तन्त्र कुण्डलिनी और अर्द्धनारीश्वर, श्री चक्र, भैरवी चक्र

अर्द्धनारीश्वर

 

इस सृष्टि का निर्माण एवं संचालन तो (+) एवं (-) की ति से हो रहा है; किन्तु (+ ) एक सापेक्ष शक्ति है। इसका वस्तुतः कोई अस्तित्व नहीं है। परमाणुओं को देखें इसके इलेक्ट्रॉन परमाणु में (-) होते हैं; किन्तु जब ये मुक्त होते हैं; तो ( +- ) होते हैं और बिजली की धारा के रूप में बहते हैं। इसी प्रकार सूर्य पृथ्वी का ( + ) हैं; परन्तु निहारिका के ऊर्जातत्व का (- ) अर्थात इस सृष्टि में एक का (+) दूसरे का (-) और एक का (-) दूसरे का ( + ) बना हुआ है। ऐसा कोई बिन्दु नहीं, जो ( + ) एवं (-) दोनों का काम कर रहा हो। यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड इसी प्रकार श्रृंखलाओं में जुड़ा हुआ है। प्रत्येक कण में दोनों पोल हैं और इनके दोनों पोल सूक्ष्म तरंगों की धाराओं से अन्य कण या पदार्थ से जुड़े हुए हैं।


इस प्रकार ब्रह्माण्ड में एक-दूसरे से सम्बन्धित होकर शक्ति की असंख्य धारायें बह रही हैं। उस परमपुरुष परमात्मा के अनन्त फैलाव के अंश में संकोचन से आद्या शक्ति प्रकट हुई। वह पुरुष और नारी अर्थात् ईश्वर एवं शक्ति में बंट गयी। इसके पश्चात् इनकी रतिक्रिया में अनेक विभाजित धारायें बन गयीं और वे सभी एक-दूसरे से रतिरत हो गयीं। इस प्रकार शक्ति के ये दो रूप कण-कण में व्याप्त हो गये। किन्तु जिस परमात्मा से आद्या शक्ति ने जन्म लिया, वह न पुरुष है, न नारी।

आद्या शक्ति उसके ही रूप से अवतरित हुई। वह भी मूलरूप से वही है। सिर्फ सागर के जल में बनने वाली बर्फ के समान उसका रूप परिवर्तन है इस तरह उस परमात्मा में नारी शक्ति और पुरुष शक्ति अर्थात ( - ) एवं ( + ) दोनों समाहित हैं अर्थात् इस प्रकृति में तत्वरूप मे है और परमात्मा का जो तत्वरूप मूल है, वह एक ही है, अविभाज्य है। जो रति आदि की अनुभूति जीव को होती है; वह भी अनुभूति भ्रम है । वस्तुतः इस ब्रह्माण्ड में कोई तत्व ही नहीं है। ( + ) एवं ( - ) का केवल भ्रम हो रहा है. क्योंकि (-) का कोई अस्तित्व नहीं है। वह सापेक्ष गुणसूत्र है। अर्धनारीश्वर की वैज्ञानिक व्याख्या यही है। यह सत्य भी है। वह सापेक्ष गुण मात्र है। एक पुरुष समझता है कि वह (+) एवं नारी (-) शक्ति है; किन्तु दोनों ही ब्रह्माण्डीय के लिये (-) हैं और नारी भौतिक कर्त्तव्य करते समय (+) है। इसका अर्थ यह है कि वस्तु अंधकार या ( - ) का कोई अस्तित्व नहीं है। वह परमात्मा ही (+ ) और (-) की लीला दिखा रहा है ।

इस 'तत्वज्ञान' के वैज्ञानिक सिद्धांत एवं सूत्रों की एक विलक्षणता है कि यह ब्रह्माण्ड की सभी इकाइयों की समान रूप से व्याख्या करता है। अर्द्धनारीश्वर प्रतीकसूत्र का आरोपण यदि किसी परमाणु या जीव पर किया जाये, तो स्पष्ट होता है कि इस माया मरीचिका का कोई कण ऐसा नहीं है, जो केवल (+) हो। प्रत्येक कण (-) एवं (+) पोलों से युक्त हैं। प्रत्येक जीव में ये दो पोल हैं। इनके बीच शक्ति की धारायें बहती हैं और इसी धारा है कारण इनका अस्तित्व है। (+ ) का सम्बन्ध ब्रह्माण्डीय शक्ति-तरंगों से और (-) का स्थूलता से है जीव में भी यही स्थिति है अर्थात् इस ब्रह्माण्ड की प्रत्येक छोटी-बड़ी इकाई अर्धनारीश्वर है। वस्तुतः यह 'आत्मतत्व' की प्रकृति की व्याख्या है। वह आत्मा पुरुष भी है और नारी भी। प्रत्येक कण में वही दो रूपों में विभाजित है। आत्मा में दोनों समाहित हैं। अत: यह वह अर्द्धनारीश्वर है।


श्री चक्र, भैरवी चक्र आदि में भी इसी सूत्र को व्यक्त किया गया है। जब किसी जीव में रतिभाव व्याप्त होता है, तो प्रथम गति उसके ही शक्ति चक्र अर्थात श्री चक्र की नाभि (हृदय का विशुद्ध चक्र) पर होता है। यही ( +) एवं (-) आते. मिलते हैं और स्फुलिंग होता है।(+)(-) इस स्फुलिंग के कारण जो ऊर्जा मुक्त होती है , वह समस्त हृदय और शरीर के साथ-साथ रक्त आदि को भी आवेशित कर देती है और प्रत्येक की गति बढ़ जाती है। यह आवेश यदि केन्द्रीभूत होकर सुसुम्ना नाड़ी द्वारा ऊपर की ओर ब्रह्मबिन्दु तक ले जाया जाये, तो इससे आत्मिक विकास किया जाता है। सम्भोग से समाधि में इसी कामशक्ति का प्रयोग किया जाता है और कुंडलिनी-साधना में भी।


यही आवेश स्थूल शरीर के तत्वों से रति करके हार्मोन्स उत्पन्न करता है। हार्मोन्स की रति से वीर्य बनता है। वीर्य की रति से शुक्राणु बनते हैं और ये जीवाणु होते हैं। इस जीवाणु के बनने तक तो शरीर में सैकड़ों रति क्रियायें सम्पन्न हो जाती हैं । यह आवेश न हो, तो शरीर किसी भी प्रकार से गति नहीं कर सकता। अतः एक ही शरीर में नारी एवं पुरुष दोनों शक्तियां होती हैं और उनमें एक सामान्य गति हमेशा होती रहती है। सन्तानोत्पत्ति वाली रति विशिष्ट प्रकार की गति है।


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