विशेष: भारत के अखाड़े एवं धार्मिक सम्प्रदाय: परम्परा, दीक्षा और संस्कृति

विशेष: भारत के अखाड़े एवं धार्मिक सम्प्रदाय: परम्परा, दीक्षा और संस्कृति

Special: Akhara and religious communities of India: tradition, initiation and culture

आचार्य शंकर ने मठाधीशों की व्यवस्था के सम्बन्ध में एक विशिष्ट ग्रन्थ की रचना की है जिसका नाम ‘मठाम्नाय’ है। मठाम्नाय सेतु के अनुसार अद्वैतवाद के सात आम्नाय हैं। आम्नाय का अपभ्रंश रूप अखाड़ा है, किन्तु धर्मविद डॉ. भगवतीप्रसाद सिंह की मान्यता है कि अखाड़ा ‘अखण्ड’ शब्द अनुसार एक अनुपम देन थी, जिसका निर्वाह आज भी उसी गौरव के साथ किया जा रहा है यही नहीं, नागा संन्यासियों का इतिहास पढ़ने से ज्ञात होता है कि उन्होंने मुगलकाल में मुगल शासकों को अफगानों से बचाने में सहायता की।

धर्मविद बाबूलाल शर्मा का कहना है कि ‘संन्यासी अखाड़ों का निर्माण शास्त्र और शस्त्र, धर्म तथा सेना, ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों के समन्चित रूप से हुआ था वैसे तो आचार्य शंकर ने वैदिक एवं वेदान्त के प्रचार एवं प्रसार के लिये समस्त संन्यासियों को संगठित किया था और उन्हें 10 वर्गों में विभाजित किया था, जिन्हें तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, गिरि, पर्वत, सागर, सरस्वती, भारती, पुरी नामों से जाना जाता है, किन्तु संन्यासी के रूप में तीर्थ, आश्रम, सरस्वती, भारतीय एवं दण्डी संन्यासियों को ही मान्यता है। घुर्ये के अनुसार वन दो प्रकार के हैं विराज वन और नाद वन।

विराज वन परम्परा से चले आते हैं जबकि नाद वन गुरुकुल द्वारा घोषित किया जाता है। दण्डी संन्यासी केवल ब्राह्मणों के लिए ही आरक्षित है।

आचार्य शंकराचार्य के काल में संन्यासियों का कार्य केवल धर्म प्रचार ही था। इन संन्यासियों की प्रतिभा का उपयोग करने के लिए आचार्य शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना की थी

उत्तर में बद्री-केदारनाथ का ज्योतिर्मठ,

शैव अखाड़े

दक्षिण में श्रृंगेरी मठ,

पूर्व में श्री जगन्नाथ पुरी का श्री गोवर्धन मठ और

पश्चिम में श्री द्वारिका का शारदा मठ।

काल बदला और भारत में यवों और मुगलों का आक्रमण हुआ। मुगलों का शासन स्थापित हुआ। उनकी रीति एवं नीति के कारण हिन्दुओं पर अत्याचार बढ़ गये और हिन्दू धर्म का पतन होने लगा। ऐसी अवस्था में संन्यासियों ने शास्त्र को छोड़ शासत्र का सहारा लिया और कई स्थानों पर मुगलों को परास्त किया संन्यासियों की समुचित शक्ति का उपयोग करने के लिए देश के विभिन्न भागों में अखाड़ों की स्थापाना की गई। स्वाधीनता संग्राम में भी नागा संन्यासियों ने स्वाधीनता सेनानी नाना साहब तथा झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने का पूर्ण प्रयास किया था।

 

वर्तमान में शैव अखाड़ों में प्रमुख निम्नलिखित हैं

निरंजनी अखाड़ा

निर्वाणी अखाड़ा

आवाहन अखाड़ा

जूना अखाड़ा

अटल अखाड़ा

आनन्द अखाड़ा

पंचअग्नि अखाड़ा

उदासीन अखाड़े

निर्मल अखाड़ा

बड़ा पंचायती अखाड़ा

पंचायती नया अखाड़ा

वैष्णव अखाड़े

निर्मोही अणी

दिगम्बर अणी

निर्वाणी अणी

संन्यासी गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं। अरण्डी साधु अनेक प्रकार के होते हैं । ये पंचायती अखाड़े के नाम से भी परिचित हैं। साधुओं की साम्प्रदायिक मण्डली को अखाड़ा कहते हैं।’

