बोया बबूल, चाहते हैं आम, राजनीतिक दलों के उलटबांसी काम.. सरयूसुत मिश्रा


स्टोरी हाइलाइट्स

चेहरे पर चेहरा लगाकर आज लोगों को ठगना एक धंधा बन गया है. लोग ठगे जाते हैं, फिर भी भूलने की फितरत के कारण....

बोया बबूल, चाहते हैं आम, राजनीतिक दलों के उलटबांसी काम.. सरयूसुत मिश्रा चेहरे पर चेहरा लगाकर आज लोगों को ठगना एक धंधा बन गया है. लोग ठगे जाते हैं, फिर भी भूलने की फितरत के कारण भूल जाते हैं और फिर ठगे जाते हैं. यह संभवतः राजनीति में ही हो सकता है कि जिसने स्वयं गुनाह किया है, वही जनता का हमदर्द बनकर खड़े दिखाई होने का प्रयास करे. ऐसा साहस सामान्य इंसान तो नहीं कर सकता. कांग्रेस पार्टी ने पेट्रोल और डीजल के मूल्य में बेतहाशा वृद्धि के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन शुरू किया है. यह सही है कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें जनता की कमर तोड़ रही हैं. इसमें कोई संशय नहीं है कि इसके कारण महंगाई बेतहाशा बढ़ रही है. लेकिन कांग्रेस इसके लिए आंदोलन करे यह एक उलटबांसी काम ही लगता है. कांग्रेस जब राज्य में सरकार में थी तब उसने बबूल बोये थे और आज उससे आम का स्वाद चाहती है. यह कैसे संभव है. जैसे कांग्रेस की मध्य प्रदेश सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है, वह आज आंदोलन करके क्या हासिल करना चाहती हैं. कमलनाथ ने 2018 के चुनाव में तत्कालीन सरकार के खिलाफ पेट्रोल और डीजल पर ज्यादा टैक्स का मुद्दा बनाया था और अपने घोषणा-पत्र में वायदा किया था कि मध्य प्रदेश में टेक्स कम किया जाएगा. चुनाव के बाद कमलनाथ मुख्यमंत्री बने, लेकिन टैक्स घटाने के बजाय पेट्रोल डीजल पर 5% टैक्स बढ़ा दिया गया. कमलनाथ सरकार ने 21 सितंबर 2019 को इन उत्पादों के दाम बढ़ाकर जनता को महंगाई का जो तोहफा दिया था, उसे आज भी जनता भुगत रही है. कमलनाथ ने पेट्रोल- डीजल पर 5% जो  टैक्स बढ़ाया था, उसका असर उन्हीं की सरकार के समय पड़ा, ऐसा नहीं है. पेट्रोल-डीजल के मूल्य के आधार पर प्रतिशत में वेट टैक्स लगता है. जब कमलनाथ सरकार सत्ता में आई तब पेट्रोल पर 28% और डीजल पर 18% लगता था. कमलनाथ ने जब 5% बढ़ाया था तब यह पेट्रोल पर 33% और डीजल पर 23% लगने लगा था. अभी भी पेट्रोल और डीजल पर टैक्स की दरें यही हैं, लेकिन पेट्रोल-डीजल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें जैसे बढ़ती हैं, उसी अनुपात में प्रतिशत आधारित टैक्स भी बढ़ जाता है. पेट्रोल-डीजल की दरें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित होती है. भारत के हाथ में नहीं होती. अंतर्राष्ट्रीय कीमतों पर तेल कंपनियां बाहर से पेट्रोल-डीजल लेती हैं और प्रोसेसिंग के बाद पेट्रोल पंपों को पहुंचाती हैं. कंपनियों की जो भी कीमत होती है, उस पर राज्यों का प्रतिशत आधारित टैक्स लगता है और टैक्स के कारण कीमतें और भी बढ़ जाती हैं. यह प्रक्रिया सभी राज्यों में है, चाहे भाजपा की सरकार हो या कांग्रेस की. कांग्रेस शासित राजस्थान में पेट्रोल डीजल की कीमत देश में आज सबसे ज्यादा है. इसका कारण उस राज्य में लगने वाला टैक्स है. जिन कमलनाथ ने 2019 में मुख्यमंत्री रहते हुए पेट्रोल डीजल पर 5% टैक्स बढ़ाया था, उनके नेतृत्व में आज कांग्रेस पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन कर रही है. है न जनता के साथ ही क्रूर मजाक! लेकिन ऐसा मजाक राजनीति के लोग ही कर सकते हैं. क्या राजनीति में धूर्तता, पाखंड और असली चेहरे पर नकली चेहरा लगाना अनिवार्य हो गया है? राजनीतिक क्षेत्र के लोग इंसान की भूलने की प्रवृति और स्वाभाविकता का शोषण करने में सिद्धहस्त होते हैं. सत्ता से उतरने के बाद कुछ समय शांत रहकर फिर सरकार की कमियां गिनाने लगते हैं, जबकि जब सरकार में थे तो वही कमियां और गलतियां स्वयं ने की हुई होती हैं. अगर समाज में कोई भी व्यक्ति कोई सकारात्मक या नकारात्मक कृत्य करता है तो वह व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार माना जाता है. किसी भी स्थिति में ऐसा व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता. राजनीति में इसके विपरीत होता है. जो भी गलती या गुनाह किया है उसके लिए कोई व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं लेता, सरकार में होते हैं तब बताया जाता है कि सिस्टम की गलती है. विपक्ष में आते ही सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाता है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के आदर्श प्रेरक और मार्गदर्शक होते हैं. कई नेता नायक, जननायक और महानायक तक बन जाते हैं, लेकिन काम फिल्मों जैसे नेताओं की तरह ही करते हैं. फिल्मी नायक अपना मेहनताना लेकर कहानी के अनुसार अपनी भूमिका अदा करते हैं. कहानी तो कहानी होती है, सच नहीं. लगभग इसी प्रकार आज राजनीति में भी हो रहा है. चुनावी राजनीति में फतेह के बाद सिस्टम में पद, पावर और शासकीय साधन सुविधाओं का भरपूर उपयोग करते हुए कार्यपालिका की कहानी जैसे निर्धारित योजनाओं पर निर्णय और क्रियान्वयन की कोशिशें करते हुए दिखाई पड़ते हैं.  कुछ गलत हो गया तो पहले तो किसी की भी जवाबदेही तय होना मुश्किल है, लेकिन अगर हुई भी तो ऐसे कर्मचारी-अधिकारी दंडित होंगे, जो सिस्टम की कड़ी में महत्वहीन होते हैं. कमलनाथ के नेतृत्व में पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के विरोध में राज्यव्यापी आंदोलन सही मायनों में कमलनाथ के ही खिलाफ है. जब कमलनाथ सरकार में बढ़ाए गए टैक्स के बाद कोई टैक्स नहीं बढ़ाया गया, तो कीमतों में वृद्धि के लिए दूसरा कौन और कैसे जवाबदार है. देश में मूल्य आधारित टैक्स प्रणाली भी कांग्रेसी सरकारों में ही प्रारंभ हुई. कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यही है कि जनता जो भी भुगत रही है, उन नीतियों, कार्यक्रमों और प्रणालियों का विकास कांग्रेस की सोच और कार्य का ही परिणाम है. कांग्रेसका कोई भी आंदोलन हवा के खिलाफ चिराग जलाने का प्रयास लगता है. यह प्रकृति के नियमों के खिलाफ है. तेज हवा में चिराग कैसे चल सकता है? फिर भी कांग्रेस का चिराग अपना चिराग जलाने में जुटा हुआ है. कई बार तो उनको यह भी लगता है कि उनका बुझा चिराग जल रहा है. सच के साथ ही राजनीति, राजनीतिक दल और  नेता, जनता और देश-प्रदेश के बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकते हैं. कांग्रेस के लिए आज ऐसा ही रास्ता जरूरी है. राजनीति की उलटवासियों और बंदरी उछल-कूद से हलाकान जनता तो कह रही है कि या रब  अब एक आईना ऐसा बना दे, जिसमें चेहरा नहीं नीयत दिखाई दे.