आर्टिफिशियल माइंड से घिरे किशोर – नौजवान

आज का किशोरावस्था एक नई दिशा व पहचान के लिव उत्सुक होता है । जिसके चलते इस शारीरिक परिवर्तन काल में मन में तरह-तरह विचार आते रहते हैं । यह उम्र एक अवस्था से दूसरी अवस्था की ओर की ओर अग्रसर रहता है । इसलिए इस परिवर्तन काल में अच्छे बुरे की पहचान ही नहीं हो पाती है और कभी अच्छे कभी गलत कदम उठा लेते हैं जिसके कारण मन में तनाव जैसी स्थिति आ जाती है। किशोरवस्था बुद्धि का विकास पूर्ण नही होता है, फिर भी ये कुछ कर गुजरने की जहमत उठाने में गुरेज नही करते हैं। जिससे अपनी एक पहचान बना सकें और चर्चा में रहें। इनके लिए हर प्रतिस्पर्धा में जीत आवश्यक है। हार इन्हें जरा भी पसंद नही हैं। हार का मतलब सीधे सुसाइड समझते हैं। जबकि हार से ही जीत की शुरुआत होती है,पर कौन इन्हें समझाये। ये अवस्था ही आवेशित, उग्र, आक्रमक होती है। इन्हें प्यार व शांत मन से समझाया जा सकता है।

अब किशोरों की लाइफ पहले से काफी बदल चुकी है। ये शिक्षक, महान खिलाड़ी,राजनीतिक, आदि को अपना आदर्श मानते थे। लेकिन अब तो वीडियो गेम में मशगूल रहने वाले किशोरों को गेम में मौजूद कैरेक्टर को अपना हीरो मान रहे हैं। एक नई आर्टिफिशियल माइंड जन्म ले रहा है। जो बच्चों ही नही माँ व बाप के लिए भी घातक सिद्ध हो रहा है। पहले बच्चे गुल्ली डंडे से लेकर न जाने कितने खेल खेलते थे। वहीं अब कंप्यूटर, वीडियो गेम, को अपना सहारा बना लिया है ।

 

इस तरह के खेल किशोरों को अवसाद को ढ़केल रहा है। इन सब में कहीं न कहीं माता पिता की भी भूमिका अहम है। क्योंकि इनकी व्यस्तता हो बच्चों को एकांत में जीने को मजबूर करती है। हर व्यक्ति अब सिर्फ अपने लिए जीता है। परिवार के हर सदस्य अपनी ही राम कहानी में मस्त रहते हैं, बच्चों के साथ बैठने का मौका ही नही रहता है। बच्चों की हर इच्छा को पूरा किया जाना भी सही नही है। भय, हिंसा व आक्रमकता ही अब खेल का हिस्सा हैं। ये ही मनोरंजन के साधन बन जाते हैं और ये कब बच्चों के मन पर हावी हो जाते हैं पता ही नही चलता है। और इस तरह के गेम के साथ अपना समय व्यतीत करते करते इसी के आदि बन जाते हैं। ये हमारे समाज व सांस्कृतिक विचारों पर बड़ा प्रहार है। किशोरों की जिंदगियां खिलने से पहले ही मुरझा रही हैं। मोबाइल/वीडियो गेम इन किशोरों के मन मस्तिष्क में स्लो पॉइजन बन कर फ़ैल रहा है। अगर हमें इनकी जिन्दगी को खूबसूरत सवांरनी है ,तो इनको इस लत से मुक्त रखने की जरूरत है।

 

अब इंटरनेट व सोशल साइटों लोग निर्भर रहते हैं। अपनी बुद्धि का प्रयोग कम करते हैं। इसी प्रकार बच्चे भी इस तरह का अनुपालन कर रहे हैं। किशोर की बाल्यावस्था व प्रौढ़ावस्था के बीच का अंतराल असमंजस भरा होता है। ये प्रौढावस्था की नकल करते हैं। उन्ही तरह बनने का प्रयास भी करते हैं। इनमें मानसिक विकास भी नही होता है। इसलिए निर्णय लेने व अच्छे बुरे की पहचान कम होती है। तभी जब समाज से मनोवैज्ञानिक जरूरतों की स्वीकारोक्ति नही मिलती तब यही मासूम बच्चे तनाव, क्रोध,व्यग्र जैसी प्रवृत्तियां जन्म लेती है। इस लिए हमारे इन बच्चों के लिए माता-पिता द्वारा अपने व्यस्त पलों से कुछ समय अवश्य निकाल कर इनके पास बैठे और इनकी भावनाओं से परिचित होकर उनकी समस्याओं हल निकालने के साथ ही खुशनुमा माहौल दें।जिससे उनका एकांत पल कम मिले और गेम आदि से दूर रहे ताकि तनाव से बच्चों को बचाया जा सके। इससे किशोरावस्था वाले बच्चे अच्छे बुरे की पहचान कर अपने भविष्य को उज्जवल बनाये।और बाल्यावस्था व प्रौढ़ावस्था के बीच मचलते बचपन को सही दिशा मिल सके।

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