राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की दृष्टि में सफलता : Success in the eyes of President Abdul Kalam

राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की दृष्टि में सफलता

महान लोगों की सफलता की यदि हम बात करें और भारत के राष्ट्रपति महामहिम अब्दुल कलाम का जिक्र न हो, यह न्यायसंगत न होगा सही मायनों में तो फर्श से अर्श तक का सफर तो अब्दुल कलाम साहब ने ही तय किया है। उन्हें सफलता नहीं, परम सफलता पाई है। मिसाइल-मैन के नाम से प्रख्यात डॉ. अब्दुल कलाम अपने क्षेत्र में सफलता के शिखर पर पहुंच चुके थे, किन्तु वहां पहुंचकर भी उन्हें और आगे जाना है, इस बात को शायद वे स्वयं भी उसी दिन जान पाए जिस दिन भारत के सभी शीर्ष नेताओं ने उसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के राष्ट्रपति का गरिमामय पद संभालने की अनुशंसा की।

सवाल उत्पन्न होता है कि जीवन में ऐसी सफलता उन्होंने कैसे पाई? रामेश्वरम के एक गांव की एक छोटी सी झोंपड़ी से राष्ट्रपति भवन तक का सफर उन्होंने किन गुणों के बूते पर तय किया? इसका खुलासा महामहिम ने एक बार बच्चों को सम्बोधित करते स्वयं किया। उन्होंने सफलता के सात सूत्र बताए:

1. जिज्ञासा हुए

2. ज्ञान

3.लगन

4. दृढ़ संकल्प

5. विचारमंथन

6. परिश्रम

7. जानकारी

यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि महामहिम ने किसी पुस्तक से पढ़कर अथवा खानापूर्ति करने के लिए यह सूत्र नहीं बताए, उन्होंने अपने जीवन में इन सूत्रों को अपनाकर ही परम सफलता हासिल की है।

जिज्ञासा युवकों, बच्चों और प्रत्येक सफलता के इच्छुक भारतवासी को जिज्ञासा होना चाहिए। सदा कुछ-न-कुछ जानने की जिज्ञासा, खोजी प्रवृत्ति व्यक्ति को एक-न-एक दिन किसी नई दुनिया में पहुंचा देती है। क्यों? कैसे? जैसे सवाल उसके मस्तिष्क को कुरदने लगते हैं…तो वह स्वयं एक नए संसार की ओर बढ़ता है और वहां से कुछ-न-कुछ नया हासिल करता है। वह ‘कुछ’ उसके जीवन में बदलाव ले आता है। जो सदा नया कुछ जानने को उत्सुक रहता है, जिसे किसी भी दिशा में, किसी भी खोज के लिए दूसरों के सहारे की दरकार नहीं होती, साथ ही जो साहसी भी है, जिसमें ऐसी भावना हो कि मुझे वहां पहुंचना है जहां पहले कोई न पहुंचा हो, जो ऐसा काम करने की चाह रखता हो, जिसे पहले किसी ने नहीं किया, वही किसी नए निर्माण, नए अन्वेषण अथवा नई सिद्धि को प्राप्त करता है। ऐसे ही लोगों के कारनामे इतिहास के पन्नों पर सुनहरी स्याही से लिखे जाते हैं।

प्रोफेसर चंद्रशेखर वेंकटरमन का नाम आज इतिहास में क्यों अमर है? केवल जिज्ञासा के कारण। वे बचपन से ही जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे। एक बार बरसात के दिनों में इंद्रधनुष को देखकर उन्होंने अपने दादा से पूछा, यह क्या है?’

दादा बोले, ‘इंद्रधनुष।

‘यह इतना सुंदर कैसे बनता है? ‘इसे भगवान बनाता है।’

‘कैसे बनाता है?

जादू से।

बस, बालक रमन जिद करने लगे कि हमें भी इंद्रधनुष बनाकर दो। दादाजी ने किसी प्रकार समझाया, मगर बालक रमन की जिज्ञासा शांत न हुई। यह जिज्ञासा कालांतर में उनके शोध का महत्वपूर्ण आधार बन गई। जब भी बरसात के दिनों में इंद्रधनुष निकलता, रमन उसे घंटों देखते रहते। एक दिन सचमुच ऐसा आया, जब रंगों पर काम करते हुए उन्होंने रमन प्रभाव नामक एक सिद्धांत दे डाला। इसी पर उन्हें 1930 में नोबल नवाजा गया। पुरस्कार से तो यह है जिज्ञासा का प्रभाव। जिज्ञासा डूब जाता है उसी विषय में और जब तक अपनी जिज्ञासा शांत नहीं कर लेता, उसे चैन नहीं मिलता।

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