पितृदोष के लक्षण और कारण और निवारण

वैदिक ज्योतिष की तरह ही लाल किताब में भी पितृ दोष को स्वीकार किया गया है। इस लेख में ग्रहों की स्थिति के आधार पर विभिन्न प्रकार के नौ ऋणों के स्वरूप लक्षण और उपाय के बारे में बताया गया है।

पितृ ऋण की जब बात करते हैं तो एक ही बात मस्तिष्क में आती है कि हमसे पूर्व की पीढी के किसी व्यक्ति ने ऐसा कुछ किया जिसका खराब परिणाम हमें जीवन में देखने को मिलता है। इस विषय पर खूब चिंतन मनन अनुभव और विचार करने पर पाया कि अपने सहित चार पीढी का संबंध इस ऋण दोष के मूल कारण हैं। पिता बाबा पड बाबा के द्वारा जाने अनजाने में किए गए पाप का श्राप रूप में परिवर्तित हो जाना ही पितृ ऋण का कारण है। ग्रहों के आधार पर देखें तो राहु के साथ किसी भी ग्रह की संगति युति तथा दृष्टि संबंध बनने पर दोष को लक्षणों के माध्यम से चिन्हित किया जा सकता है। आजकल कालसर्पयोग को भी पितृ ऋण के रूप में ही मानना चाहिए क्योंकि शास्त्रों में सर्प योनी को पितृ योनी संज्ञा दी गई है। परन्तु ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सोलह प्रकार के पाप और श्रापों का वर्णन है।

नौ ग्रहों में किसी की भी राहु से युति अथवा चंद्र व सूर्य की केतु से युति या सूर्य-शुक्र, मंगल-शनि शुक्र बृहस्पति अथवा गुरु-बुध या चंद्र-बुध आदि की युति होने पर उन श्रापों का अनुभव तथा निर्णय किया जा सकता है। इन ग्रहों की युतियों के भिन्न भिन्न भाव में होने के अलग अलग परिणाम हैं। जो भी हो उसका दंड उस व्यक्ति को ही भोगना पड़ता है जिसकी कुडली में ये दोष होता है। पर ये सारा जीवन ऋण शोधन जैसा ही है। हमें अपने पूर्व जन्म में अथवा हमारे पूर्वजों द्वारा किए गए कार्यों का परिणाम पितृऋण के रूप में भोगना पड़ता है।

पितृऋण का निर्णय होने पर उसके समाधान पर विचार करना चाहिए। उसमें गंगा स्नान गया श्राद्ध तीर्थ यात्रा तीर्थों में जाकर पितृ तर्पण श्राद्ध कर्म तथा तीर्थों पर दान आदि शामिल है।

युग तीर्थों (पुष्कर, प्रयागराज, कुरुक्षेत्र अथवा हरिद्वार) तथा ब्रहम कपाल, बदरीनाथ जेसे पुण्य स्थानों में जाकर पितृ गायत्री ब्रहम गायत्री आदि के मंत्रों के जप अनुष्ठान से पितृ दोषों का निवारण किया जा सकता है।

वैसे तो भारत के भिन्न भिन्न क्षेत्रों में भिन्न भिन्न लोक देवताओं की पूजा के माध्यम से इन दोषों को दूर करने के और अन्य भी मार्ग हैं। परन्तु उपर्युक्त स्थानों की शास्त्रियता सर्वमान्य है। पितरों को श्राद्ध में भोजन वस्त्र तर्पण गौ ग्रास काक बली स्वान बली आदि के परंपरागत प्रयोगों के द्वारा भी शांत किया जाता है। परन्तु दोष के अति विशेष होने पर सभी प्रकार के शास्त्रीय लौकिक और कृत परंपरा के अनुसार उपायों को करना चाहिए।

इस संदर्भ में लाल किताब में उल्लिखित नौ ऋणों की चर्चा भी जरूरी है। ऐसे प्रत्येक ऋण के प्रत्यक्ष लक्षण कारण और निवारण इस प्रकार हैं:- पितृ ऋण:- बिना कारण सरकार से परेशानी हृदय रोग नेत्र रोग शरीर में कमजोरी का बना रहना पितृ ऋण का लक्षण है। जब कुंडली में बृहस्पति 2, 5, 9, 12 भावों से बाहर हो जो कि गुरू के पक्के घर हैं तथा बृहस्पति स्वयं 3, 6, 7, 8, 10 भाव में और बृहस्पति के पक्के घरों (2, 5, 9, 12) में बुध या शुक्र या
शनि या राहु या केतु बैठा हो तो व्यक्ति पितृ ऋण से पीड़ित होता है। समाधान के लिए विशेष रूप से परिवार के सभी लोग मिलकर के यज्ञ करें।

