विशेष : वस्त्रों का रोचक इतिहास : वैदिक काल से आधुनिक काल तक : शरीर ढकने से लेकर फेशनेबल बने कपड़े की दास्तान

वस्त्रों का इतिहास

पूर्व के प्राचीनतम ग्रंथों में उल्लिखित है कि जब शिल्पकार के हाथ शिल्प निर्माण में व्यस्त होते हैं तो ऐसा प्रत्येक क्षण समारोहित होता है। औजार कुछ और नहीं, उस शिल्पकार के व्यक्तित्व का विस्तार ही हैं, जिसके द्वारा वह मानवीय सीमाओं के पर पहुँच जाता है।’

कमला देवी चट्टोपाध्याय

अगर औजार को शिल्पकार के व्यक्तित्व का विस्तार मानें तो वस्त्र’ मनुष्य के कल्पनालोक की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है। मनुष्य ने सभ्यता का पहला चरण अपने अनावृत्त शरीर को आवृत्त करने से ही प्रारंभ किया होगा और धीरे-धीरे उसकी कल्पनाशीलता ने उसे वर्तमान स्वरूप तक पहुँचा दिया। विकास की इस प्रक्रिया में कपड़ा हमेशा से मनुष्य के साथ रहा है। समय समय पर उसमें अनेक परिवर्तन और सुधार होते रहे हैं। जिस तरह आज हम विज्ञान के क्षेत्र में नित नए आविष्कारों को अपने सामने पाते हैं और अगर इन आविष्कारों के मूल में जाएँ तो ऐसा प्रतीत होता है कि तकली या कर्तु पहला आविष्कार था। इस संदर्भ में भगवान सिंह का कहना है कि ‘कर्पास, कर्पट (कर्प-पट) आदि में प्रयुक्त कर्प/कल्प-गढ़ना, बनना (आगे चलकर-कल्पना करना अर्थात् मनसा गाना, बनाना) से प्रकट होता है कि तत्कालीन मनुष्य के लिये तकली, तर्कु का आविष्कार एक लंबी प्रौद्योगिक छलांग थी। तर्क चलाने वाला पहला तार्किक था। वह अलग-अलग रेशों या तारों  को पिरोकर एक सूत्र में कर देता था। तर्कु से सूत कातने को तर्कन कहा जाना चाहिए, पर तर्क के लिये इसके प्रयोग के बाद उसे कर्तन कहा जाने लगा।’ मनुष्यता का आधार ‘तर्क’ भी कमलेश कपड़े के विकास के साथ ही जुड़ा हुआ ।

अगर ऐतिहासिक संदर्भों में देखें तो कपास की खेती के प्रमाण बोलन तट पर स्थित बस्ती मेहरगढ़ (वर्तमान पाकिस्तान) में मिलते हैं। ये अवशेष आज से सात हजार वर्ष प्राचीन या पाँच हजार ईसा पूर्व के हैं । सूती धागे के प्रयोग में आने के बाद पूर्व में प्रचलित दूसरे सभी तंतुओं और रेशों को वस्त्र निर्माण के क्षेत्र से विदा कर दिया गया। यानि की बुनाई का कार्य सात हजार वर्षों से भी ज्यादा पुराना है। भारतीय सांस्कृतिक परम्परा के आधार पर यदि वस्त्र पर विचार करें तो यह तथ्य सामने आता है कि ब्रह्मा ने जिन चार वस्तुओं का स्वयं सृजन किया था, कपड़ा उनमें से एक था। इस मान्यता को यदि आधार बनाया जाए तो यह माना जा सकता है कि कपड़ा स्वयं ई श्वर द्वारा ही प्रदत्त किया गया है या मनुष्य के अस्तित्व में आने के साथ ही वस्त्र भी प्रचलन में आ चुका था। इस मान्यता को तार्किक दृष्टिकोण से भी यदि देखा जाए तो यह तो स्थापित हो जाता है कि वस्त्र इतिहास की लिखित परम्परा के पूर्व में ही यहाँ विद्यमान रहा है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भी विवेचना करें तो यह सुस्पष्ट है कि ‘सिन्धु घाटी की सभ्यता’ के समय वस्त्र अपने पूरे परिष्कार के साथ हमारे यहाँ मौजूद था। पश्चिम के इतिहासकारों ने अपनी वैज्ञानिक खोज के आधार पर यह स्थापित किया है कि अपने पारम्परिक औजारों के माध्यम से बुनकर ईसा से करीब 7000 वर्ष हाथा गाड़ी पूर्व उतना ही परिष्कृत कपड़ा बुन रहे थे जैसा कि आज हमें उपलब्ध है। यानि हजार वर्षों से हथकरघा और हाथ से कते सूत द्वारा वस्त्र निर्मित हो रहे हैं। ऐसा सिर्फ औजारों से ही संभव नहीं हो पाया, इसे संभव किया बुनकरों की निपुणता और धैर्य ने। 6000 ई.पू. तक कपड़ा बुनाई व रंगाई एक शिल्प का रूप ले चुकी थी तथा इसके माध्यम से जीविकोपार्जन संभव हो गया था 5000 ई.पू. तक आवासीय बस्तियाँ आकार लेने लगी थीं एवं मुद्रा का चलन प्रारंभ हो गया था। कुछ स्थानों पर मुद्रा ने वस्तु विनिमय का स्थान ले लिया था। इस समय तक वस्त्र-बुनाई एक पूर्णकालिक व्यवसाय का रूप ले चुकी थी। बुनकर अब इस क्षेत्र में लगातार सुधार के प्रयास कर रहे थे। ईसा से 3000 वर्ष पूर्व भारत और मिस्र में जहाजों के मस्तूल, थैले व तेल शोधन के लिये कपड़ा बनने लगा था। साथ ही साथ कई अन्य औद्योगिक तथा व्यक्तिगत आवश्यकताओं के लिये भी वस्त्र निर्माण प्रारंभ हो गया था।

