बुढ़ापे की चुनौतियां …. जवानी में ही समझ लें

बुढ़ापे की चुनौतियां …. जवानी में ही समझ लें

बुढ़ापे की चुनौतियां के लिए इमेज नतीजे

जीवन का आखिरी पड़ाव शांति और सुकून दे सकता है तो तनाव और बीमारियों का कारण भी बन सकता है|  लाइव की एंडिंग अक्सर परेशानियों भरी होती है| अपनों की दूरी शरीर की मजबूरी के साथ जीना नियति है| पोलूशन खराब जीवनशैली और  समय के साथ शरीर कमजोर होने लगता है बीमारियां गिरने लगती बुढ़ापा तकलीफ देह  हो जाता है|जीवन के साथ मृत्यु है लेकिन मृत्यु सुख, शांति और आनंद के साथ हो तुम मृत्यु भी उत्सव बन सकती है|

पल पल  तिल-तिल कर मरना कौन चाहता है?

हर एक  को वृद्धावस्था के दौर से गुजरना है इसलिए युवावस्था को यूंही बर्बाद ना करें| युवावस्था की आप की तैयारियां बुढ़ापे को सवार सकती हैं| जो  बुजुर्ग  अपने युवा काल   में अपने स्वास्थ्य  के प्रति जागरूक रहते  आए हैं ,बीमारियों से बचाव  करते रहे हैं, उनका बुढ़ापा सुखमय   होता है . बुढ़ापे में कई ऐसी बीमारियां हो जाती हैं जिनके इलाज में काफी पैसा लगता है|  जिन्होंने इससे पहले बचत पर ध्यान नहीं दिया उन्हें आर्थिक कारणों से बुढ़ापे में बुरा दौर देखना पड़ता है|
यदि  कोई बुजुर्ग  आर्थिक रूप से  पराधीन है अथवा निम्न  स्रोत का उपभोक्ता है, तो  निश्चित तौर पर उसके लिए रोग  का निदान कर पाना असंभव हो जाता  है. प्रत्येक  इन्सान को मौत आनी  है ,परन्तु यह भी सत्य  है ऐसा कोई निश्चित नहीं  है की पति और पत्नी एक साथ  दुनिया से विदा लें , अर्थात दोनों  की मृत्यु एक समय पर हो .किसी एक को  पहले जाना होता है .दाम्पत्य जीवन में अकेला  रहने वाला व्यक्ति एकाकीपन का शिकार होता है . किसी  भी व्यक्ति को अपने जीवन साथी की सबसे अधिक आवश्यकता  प्रौढ़ अवस्था में होती है . प्रौढ़ावस्था में अपने विचारों  के आदान प्रदान का एक मात्र माध्यम जीवन साथी ही बनता है.प्रौढ़ावस्था में बीमारी. प्रौढ़ावस्था आते आते अपने अनेकों मित्र एवं संगी साथी , बिछड़  चुके होते हैं 

