ताक़त सिर्फ फ़ौजी नहीं होती -दिनेश मालवीय

समाज को भी मजबूत होना होगा

dineshयोद्धा संन्यासी स्वामी विवेकानंद का कहना है कि शक्ति ही धर्म है, दुर्बलता अधर्म. एक बार एक नवयुवकने उनसे पूछा कि गीता में क्या है? स्वामीजी ने कहा कि अभी जाओ, फ़ुटबाल खेलो. पहले अपने शरीर और मस्तिष्क को मजबूत बनाओ, फिर गीता को समझ लेना. जीवन में शक्ति ही काम आएगी. वह यह एक सार्वभौम सत्य है. जिसके पास ताकत नहीं होती उसे हर कोई दबाता है. जो कमज़ोर है, उसका कोई साथ भी नहीं देता.

महाभारत में सभा पर्व में भीष्म पितामह द्रौपदी से कहते हैं कि, जिसके पास शक्ति होती है, वह जो कुछ कहता है, वही धर्म होता है. कमज़ोर व्यक्ति की धर्मयुक्त बात को भी नहीं मना जाता. 

यह बात व्यक्तिगत स्तर पर जितनी सही है, उतनी ही समाज और राष्ट्र के स्तर पर भी. लेकिन शक्ति या ताक़त का सही अर्थ समझना ज़रूरी है.

राष्ट्र के सन्दर्भ में आमतौर पर फ़ौजी ताक़त को ही ताक़त समझा जाता है. बेशक़, यह बात बहुत हद तक सही है. जिस देश के पास फ़ौजी ताक़त नहीं होती, उसका अस्तित्व हमेशा खतरे में रहता है. हर रोज़ नए नए शस्त्र बनाए जा रहे हैं और देशों को उन्हीं के अनुसार अपनी ताक़त लगातार बढ़ाते रहना अनिवार्य होता है.

कोई देश वैचारिक, सांस्कृतिक और ज्ञान के मामले में कितना भी सशक्त क्यों नहीं हो, लेकिन अगर उसके पास फ़ौजी ताक़त नहीं हो, तो कोई भी उसे नष्ट कर सकता है. प्राचीनकाल में ज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में यूनान पश्चिमी दर्शन का सबसे बड़ा और सशक्त केंद्र था. वहां के लोगों ने चिंतन की जिस ऊंचाई को छुआ था, वह अद्भुत थी. लेकिन जब 431 ई.पू. स्पार्टा ने उस पर आक्रमण किया, तो उसका चिन्तन और ज्ञान कुछ काम नहीं आया. वे लोग क्रूर थे. जब सामने कोई क्रूर आततायी हथियार लेकर आपको मारने खडा हो, तो आप कितनी भी अच्छे इंसान हों, वह आपको मारने में ज़रा भी संकोच नहीं करेगा. आप भले ही वीर हों, यदि आपके पास लड़ने के साधन नहीं होंगे, तो आप उसका मुकाबला नहीं कर पायेंगे. हार जाएँगे.

ऎसी ही परिस्थिति के सन्दर्भ में मैंने एक कविता लिखी थी, जिसकी प्रथम दो पंक्तियाँ इस प्रकार थीं-

“बात यह मेरी समझ से पार जाती है

क्रूरता से वीरता क्यों हर जाती है.

लेकिन ताक़त या शक्ति के सन्दर्भ में हम अक्सर सिर्फ फ़ौजी ताक़त को ही ताक़त समझने की भूल करते हैं. यही भूल अक्सर बहुत भारी पड़ जाती है. फ़ौज सरहदों पर लड़ाई करती है. देश और समाज के भीतर तो नागरिकों की देशभक्ति की भावना, आपसी सद्भाव, संस्कार, समझदारी और परस्पर समन्वय ही काम आता है. यही देश की बड़ी शक्ति होती है. देश में अगर आपस में फूट हो, लोग एक-दूसरे पर अविश्वास करते हैं, सब अपनी डफली अपना राग बजा रहे हों, एक-दूसरे के प्रति द्वेष रखते हों, व्यक्तिगत हितों को राष्ट्रीय हितों से ऊपर रखा जाता हो, तो देश और समाज के टूटने का बहुत खतरा होता है.