इतिहासकारों का यह अभिमत है कि अगले करीब 1500 वर्षों तक यथास्थिति बनी रही। पर ईसा से 1500 वर्ष पूर्व वस्त्र बुनाई में पहला बड़ा क्रान्तिकारी परिवर्तन खड़े करघे (Vertical Loom) के माध्यम से सामने आया और बुनकर बैठकर ज्यादा आरामदायक स्थिति में अधिक कुशलता से बुनाई का कार्य कर सकता था। यही वह समय था जब कताई यानी धागे की गुणवत्ता में सुधार प्रगति हुई। स्पष्ट प्रमाण तो नहीं मिलते पर इतना आभास अवश्य मिलता है कि इस समय तक ताने (Warp) में 136 धागे प्रति इंच प्रयोग में आने लगे थे। इसके बाद करीब 1000 वर्ष तक सारी दुनिया में करघे के परिष्कार को लेकर कार्य होता रहा। परन्तु सफलता पुन: एशियाई देशों के हाथ लगी। 200 ई.पू. में ड्रा लूम और पैडल लूम (यानि की वर्तमान खड्डी लूम) अस्तित्व में आया। इस करघे के द्वारा बुनकर के कार्य में काफी सुगमता आ गई। उसके हाथ अब धागा डालने के लिये मुक्त थे और यहीं से बुनाई कला के साथ-साथ एक पूर्ण कालिक उद्योग में भी परिवर्तित होने लगी।

भारतीय बुनाई परम्परा

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पूरा विश्व भारत का इस बात के लिये ऋणी है कि यहीं से सूती वस्त्रों का उद्भव हुआ और बुनाई की कला को यहीं से एक नई पहचान भी मिली। अनादि काल से वस्त्र बुनाई में जितने प्रयोग यहाँ हुए हैं, उतने विश्व के किसी अन्य हिस्से में नहीं हुए। भारत का इतिहास बिना हाथ बुने वस्त्रों की चर्चा के अधूरा है और सिर्फ इतिहास ही नहीं अर्थशास्त्र का विद्यार्थी भी पारम्परिक हाथ से बुने वस्त्र उद्योग का अध्ययन तथा विश्रेषण किये बिना भारतीय अर्थशास्त्र को नहीं समझा जा सकता। भारतीय समाज कृषि प्रधान है। इस आदिम समाज में कृषक और बुनकर हमेशा साथ-साथ हैं, एक दूसरे के पूरक रहकर। आज भी दुनिया में सबसे ज्यादा हाथ करघे भारत में ही हैं। इनकी संख्या के बारे में निश्चित तौर पर तो नहीं कहा जा सकता, परन्तु पूरे देश में करीब आठ से दस लाख करघे आज भीविद्यमान हैं। आजादी के समय यह संख्या करीब अड़तीस लाख थी। ताने-बाने को मिलाकर भारतीय बुनकर ने जिस अद्भुत कला की रचना की उसका अनूठा संसार आज हमारे सामने है। आज जबकि दुनिया एक वैश्वीकरण की प्रक्रिया से गुजर रही है, फिर भी स्थानीयता का महत्त्व कम नहीं हो जाता। एक ओर जहाँ वैश्वीकरण से स्थानीयता के विचार को नकारा जा रहा है वहीं दूसरी ओर यह विचार भी तेजी से ज़ोर पकड़ रहा है कि स्थानीयता से ही निजता बचाई जा सकती है, और निजता ही व्यक्ति की विशिष्टता है, जिसके माध्यम से उसे पशु से भिन्न माना जा सकता है।

