स्वामी विवेकानंद की बात आज सही सिद्ध होना ही चाहिए, चीन और पाकिस्तान का पाखण्ड उजागर.. दिनेश मालवीय


स्टोरी हाइलाइट्स

भारत के परम तेजस्वी योद्धा सन्यासी स्वामी विवेकानद ने 1893 में शिकागो धर्म संसद के पहले भाषण में कहा था कि, यह संसद संसार से..

स्वामी विवेकानंद की बात आज सही सिद्ध होना ही चाहिए, चीन और पाकिस्तान का पाखण्ड उजागर.. दिनेश मालवीय भारत के परम तेजस्वी योद्धा सन्यासी स्वामी विवेकानद ने 1893 में शिकागो धर्म संसद के पहले भाषण में कहा था कि, यह संसद संसार से धार्मिक उन्माद और कट्टरता के लिए मौत की घंटी साबित होगी. हिन्दू जीवन-दर्शन को पूरी तरह आत्मसात कर चुके किसी व्यक्ति के मन में ऐसा विचार आना और उसे सार्वजनिक रूप से बोलना बहुत स्वाभाविक था. उन्होंने तो वही बात कही थी, जो हज़ारों साल से भारत के ऋषि करते चले आ रहे थे. उस भाषण पर दुनिया के सभी धर्म-प्रतिनिधियों और उपस्थित श्रोताओं ने जमकर तालियाँ बजाई थीं. उनके मन में एक बेहतर विश्व की कल्पना सच होने लगी थी. लेकिन अफ़सोस कि, आज 128 साल बाद भी उनकी इस कामना के एकदम विपरीत बात हो रही है. हालाकि स्थितियां बदलने में बहुत लंबा समय लगता है, लेकिन तब से आज तक का समय कोई कम भी नहीं है. यह कितनी अजीब और विरोधाभासी बात है कि, अभूतपूर्व प्रगति और ज्ञान के इस युग में हम उन बातों पर लड़ रहे हैं, जो सदियों पहले अप्रासंगिक हो जानी चाहिए थीं. लोग ख़ुद को बदलना ही नहीं चाह रहे. ऊपर से बहुत सभ्य और प्रगतिशील दिखने वाले लोग भीतर से आज भी दो-तीन सदी पुराने ही हैं. सामान्य लोगों की बात तो छोडिये, विभिन्न धर्मों के प्रमुख तक आज भी वैसे ही बने हुए हैं. इतना ही नहीं, ऐसा लगता है कि वे लोगों को भी ऐसा ही रखना रखना चाहते हैं. लोग यदि अपनी सोच में प्रगतिशील हो गये, तो उनसे अंधानुकरण की उम्मीद नहीं की जा सकती. दुनिया में शान्ति-अमन और भाईचारे की कितनी बातें होती रही हैं. आधुनिक दुनिया में दो विश्वयुद्ध होने के बाद शान्ति की रटना ख़ूब लगी. नोबेल शान्ति पुरस्कार दिए जाने लगे. लेकिन बहुत अजीब बात यह है कि, जो देश शान्ति की बातें अधिक करते रहे हैं, वे ही दुनिया में सबसे ज्यादा घातक हथियार बनाकर दुनिया के दूसरे देशों को बेचते हैं. यह उनकी अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है. दुनिया में सबसे अधिक ईसाई देश हैं. इस धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह तो शांतिदूत ही थे. वह कहते थे कि, यदि कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मार दे तो तुम उसके सामने दूसरा गाल कर दो. बहरहाल, यह  चेतना के उच्चतम स्तर पर पहुंचे हुए एक महान व्यक्ति की सोच थी, जिसे देश-राष्ट्र पर लागू नहीं किया जा सकता. लेकिन फिर भी इतने बड़े महापुरुष के अनुयाइयों को वैसा  तो नहीं करना चाहिए था, जैसा वे कर रहे हैं. इन देशों  ने दुनिया में हथियारों की ऐसी होड़ शुरू की कि, आज विभिन्न देशों के पास इतने घातक हथियार जमा हो गये हैं कि, उनसे वर्तमान दुनिया जैसी पचास दुनियाओं को ख़ाक में मिटाया जा सकता है.   इस्लाम का तो इतिहास ही हिंसा से भरा हुआ है. अपनी स्थापना से लेकर इसके अनुयाइयों ने लाखों लोगों को धर्म के नाम पर ही मौत के घाट उतारा है. अपने पैगमबर साहब के परिवार को ही उन्होंने  क़त्ल कर दिया. आज अफगानिस्तान में जो अमानवीय ही नहीं शैतानी काम हो रहे हैं, वे भी तो धर्म के नाम पर ही हो रहे हैं. स्त्रियों और बच्चों को भी नहीं बक्शा जा रहा. लोगों से अपनी तरह से जीने की  आज़ादी छीनी जा रही है. यह नृशंसता भी इसी कथित प्रगतिशील दुनिया में हो रही है. इस अमानवीयता से बच्चों, स्त्रियों और अन्य मासूम लोगों को बचाने के लिए कोई  भी हस्तक्षेप नहीं कर रहा. इसके विपरीत चीन और पाकिस्तान जैसे देश अफगानिस्तान में तालिबान “सरकार” को मान्यता देने की दुनिया से अपील कर रहे हैं. उनका पाखण्ड देखिये कि, अभी तक उन्होंने ख़ुद तालीबान “सरकार” को मान्यता नहीं दी है. हमारे देश में तो कुछ “महापुरुष” ऐसे भी हैं, जो अफगानिस्तान में तालिबान “सरकार” का स्वागत कर उन्हें स्वतंत्रता सेनानी बता रहे हैं. उनके मन में न जाने कैसे-कैसे सपने आकार लेने लगे हैं.     उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि, इस तरह से तालिबान का समर्थन पूरी  दुनिया को कितना महँगा पड़ने वाला है. यह ख़ुद इस्लाम की ही छवि ख़राब कर रहा है. ये लोग उनका स्वागत और समर्थन करने वालों को भी नहीं छोड़ेंगे. इन लोगों को तालिबान शासन  में एक दिन भी रहना पड़ जाए, तो वे इसके लिए राज़ी नहीं होंगे. क्या वे अपने बच्चों और परिवार को इस तरह  की व्यवस्था में जीने देंगे. आज स्वामी विवेकानंद  की बात सबसे ज्यादा प्रासंगिक है. दुनिया के सभी धर्मों के लोगों को सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर जीवन जीना सीखना होगा. हर धर्म की अपनी अलग संस्कृति, परम्पराएँ और मान्यताएं होती हैं, जो उनकी देश-काल परिस्थिति पर आधारित होती हैं. सभी को एक-दूसरे का सम्मान करते हुए उनके साथ अपने-अपने धर्म के अनुसार जीवन जीना सीखना होगा. कोई अगर यह अपना देख रहा हो कि, पूरी दुनिया को अपने अधीन कर लेगा, तो आज की दुनिया में यह संभव नहीं है. आज भारत सहित सभी देशों में रहने वाले मुस्लिमों को तालिबान के आचरण से उत्पन्न खतरे को समझकर उनके साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति नहीं रखनी चाहिए.