मातृ ऋण:- ऐसे लोगों को परेशानी के समय बहुत मुश्किल से मदद मिलती है। दूसरों का सम्मान नहीं करना, शिक्षा का लाभ नहीं, धन का नुकसान होते रहना इसके लक्षण हैं। जब कुंडली में चंद्रमा द्वितीय एवं चतुर्थ भाव से बाहर कहीं भी स्थित हो तथा चतुर्थ भाव में केतु हो तो व्यक्ति मातृ ऋण से पीड़ित होता है। अर्थात चंद्रमा विशेषतः 3, 6, 8, 10, 11, 12 भावों में स्थिति हो। विशेषतया माता के सुख में कमी अथवा माता का दुख का कारण होता
है। परिवार के सभी लोगों से पैसा इकट्ठा करके चांदी खरीद रके जल प्रवाह करना चाहिए।

स्त्री ऋण:- घर का दरवाजा दक्षिण दिशा में होना, किसी का मकान हड़पना, विवाहित गर्भवती स्त्री को घर से निकाल देना, संतान पैदा होने की अवस्था में गुप्त रोग होना आदि।

जब शुक्र कुंडली के 3, 4, 5, 6, 9, 10, 11 भावों में स्थित हो तथा द्वितीय या सप्तम भाव में सूर्य या चंद्र या राहु स्थित हो तो व्यक्ति स्त्री के ऋण से ग्रस्त होता है।

परिवार के सभी लोगों से पैसा लेकर स्वस्थ गायों को जो 100 की संख्या में हो चारा खिलाना तथा लगातार गौशाला में सेवा करने से लाभ होता है।

बहन का ऋण:- बहन को तकलीफ पहुंचाना उनका पैसा मार लेना तथा बच्चों को नुकसान पहुंचाना अथवा बच्चों में भेद भाव करना आदि इसके कारण हैं। जब कुंडली में बुध 1, 4, 5, 8, 9, 10, 11 भावों में स्थित हो तथा 3, 6 भावों में चंद्रमा हो तो व्यक्ति बहन के ऋण से ग्रस्त होता है। परिवार के सभी सदस्यों से बराबर धन लेकर कन्यादान करने छोटे बच्चों को या 100 कन्याओं को एक साथ भोजन कराने से इसमें लाभ मिलता है।

रिश्तेदारी का ऋण:– किसी के बनते मकान में अड़चन डालना किसी के विवाह संबंध में अड़चन डालना खुशी के समय गम का काम करना अथवा खुशी के समय दूर रहना आदि। जब कुंडली में मंगल 2, 4, 5, 6, 9, 11 वे 12 भावों में स्थित हो तथा प्रथम व अष्टम भाव में बुध केतु स्थिति हो तो व्यक्ति रिश्तेदारी के ऋण से ग्रस्त होता है।

परिवार के सभी सदस्यों से बराबर मात्रा में धन इकटठा करके मुफ्त दवाई देने वाले डॉक्टर-हकीम की मदद करने से लाभ मिलता है।

जालिमाना ऋण:- बिना कारण के किसी पर मुकदमा कर देना शिक्षा में असफल होना किसी को धोखा देना इसके मुख्य लक्षण हैं। संतान की या ससुराल में असमय मृत्यु होना खराब खाना खाने से हुई बीमारी होना आदि। कुंडली में ग्यारहवें तथा दसवें भाव में सूर्य चंद्र मंगल का एक साथ होना अथवा अलग अलग होना इसके ग्रह लक्षण हैं। जब कुडली में शनि 1, 2, 5, 6, 8, 9, 12 भावों में स्थित हो तथा 10 या 11 भावों में सूय/चं/मंगल स्थित हो तो
व्यक्ति जालिमाना ऋण से पीड़ित होता है। परिवार के सदस्यों की संख्या से चार नारियल अधिक लेकर के एक ही बार में जल प्रवाह करने से लाभ होता है।

अजन्में का ऋण:- बिजली का झाटका या बिजली का खराब होना ज्यादा धन होने पर भी समय समय पर नुकसान होना सोना खोना परिवार में काली खंसी मिर्गी सांस आदि की तकलीफ घर के आस पास कूड़े का ढेर असके लक्षण हैं । जब कुडली में राहु 6, 12, 3 भावों के अतिरिक्त किसी भी भाव में हो तथा 12वें भाव में सूर्य/मंगल शुक्र मौजूद हो तो व्यक्ति अजन्में के ऋण से र्गस्त होता है । परिवार के सीरीजी लोगों से बाराबर पैसा लेकर अलग अलग स्थानों की मछलियों को एक ही दिन में भोजन कराने से लाभ होता है ।