व्यक्ति की निजता में उसके द्वारा पहने जाने वाले कपड़े अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। इसी को विस्तारित करते हुए जसलीन धमीजा ‘हेण्ड वुवन फेब्रिक्स ऑफ इण्डिया’ में लिखती हैं- ‘हाथ से बुना वस्त्र समाज की परम्परा और संस्कृति के अभिव्यक्ति का महत्त्वपूर्ण माध्यम रहा है। इसके माध्यम से बुनकर की न केवल विभिन्न तत्वों से रक्षा होती है बल्कि बुनाई उसे श्ृँगारित करती है एवं उसके व्यक्तित्व को आकर्षक बनाती है। व्यक्ति के पहनावे से उसके सामाजिक स्तर का भान होता है, साथ ही उसकी एक समूह के रूप में भी पहचान बनती है, जो कि उसमें कुछ होने की भावना जगाती है। यह स्वयं को अभिव्यक्त करने का बहुत ही व्यक्तिगत माध्यम है और यह बुनकर के व्यक्तित्व का विस्तार भी है, यह व्यक्तियों द्वारा न बोली जाने वाली भाषा का ऐसा शब्दकोश है जो कि हमें कई बातें संकेत में समझा जाता है। प्रसिद्ध इतिहासविज्ञ दामोदर धर्मानन्द कोसाम्बी, ‘प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता’ में लिखते हैं ‘एशियाई संस्कृति के दो प्राथमिक स्रोत चीन और भारत ही हैं। सूती वस्त्र (कालीको ,छींट, डूंगरी, पजामा, सरा और गिंगम) भारतीय उत्पत्ति के हैं। शक्कर रोजमर्रा के जीवन की आवश्यकता भारत की देन है और चीन की देन हैं- कागज, चाय, चीनी-मिट्टी और रेशम।’ बुनाई के इतिहास को संक्षिप्त में सिलसिलेवार क्रम से लिखना आवश्यक है।

 

आधिकारिक बुलेटिन -3 (6-Aug-2019)5वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 7 अगस्त को मनाया  जाएगा(5th National Handloom Day celebrations on August 7)

भारतीय समाज या संस्कृति का ताना-बाना वस्त्रों के आस-पास ही बुना गया। इसके आसपास ही एक रहस्यमय संसार निर्मित होता चला गया। अनेक ऋषि-मुनियों, सूफी संतों से लेकर कवियों तक ने इसे प्रतीक के रूप में अपनाया। इस बात के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं कि हड़प्पा सभ्यता और वेदकालीन समाज में बुनाई बड़े पैमाने पर होती थी। वेदों में बुनाई का जिक्र तो आता है, परन्तु सूत का उल्लेख नहीं मिलता। इस विषय पर प्रकाश डालते हुए डॉ. मोतीचन्द्र लिखते हैं-‘प्रारंभिक वैदिक साहित्य में कपास का उल्लेख न होने के संभवत: दो मुख्य कारण हैं। एक तो यह कि आर्य जब भारत में पश्चिम एशिया से आए सिन्धु या हड़प्पा सभ्यता पूर्णतः नष्ट हो चुकी थी। अत: प्राचीन निवासियों के संपर्क में न आने से वे कपास के अस्तित्त्व से अनभिज्ञ थे, पूर्व की ओर बढ़ने से उन्हें इसका ज्ञान हुआ।

ऋग्वेदकालीन समाज में बुनाई एक व्यवसाय की तरह स्थापित हो चुका था। परन्तु स्वयं या माता द्वारा बनाया अथवा भेंट किया गया कपड़ा बहुत ही सम्मान सूचक था।

वैदिक साहित्य में कुश या घास द्वारा वस्त्र निर्माण का विवरण मिलता है। स्त्रियां ही ज्यादातर धागा बनाने का कार्य करती थीं। बुनाई में पहले ताना बनाया जाता था जिसे ‘तत् ‘ या ‘तन्तु’ कहा जाता था एवं बाने को ‘तंतवा’ कहा जाता था। बुनने वाली स्त्री ‘वायन्ती’ कहलाती थी और पुरुष ‘वसोवया’। यजुर्वेद की बात को आधार मानें तो यह स्पष्ट होता है कि उस समय तीन रंग वाला कपड़ा बुना जाने लगा था।

