अध्यात्म या धर्म? कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है? The Difference Between Spirituality and Religion

अतुल विनोद:

आध्यात्मिक और धार्मिक दुनिया में बहुत अंतर नहीं है बशर्ते धर्म का सही अर्थ समझ लिया जाए| मनुष्य का मूल धर्म आध्यात्मिक होना ही है| "बाहरी धर्म कर्मकांड है, भीतरी धर्म अध्यात्म"

अधिकांश प्रचलित धर्म  मनुष्य को अंधभक्त, कूपमंडूक बनाते हैं| अध्यात्म व्यक्ति को संस्कारों से मुक्त कर स्वभाविक आनंद से जोड़ता है, सवाभाविक मुक्त आनंद का भागिदार बनना ही असल धर्म है |

हमारे संस्कार चाहे वह अच्छे हो या बुरे, मुक्तानंद की राह में बाधा हैं| अध्यात्म इन संस्कारों के आवरण को हटाकर वास्तविक स्वरूप को उजागर करने का नाम है| 

मनुष्य और यंत्र में जो अंतर है वह चेतना का है|  मनुष्य की चेतना जब जगत की तरफ होती है तब काम, क्रोध, लोभ, मोह,  ईर्ष्या, घृणा की प्रधानता होगी|

जब “काम” बढ़ेगा तो दुराचार बनेंगे, बहिर्मुखी चेतना के कारण बढे काम के कारण ही दुष्कर्म के इतने प्रकरण सामने आते हैं| 

जब “क्रोध” बढ़ेगा तो आपसी कलह बढ़ेगी| देश, प्रांत, जाति, धर्म, मत, पंथ, संप्रदाय, क्षेत्र, भाषा, लिंग, रंग, गुट के नाम पर झगड़े होंगे|

“लोभ” से भी कई तरह की बुराइयां पैदा होती है| लोभ में व्यक्ति अच्छे बुरे का भेद भूल जाता है| ऐसा कर देता है जिसकी सजा उसको कभी ना कभी भुगतनी पड़ती है|

जब “मोह” बढ़ेगा तो तकलीफ़ बढ़ेंगी,  मोह से घिरा हुआ आदमी अपने अपने परिवार, अपने प्रेमी-प्रेमिका या अपने खास व्यक्ति के लिए,  प्रकृति और सांसारिक नियम कायदों को ताक पर रखकर बेईमानी भ्रष्टाचार का सहारा लेने से भी नहीं चूकेगा| 

मद में चूर व्यक्ति मनमानी करेगा,  मानवीय मूल्यों की हत्या करेगा, दूसरों के हितों पर कुठाराघात करेगा| 

इसी तरह से ईर्ष्या और घृणा भी समाज व राष्ट्र के लिए नुकसानदेह है एक दूसरे के प्रति असहिष्णुता, बैर, नफरत की वजह  ईर्ष्या और घृणा है| 

अध्यात्म अपनी चेतना को अंतर्मुखी कर आंतरिक रूपांतरण  की प्रक्रिया को क्रियाशील करने का नाम है|

अध्यात्म को लेकर बहुत सारी भ्रांतियां है|  अधिकांश लोगों को नहीं मालूम कि आखिर अध्यात्म है क्या? अध्यात्म की राह पर चला कैसे जाए?  अध्यात्म चेतना के सुप्त भाग(कुंडलिनी)क्रियाशील करके आत्माभिमुख करने का नाम है| क्रियाशील आंतरिक चेतना अपनी शक्तियों से मनुष्य को वाह्य जगत से हटाकर अंतर्जगत में केन्द्रित करती है|  चित्त को तरंगित कर संस्कारों को हमेशा हमेशा के लिए क्षीण करती है|


जब आत्मा से शुभ या अशुभ संस्कार हट जाते हैं तो काम क्रोध आदि विकार दूर होने लगते हैं| व्यक्ति प्रेम,कृतज्ञता और मैत्री के भाव से भर जाता है| ऐसा व्यक्ति न सिर्फ खुद शाश्वत आनंद का भागीदार बनता है बल्कि अन्य लोगों को भी इस राह पर चलने में मदद करता है| यही आध्यात्मिक दुनिया है जो हम सब के बेहतर  रूप से जीने का स्थान है|

ATUL VINOD



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