आध्यात्मिक ऋण:- बच्चों की असमय मृत्य होना, हड्डियों की तकलीफ, पेशाब की बीमारी, कानों के रोग, लकवा, ननिहाल में परेशानी यात्रा में असुविधा या हानि आदि इसके मुख्य लक्षण हैं। जब कुंडली में केतु 2, 6, 9 के अतिरिक्त किसी भी भाव में हो तथा छठे भाव में चंद्रमा/मंगल स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति पर आध्यात्मिक ऋण होता है। कुत्ते को मारने, किसी की बहु या बच्चों को गलत शिक्षा देना, लालच के कारण किसी का नुकसान करना भी इसी के लक्षण हैं। परिवार के सदस्यों से बराबर पैसा इकट्ठा करके एक ही दिन में 100 या 100 से अधिक कुत्तों को भोजन कराना, फीके खोये के लड्डू का भोजन कराने से भी लाभ प्राप्त होता है। विशेष रूप से पितृ ऋण की सभी प्रकार की हिंदू पद्धतियों के सारांश रूप की चर्चा पूर्व में ही की गई है पर लाल किताब में मदिर को तोड़ना पीपल का पेड़ कटवाना अथवा कुल पुरोहित को बदल लेना भी पितृऋण के लक्षण हैं। ऐसी स्थिति में काली खांसी की शिकायत दुनिया की बुरी चीजों का कलंक लगना किसी घर के बुजुर्ग के एक साथ सारे बाल सफेद हो जाना इसके लक्षण हैं। जबकुंडली में केतु 2, 6, 9 के अतिरिक्त किसी भी भाव में हो तथा छठे भाव में चंद्रमा/मंगल स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति पर आध्यात्मिक ऋण होता है। दूसरी स्थिति में बनने वाले ऋण में कोई ग्रह जब नवम भाव में स्थित होता है तो उस नवमस्थ ग्रह की राशि में बुध के बैठने पर ऋण पितृ से कुंडली ग्रस्त होती है। इन दोनों प्रकार के ऋणों का फलादेश अलग अलग होता है। ऐसी स्थिति में परिवार के सभी सदस्यों से धन इकट्ठा करके धर्म स्थान में दान देने से लाभ होता है। वह धर्म स्थान मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा या चर्च में से कोई भी हो सकता है। परिवार
के इन सदस्यों में दादा-दादी, माता-पिता, बहन-बेटी, बुआ-भाई, ताया-चाचा के परिवार के सदस्यों की संख्या भी है। इन सबको शामिल करना चाहिए।

इस प्रकार ऋणों का यह सिद्धांत सभी जाति धर्म संप्रदाय के मनुष्य मात्र को मानना चाहिए। इन समाधानों के माध्यमों से निश्चित रूप से लाभ होता है। सभी को इनका लाभ लेना चाहिए।

भारतीय ज्योतिष में सूर्य को पिता का कारक व मंगल को रक्त का कारक माना गया है। अतः जब जन्मकुंडली में सूर्य या मंगल, पाप प्रभाव में होते हैं तो पितृदोष का निर्माण होता है। पितृ दोष वाली कुंडली में समझा जाता है
कि जातक अपने पूर्व जन्म में भी पितृदोष से युक्त था। प्रारब्धवश वर्तमान समय में भी जातक पितृदोष से युक्त है। यदि समय रहते इस दोष का निवारण कर लिया जाये तो पितृदोष से मुक्ति मिल सकती है। पितृदोष वाले जातक के जीवन में सामान्यतः निम्न प्रकार की घटनाएं या लक्षण दिखायी दे सकते हैं।

1. यदि राजकीय/प्राइवेट सेवा में कार्यरत हैं तो उन्हें अपने अधिकारियों के कोप का सामना करना पड़ता है। व्यापार करते   हैं, तो टैक्स आदि मुकदमे झेलने होंगे। सामान की बर्बादी होगी!

2. मानसिक व्यथा का सामना करना पड़ता है। पिता से अच्छा तालमेल नहीं बैठ पाता।

3. जीवन में किसी आकस्मिक नुकसान या दुर्घटना के शिकार होते हैं।

4.  जीवन के अंतिक समय में जातक का पिता बीमार रहता है या स्वयं को ऐसी बीमारी होती है जिसका पता नहीं चल पाता।

5. विवाह व शिक्षा में बाधाओं के साथ वैवाहिक जीवन अस्थिर सा बना रहता है।

6. वंश वृद्धि में अवरोध दिखायी पड़ते हैं। काफी प्रयास के बाद भी पुत्र/पुत्री का सुख नहीं होगा।

7. गर्भपात की स्थिति पैदा होती है।

8. अत्मबल में कमी रहती है। स्वयं निर्णय लेने में परेशानी होती है। वस्तुतः लोगों से अधिक सलाह लेनी पड़ती है।

9. परीक्षा एवं साक्षात्मार में असफलता मिलती है।

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