बौद्धकालीन साहित्य में इसकी महत्ता और भी स्पष्ट दिखाई पड़ती है। ‘तन्त्र’ शब्द ‘तन्तु’ से ही निकला है। बौद्ध शब्द ‘सूत्र’ भी बुनाई की ही देन है।’प्राचीन भारत में भौतिक प्रगति एवं संरचनाएँ’ नामक ग्रंथ में रामशरण शर्मा लिखते हैं ‘भिक्षुओं के व्यक्तिगत आचरण के लिये ईसा से छठी-पाँचवी शताब्दी पूर्व में एक आचरण संहिता संभव: स्वयं गौतम बुद्ध ने बनाई थी। इसमें भिक्षुओं के वस्त्रों के विषय में बुद्ध विस्तृत नियम निर्धारित करते हैं। ये नियम बुनाई, कताई तथा रंगाई के क्षेत्रों में हुए विकास के अनुरूप हैं। इन सभी क्षेत्रों में इस काल में अत्यधिक निपुणता प्राप्त कर ली गई थी। विनयपिटक, सूती और ऊनी वस्त्रों सहित चार प्रकार के वस्त्रों तथा रंगाई के निमित्त दस प्रकार के रंगों की चर्चा करता है। वस्त्र इतने महत्त्वपूर्ण माने गए हैं कि विनयपिटक में इन पर पूरा एक अध्याय है। भिक्षुओं के वस्त्रों के बारे में इसमें लिखा है कि-‘धान के खेतों की क्यारियों की तरह भिक्षु के वस्त्र में अनेक टुकड़े जुड़े होते हैं, जिन्हें छोटे-छोटे कपड़े के टुकड़ों से सिला गया होता है। इस वस्त्र का रंग पकी हुई धान की फसल की तरह होता है। इसी संदर्भ में विनयपिटक में आगे के विवरण से स्पष्ट होता है कि कालांतर में सूती-ऊनी तथा सन से बने वस्त्रों सहित अड़सठ प्रकार कपड़ों से निर्मित वस्त्र के उपयोग की भिक्षुओं को अनुमति थी।’ यही वह समय था जबकि एशिया में भारत और यूरोप में ग्रीस की सभ्यताएँ अपने चरम पर थीं। परन्तु विश्व की प्राचीनतम सभ्यता वाले देश कपास के पौधे से अपरिचित थे। इन देशों में भारतीय सूती वस्त्र प्रारम्भ में आश्चर्य और बाद में विलासिता की वस्तु बन गए।

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मौर्यकालीन समाज (327-72 ई.पू.) में सिकन्दर का भारत में आगमन हो चुका था। सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल के विवरणों से स्पष्ट होता है कि इस समय तक परिष्कृत मलमल का प्रचलन आम बात थी। वस्त्र-विन्यास व्यक्ति की पहचान का माध्यम बन चुका था। बौद्ध धर्म अपने चरम पर था और उसने वस्त्र बुनाई को एक नई पहचान भी दी। परन्तु अब तक बिना सिले कपड़े ही पहने जा रहे थे

200 ई.पू. से 250 ईस्वी तक सातवाहन साम्राज्य भारत में अस्तित्व में रहा। इस दौरान भारतीय वस्त्र कला में अत्यधिक निखार आया। इसके स्पष्ट प्रमाण अजन्ता की गुफा (9वीं 10वीं), साँची के स्तूप के द्वार और नागार्जुन कोण्डा में दिखाई पड़ते हैं। इस काल के वस्त्रों में तीन धाराएँ ब्राह्मण, बौद्ध व जैन स्पष्ट तौर पर दिखाई पड़ने लगी थीं। सातवाहन जिन क्षेत्रों पर शासन करते थे वे ज्यादातर गर्म प्रदेश थे, अतएव सूती व रेशमी वस्त्रों में काफी परिष्कार एवं विविधता आई।