Dinesh Malviya

एक और बात लोगों के मुंह से बहुत सुनी जाती है कि, देश पर कोई खतरा आने पर हम सीमा पर लड़ने-मरने वालों में सबसे आगे होंगे. लेकिन वे इस बात को भूल जाते हैं कि, देश के लिए मरना ही नहीं, देश के लिए जीना भी देशभक्ति होती है. देशभक्ति के लिए फ़ौज में जाना या सरहद पर लड़ना ही ज़रूरी नहीं है. अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निर्वहन करना भी महान देशभक्ति है. जो व्यक्ति जहाँ है, वहीं से देश की सेवा कर सकता है. हर व्यक्ति अपने निर्धारित कार्य को यदि पूरी निष्ठा और लगन से काम करे, तो यह भी देशभक्ति है.

शिक्षक और या वकील, शासकीय सेवक हो या व्यापारी, चिकित्सक हो या इंजीनियर, सभी अपने-अपने काम को करते हुए देश के हित का ध्यान रखें, तो यह भी सरहद पर लड़ने से कम देशभक्ति नहीं है. हम जो भी कर रहे हैं, उसके केंद्र में यदि हम अपने देश को रखें तो इससे बड़ी देशभक्ति और क्या हो सकती है.

दुर्भाग्य से बीते कुछ दशकों में हमारी फ़ौजी ताक़त तो इतनी बढ़ गयी है कि, कोई भी कुछ हिमाक़त करने की जुर्रत नहीं कर सकता. लेकिन शक्ति का दूसरा भाग, यानी हमारी सामाजिक सुदृढ़ता उसी अनुपात में का हो गयी है. इसके लिए कोई एक व्यक्ति, समुदाय या समूह जिम्मेदार नहीं है. यह बहुत सारे कारणों से हुआ. कोई भी अपने आपको इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकता. अपने काम के प्रति हमारी सोच में व्यक्तिवाद पूरी तरह हाबी हो गया है. हम सब कुछ अपने लिए करने लगे हैं. हमारा समष्टि चिन्तन लगभग समाप्त हो गया है. हम सिर्फ अपने परिवार के बाए सोचते हैं. हमारी सोच में देश और समाज नहीं होता.

देश जाति, धर्म और समुदाय के आधार पर विभाजित होता चला जा रहा है. यही आज हमारे देश की सबसे कमज़ोर कड़ी साबित हो रहा है.

आज सबसे बड़ी ज़रुरत यह है कि हम अपने पारिवारिक-सामजिक तानेबाने को किसी तरह कमज़ोर नहीं होने दें. परिवार संस्था हज़ारों साल से भारत की सबसे बड़ी शक्ति रही है. पारिवारिक विघटन आज आज देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया है. संबंधों में पहले जैसी ऊष्मा नहीं रह गयी है. परस्पर विश्वास में कमी आयी है. देशविरोधी ताकतें हमारी इस कमजोरी का पूरा फायदा उठाकर अपना एजेंडा चला रही हैं. इनमें किसी एक जाति, धर्म या समुदाय के लोग नहीं हैं. हर तरह के लोग इस काम के लिप्त मिलते हैं. हमारी युगों से मानी परम्पराओं का मखौल उड़ाया जा रहा है. हमारे शास्त्रों और धार्मिक आस्थाओं की हँसी की जा रही है. नयी पीढ़ी को अनेक तरह से भ्रमित कर उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से काटा जा रहा है.

ऐसी स्थिति में दूसरों पर दोषारोपण करने के बजाय, हमें आत्मनिरीक्षण कर अपने आचरण और व्यवहार में सुधार करने की ज़रूरत है. ऐसा करके ही देश सही आर्थों में ताक़तवर बन सकेगा. देश की रक्षा के लिए सिर्फ फ़ौजी ताक़त काफी नहीं है. हमारी सामाजिक शक्ति भी मजबूत होनी चाहिए.

“दलित सवर्ण “, नहीं पूछते दलितों को सारा दोष दूसरों पर मढ़ना उचित नहीं.. दिनेश मालवीय

Priyam Mishra



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