पराएँ इतनी सुदृढ़ तथा उपयोगी थी कि इनमें से अनेक का प्रचलन हजारों वर्ष बीत जाने के बावजूद आज भी है।

2.स्मृति- स्मृति से अभिप्राय उन विचारों से है जो कि मनुष्य के मस्तिष्क में अर्थात् याददाश्त में बने हुए हैं वेदों में आचरणों (व्यवहारों) का विस्तार से उल्लेख किया गया है। फिर भी जीवन से सम्बन्धित सभी आचरणों का उल्लेख संभव नहीं। इस प्रकार के आचरण मस्तिष्क (स्मृति) में बने हैं। ऐसे समस्य विचारों का संकलन कर उन्हें लिपिबद्ध करने का कार्य अनेक ऋषियों, मुनियों द्वारा किया गया। इस प्रकार स्मृतियाँ वेदों की ही पूरक हैं। 

3.पुराण- ऐसा प्रतीत होता है कि पुराणों की रचना वैदिक व स्मृति साहित्य में वर्णित व्यवस्थाओं के प्रति लोगों में विश्वास उत्पन्न करने के लिए की गई। पुराण कथा- कहानियों के द्वारा वेद व स्मृतियों में वर्णित विषयों का प्रतिपादन करते हैं। पुराणों का महत्व वेदों व स्मृतियों के समान ही है इन्हें हम धर्म के व्यावहारिक प्रतिपादक के रूप में पाते हैं।

4.भाष्य - वेदों व स्मृतियों की भाषा सामान्य लोगों की दृष्टि से सरल नहीं थी। इसलिए इनमें वर्णित ऋचाओं को सरल शब्दों में प्रगट करने का कार्य भाष्यों द्वारा किया गया।

5.निबंध - भाष्य के समान ही अनेक लेखकों ने वैदिक और स्मृतियों से व्यक्ति सम्बन्धित विषयों पर अपने-अपने दृष्टिकोण से निबंध लिखे निबंध लिखने का एक कारण और भी है। समय बीतने के साथ सामाजिक व्यवस्था में भी परिवर्तन हुए। इन परिवर्तनों के कारण सामान्य लोगों का ध्यान वेदों और स्मृतियों से हटने लगा। इसलिए आठवीं शताब्दी में अनेक विद्वानों ने भाष्य और निबंधों की रचना की। इनके माध्यम से लोगों का ध्यान पुनः वेदों और स्मृतियों में निर्धारित सामाजिक व्यवस्था के प्रति आकृष्ट हुआ।

6.न्याय- वेद, स्मृति और मीमांसा व्यक्ति को निजी व सामाजिक जीवन के प्रायः सभी पक्षों से सम्बन्धित मार्गदर्शन व निर्देश देते हैं। यदि परिस्थितिवश इनसे मार्गदर्शन न मिल सके अथवा इनमें निहित निर्देशों व वर्तमान परिस्थितियों में किसी प्रकार का विरोधाभास हो तब क्या किया जाए? ऐसी दशा में उसे अपने मार्ग का निर्धारण करने के लिए अपने विवेक का उपयोग करने की अनुमति भी प्राप्त है। कौटिल्य ने कहा कि यदि पारम्परिक नियम बुद्धि की कसौटी पर खरे न उतरते हों तब उन्हें त्याग देना चाहिए। ऐसी स्थिति में बुद्धि के अनुसार आचरण को ही धर्म मानकर ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार न्याय का अर्थ आचरणों के विवेक सम्मत निर्धारण के रूप में किया गया है। 

7.लोकाचार - लोकाचार का अर्थ समाज द्वारा अनुमति प्राप्त आचरणों से है। लोकाचार के निम्नांकित तीन प्रकार है 
(अ) कुल (कुटुम्ब) से सम्बन्धित लोकाचार,
(ब) सत्ता (राज्य) से सम्बन्धित लोकाचार तथा
(स) देश (राष्ट्र) से सम्बन्धित लोकाचार।

8.परिषद- सदियों पहले लिखे गए वेद, स्मृति, मीमांसा आदि में वर्णित में व्यवस्था में से कोई यदि वर्तमान परिस्थितियों में पालन करने योग्य न हो तब ग्रामजन क्या करें? इस अवस्था में परिषद का मार्गदर्शन प्राप्त किया जाए। परिषद ग्राम के वृद्धों की एक समिति या संगठन होता था। इसमें प्रायः दस सदस्य होते थे। इनमें तीन सदस्य वेदों के ज्ञाता, तीन सदस्य आश्रमों के प्रतिनिधि, एक भाषा शास्त्री, एक भाष्य लेखक, एक धर्मशास्त्र का जानकार तथा एक विद्वान ग्रामीण होता था।


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