लगभग इसी समय 130 ई.पू. से 185 ईस्वी तक कुषाण साम्राज्य भी भारत में शासन कर रहा था। यह मुख्यतया उत्तर भारत में ही केन्द्रित था। गाँधार (अब अफगानिस्तान) मथुरा, बेसनगर और तक्षशिला इस साम्राज्य के प्रमुख केन्द्र थे। यह समय स्थायित्त्व के बजाय आपसी और बाहरी आक्रमणों का था इसी कारण इस काल में वस्त्रों में काफी परिवर्तन भी देखने को मिले और विदेशी प्रभाव भी उनपर दिखने लगा था। इस साम्राज्य में दो प्रकार के वस्त्र प्रचलन में आए । गाँधार पर प्रभाव पड़ा रोमन-शिल्पकारों (बुनकरों) का, जिन्हें बौद्धों ने नियुक्त किया था।और दूसरे छोर पर स्थित मथुरा में भरहुत व साँची का प्रभाव मिलता है। इसी समय चीन से व्यापार प्रारंभ हुआ और प्राचीन रेशम मार्ग (Silk-Route) प्रभाव में आया। इस काल में सूती, ऊनी और रेशमी कपड़ों का निर्माण हो रहा था। बुनाई अपने को परिष्कृत कर रही थी। प्रतीक व अलंकरण के रूप में इसमें चौकड़ी, त्रिकोण तथा पट्टियाँ (Stripe) बुनी जाने लगी थीं।

भारतीय वस्त्र - विकिपीडिया

गुप्त साम्राज्य चौथी शती ईस्वी से आठवीं शती ईस्वी तक विद्यमान रहा। वस्त्रों में हुए परिष्कार इस काल की विशेषता रहे हैं। इसके प्रमाण अजन्ता और मध्यप्रदेश में बाघ की गुफाओं में अंकित भित्तिचित्रों में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। इसी काल में सिले हुए वस्त्र भी प्रचलन में आए। उत्तर भारत की प्राकृतिक स्थितियों के कारण यहाँ दक्षिण भारत की बनिस्बत सिले वस्त्रों को अधिक लोकप्रियता मिली। इस काल में बुनाई में काफी प्रयोग भी हुए। परिष्कृत रूप में झीने व पारदर्शी वस्त्र प्रयोग में आने लगे। जिनका जिक्र कालिदास के साहित्य तथा मंदसौर (मध्य प्रदेश) में प्राप्त शिलालेखों में स्पष्ट रूप से मिलता है।

भारतीय संस्कृति के इस क्लासिकल दौर में कला और व्यापार दोनों में अभूतपूर्व प्रगति हुई। पहली शताब्दी ईस्वी तक वर्तमान आंध्रप्रदेश स्थित मछलीपट्टनम निर्यात के एक बड़े बंदरगाह के रूप में स्थापित हो ही चुका था। आठवीं शताब्दी ईस्वी में अरबों के भारत आगमन के साथ-साथ बुनाई में और भी परिष्कार आया। 988 ईस्वी में महमूद गजनवी के आक्रमण के पश्चात् दिल्ला सल्तनत की स्थापना हुई और बुनाई को पुनः राज्याश्रय प्राप्त हुआ। ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि दिल्ली के ‘शाही रेशमी कारखानों’ में चार हजार से ज्यादा बुनकर कार्यरत थे। इसके पश्चात् विश्व की विभिन्न धाराओं से भारत का साक्षात्कार हुआ, जैसे सन् 1498 ई. में वास्कोडिगामा का भारत आना और सन् 1526 ईस्वी में बाबर द्वारा मुगल साम्राज्य की स्थापना । इसकी वजह से भारत का निर्यात व्यापार अधिक व्यापक हुआ, वहीं आन्तरिक स्थिरता से वस्त्र उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई। इसी के परिणाम स्वरूप 16वीं – 17वीं शताब्दी में वस्त्र निर्माण तथा निर्यात में असाधारण वृद्धि हुई। डच (हालैण्ड) के व्यवसायियों ने 1595 ईस्वी में भारत से सीधा व्यापार प्रारंभ कर दिया था और 1615 ईस्वी में उन्होंने मछलीपट्टनम् (आ.प्र.) में पहला कारखाना प्रारंभ किया, जिसमें करीब 10,000 व्यक्ति कार्य करते थे। अंग्रेजों ने थोड़े विलंब से यहाँ से व्यापार प्रारंभ किया। उन्होंने 31 दिसम्बर 1600 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना कर, खासकर गुजरात से बुना हुआ कपड़ा, छपा कपड़ा, कशीदा किया हुआ कपड़ा एवं इण्डिगो का व्यापार प्रारंभ किया।