अखाड़ों का उद्देश्य

अखाड़ों का उद्देश्य शास्त्र-पठन, आध्यात्मिक चिंतन एवं मनन के साथ धर्म का प्रचार, सन्त-सेवा व जनता-जनार्दन की सेवा ही माना जाता है। राहुल सांकृत्यायन लिखते हैं कि ‘दशनामी संन्यास मार्ग की स्थापना के आरम्भ में 9वीं शताब्दी से लेकर 15वीं शताब्दी तक उनका संगठन अधिकार वैयक्तिक तथा ज्ञान-वैराग्य मूलक था।

दशनामी संन्यासियों का विभाजन :

दशनामी संन्यासियों के दो विभाजन हैं- एकदण्डी और त्रिदण्डी। एकदण्डी संन्यासी उसे कहते हैं, जिनके सिर पर बालों का एक जूड़ा होता है, परन्तु जर्नल ऑफ रॉयल एशियाटिक सोसायटी के जुलाई 1925 में एक लेख ‘वेदान्त संन्यासियों का संगठन’ में एक भिन्न दृष्टिकोण उपलब्ध होता है। वहाँ लिखा है

“दीक्षा के बाद ही संन्यासी को दण्डी कहा जाता है। यदि वे दीक्षा के बाद सात दिन के अन्दर दण्डी को छोड़ देते हैं, तो उन्हें ‘त्यक्तदण्डी’ के नाम से जाना जाता है। संन्यासी दण्ड के साथ कमण्डल रखते हैं।”

“विशाल भारत’ में प्रकाशित एक लेख ‘कुम्भ मेले में साधु सम्प्रदाय’ साधुओं के विभाजन पर दृष्टि डालता है। लेख के लेखक सुन्दरानन्द विद्या विनोद लिखते हैं ‘शंकर सम्प्रदाय के ब्राह्मणेतर साधु अदण्डी याने दण्ड धारण नहीं करते। दोनों प्रकार

शिक्षार्थी और नागा की दीक्षा (विरजा) में भेद :

नागा-दीक्षा लेने के पहिले शिक्षार्थी को तीन दिन का उपवास करना पड़ता है। इस अवधि में वह केवल दूध का सेवन करता है। चौथे दिन हवन किया जाता है। इसके बाद मुण्डन क्रिया होती है। केवल कुछ बाल छोड़ दिये जाते हैं। विरजा अथवा दीक्षा की विधि नारद परिव्राजक उपनिषद के अनुसार की जाती है, जिसमें सर्वप्रथम कमर तक के पानी में खड़ा होना पड़ता है। इसके पूर्व उपवास के बाद ही सावित्री मंत्र का जाप करना पड़ता है। तत्पश्चात् विधि गणेश-पूजन से आरम्भ होती है और हवन की क्रियाएँ पूर्ण की जाती हैं, जिसे विराज बलिदान कहा जाता है। शिक्षार्थी को कहा जाता है कि उसे पाँच शिक्षकों से ही शिक्षा लेनी चाहिए और उनका आदर करना चाहिए।

भगवा वस्त्र,ऊपर ही जटा को हटाना, विभूति (राख),रुद्राक्ष की माला और मंत्र।

विराज विधि को सम्पन्न करने में कम से कम चार संन्यासी होते हैं।

शिक्षार्थी ने जिस साधु को गुरु चुना है, वह उसके कानों में मन्त्र बोलता है। दूसरा साधु उसे सात नामों में से एक नाम देता है। तीसरा साधु राख को शिक्षार्थी के अंगों पर रगड़ता है और चौथा साधु उसकी जनेऊ (यदि है तो) को तोड़ता है।

दीक्षा विधि के समय एक स्थिति पर उसे सात कदम नग्न चलना पड़ता है। इस दीक्षा विधि के बाद वहाँ एकत्रित साधुओं को गुड़ और धनिया बाँटा जाता है।

नागाओं की दीक्षा-विधि, शिक्षार्थी की दीक्षा-विधि से भिन्न है नागा दिगम्बर बनने की विधि को तंगेटोरा कहा जाता है। तीन दिन उपवास करने के बाद मंत्र ‘भूः संन्यास मया, भुवः संन्यास मया, स्वः संन्यास मया’ द्वारा श्रद्धा-विधि के समय उसका गोरा किया जाता है। यह विधि प्रातः 3 बजे के लगभग होती है। दीक्षार्थी भाले के पास खड़ा होता है। अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है। एक वरिष्ठ नागा, जो दीक्षार्थी का साधक गुरू होता है, उसके शरीर पर पानी डालता है, उसे नग्न दशा में लाता है औरउसकी इन्द्रिय की एक विशेष नस को खींचता है ताकि वह नपुंसक हो जाये। तब वह शिक्षार्थी तेरा हो जाता है। इस संस्कार के तीन वर्ष बाद वह नागा दिगम्बर घोषित कर दिया जाता है।

In Brief : Nagas & Akhada System of Hinduism

 


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