इस समय तक भारतीय वस्त्रों और बुनकरों की क्या विश्व में फैल चुकी थी। बंगाल, बिहार, मालवा (मध्यप्रदेश), अवध, गुजरात तथा दक्षिण भारत में अनेक स्थानों पर बुनाई का कार्य वृहद रूप से चल रहा था। भारतीय वस्त्र ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे थे। ब्रिटिश बुनकर इसके विरोध में हड़ताल कर रहे थे। अतएव 1700 ई. में ब्रिटिश संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया कि ‘ब्रिटिश साम्राज्य में भारत निर्मित कपड़े का आयात प्रतिबंधित है।

यह भारतीय वस्त्र बुनाई परम्परा और व्यवसाय के लिये निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। और इस पर ग्रहण लगना प्रारंभ हो गया सन् 1757 ई. में राबर्ट क्लाईव की बंगाल विजय के पश्चात् स्थितियाँ और भी प्रतिकूल होती गई। इस सबके बावजूद सन् 1818 ई. तक भारत कपड़ों का सबसे बड़ा निर्यातक बना रहा। इसके बाद का समय इस व्यवसाय के लिये दुःस्वप्न जैसा है। इस व्यवसाय पर पहले कहर के रूप में भारत को वस्त्र निर्यातक के बजाय कच्चा माल निर्यातक देश बना दिया गया! बंगाल के बुनकरों तथा सूत कातने वालों पर अत्याचार किये गए! पारम्परिक कताई व्यवसाय को तो समाप्त कर दिया गया,क्योकिं मशीनी धागा अब ब्रिटेन से आयात किया जाने लगा था!

राष्ट्रीयतावादी अर्थशास्त्री जिनमें  रमेशचंद्र दत्त, महादेव गोविंद रानाडे, मदनमोहन मालवीय इत्यादि ने राजनीति कर्मियों के बीच बंग भंग आन्दोलन के समय विलायत कपड़ा छोड़ माँ का दिया मोटा कपड़ा’ पहनें और ग्रामीण उद्योग तथा हस्तशिल्प के बारे में गहन विचार किया। गाँधी जी की चिन्ता के पीछे भी यही भाव था।

भारत में कपड़ों का इतिहास | HiSoUR कला संस्कृति का इतिहास

दरअसल भारतीय वस्त्र उद्योग में हुई अवनति एकाएक या उत्पादन की गुणवत्ता में कमी के कारण नहीं हुई, वरन जैसे-जैसे भारत पर अंग्रेजों का शिकंजा कसता गया, वैसे-वैसे वस्त्र आयात में बढ़ोत्तरी होती गई। रमेशचंद्र दत्त एवं मदन मोहन मालवीय द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों को यदि आधार बनाएँ तो स्थितियाँ एकदम स्पष्ट रूप से उभर कर आती है। वे लिखते हैं- ’19वीं शताब्दी के आरंभ से आयात-निर्यात के हिसाब से देखा जा सकता है कि कुटीर उद्योग में पैदा होने वाले शिल्प-पदार्थों का निर्यात एक ओर कम हुआ है, तो दूसरी ओर इग्लैंड के शिल्प-पदार्थों का आयात बढ़ा है, विशेषकर सूती कपड़ों के आयात में बढ़ोत्तरी लक्ष्य करने योग्य है। 1860 ई. में 96 लाख पौंड से 1880 ई. में एक करोड़ सत्तर लाख पौंड के अनुपात में वस्त्र आयात बढ़ा। सन् 1900 में यह 27 करोड़ पौंड स्टर्लिंग हो गया था। यानि 40 वर्षों में सूती वस्त्रों के आयात में 15 गुना की वृद्धि हो गई। उपरोक्त आँकड़े स्वयं ही वस्तुस्थिति स्पष्ट कर देते हैं। विषयान्तर न हो इसलिये इस इतिहास पर विमर्श को यहीं विराम देते हैं।

इन्हीं सूत्रों को दृष्टिगत करते हुए महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई में ‘खादी’ को अस्त्र बनाया। हाथ से कता सूत और हाथ से बुना कपड़ा आजादी की लड़ाई का मूल मंत्र बना।’खादी’ आजादी की गणवेश’ बनी एवं जो कपड़ा भारत की गुलामी का कारण बना था, वही एक बार पुनः आजादी का संवाहक भी बना। ‘खादी”गाँधी”चरखा’ अपने आपमें बीसवीं शताब्दी का एक करिश्मा है। यह बताता है कि किस तरह आप अपनी शिल्पकला से स्वयं को स्वाधीन रख पाते हैं।

लेखक

चिन्मय मिश्र


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