जीवन  साथी का  अभाव अधेड़ावस्था में  हो अथवा प्रौढ़ावस्था में  हो किसी भी व्यक्ति के जीवन  को संकुचित कर देता है .वह अपेक्षतया शीघ्र मौत  को गले लगा लेता है . प्रत्येक  वृद्ध इतना  सौभाग्य शाली  नहीं होता , की  वह जीवन के अंतिम  पड़ाव तक आत्मनिर्भर  बना रहे , अर्थात उसके आय के  स्रोत उसके भरण पोषण के लायक  जीवन पर्यंत बने रहें . जैसे ,पेंशन  प्राप्त करना ,मकान दुकान या जायदाद  का किराया ,अपनी पूँजी पर बैंक ब्याज की आय ,रोयल्टी  से आय ,या किसी अन्य प्रकार से आने वाली आय. प्रत्येक वृद्ध  के अपने जीवन भर की बचत अथवा उसके ब्याज से प्राप्त आय शेष जीवन के  निर्वाह के लिए पर्याप्त नहीं होती.
समय  के साथ परिवर्तित  हो रही सामाजिक व्यवस्था  ने बुजुर्गों के लिए अपनी   सुरक्षा को लेकर चिंता बढा दी  है .संयुक्त परिवार बिखर कर एकल परिवार   बन चुके हैं .बढती जनसँख्या की समस्या , बढ़ता  जीवन स्तर एवं बढती प्रतिस्पर्द्धा के कारण प्रत्येक  समझदार दम्पति के लिए सीमित परिवार की अवधारणा को स्वीकार  करना आवश्यक हो गया है . क्योंकि प्रत्येक माता पिता की इच्छा  होती है ,वह अपने बच्चे को जीवन की सारी खुशियाँ उपलब्ध करा पायें . अच्छी से अच्छी शिक्षा  देकर उन्हें जीवन की ऊंचाइयों तक पहुंचा पायें .यह सब सीमित परिवार के होते हुए ही संभव है. जैसे  जैसे पुत्र ,पुत्री बड़े होते हैं ,शिक्षित होते हैं ,युवावस्था में प्रवेश करते हैं ,पुत्री को विवाह  कर ससुराल विदा करना होता है और पुत्र को अपने अच्छे भविष्य की तलाश में अपने परिवार ,अपने शहर से  दूर जाना पड़ता है . अंत में परिवार में रह जाते हैं सिर्फ बुजुर्ग पति और पत्नी .यदि बेटा विदेश चला जाता  है तो उसे लौटने में भी साल साल भर लग जाता है. अपने देश में कार्य करते रहने पर भी साप्ताहिक अवकाश में घर  पर आ जाना हमेशा संभव नहीं होता. अतः बुजुर्ग दम्पति को अपने स्वास्थ्य की देख भाल स्वयं ही करनी पड़ती है ,अपनी सुरक्षा  को लेकर चिंता सताने लगती है . हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था जर जर हालत में होने के कारण आए दिन अपराधी बुजुर्ग दंपत्ति  को अपना शिकार बनाते रहते हैं . उनके साथ लूट पाट करना, उनकी हत्या कर देना नित्य अख़बार की सुर्खिया बनती हैं .अनेकों बार तो  घर के नौकर ही बुजुर्गों की कमजोरी का लाभ उठा कर अपराधों को अंजाम दे देते हैं .कई बार कोई पडोसी बदमाश या करीबी व्यक्ति  उनकी जायदाद को हड़पने का प्रयास करते हैं अथवा उन्हें अनेक प्रकार से परेशान कर बेदखल करने या निवास छोड़ने को मजबूर करते हैं .
इन्सान यौवनावस्था में जब अपने जीवन में बच्चों की किलकारियां  सुनता है तो संतान सुख की अनुभूति अद्वितीय होती है . जब तक बच्चे  छोटे होते हैं उनकी समस्याएं भी सीमित होती हैं. क्योंकि यौवन अवस्था में  व्यक्ति आर्थिक एवं शारीरिक रूप से सुदृढ़ होता है ,अतः बच्चों की प्रत्येक इच्छा  को पूर्ण करने से असीम ख़ुशी मिलती है.उसके दुखों का निवारण करने में संतोष प्राप्त  होता है.जैसे जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं ,उनकी आवश्यकताएं बढती जाती हैं .और इन जिम्मेदारियों  को निभाने के लिए पहले से अपने को तैयार कर लेते हैं.अतः बच्चे के जन्म से लेकर उसके रोजगार लगने  तक का व्यय भार उठाना अपना कर्त्तव्य समझ निभाते हैं .इसी प्रकार अपनी बेटियों के विवाह कर कार्य मुक्त  होकर चिंता मुक्त जीवन की कल्पना करते हैं .परन्तु जब सारी जिम्मेदारियां निभा ली जाती हैं. हमारी चिंता  मुक्त होने की सोच दिवास्वप्न साबित होती है.आप कितने भी धनवान हैं , या पेंशनर होने के कारण भविष्य आर्थिक   रूप से सुरक्षित है . परन्तु बच्चों की शादियों के पश्चात् अनेक प्रकार की नयी चिंताएं सताने लगती हैं .

पुत्रियों  के विवाह के  पश्चात् अक्सर उसके  ससुराल वाले आपकी अपेक्षाओं  पर खरे नहीं उतरते .हमारे समाज में  बेटे के ससुराल वालों से दोयम दर्जे  का व्यव्हार किया जाता है .अतः जब उनकी  बहु उनके अपेक्षाओं के अनुरूप खरी नहीं उतरती  तो उसके लिए मायके वालों को ही दोषी माना जाता  है , उनकी अपेक्षाएं बेटी के बूढ़े माता पिता के लिए  तनाव उत्पन्न करती है .यदि बेटी अपनी ससुराल में सामंजस्य  बना पाने में विफल रहती है तो निश्चित ही माता पिता का बुढ़ापा  ख़राब हो जाता है .
कभी  कभी किसी  संतान का वैवाहिक  जीवन सामान्य रूप से  नहीं चल पाता या उसके  जीवन में कोई भूचाल आ जाता  है तो वृद्ध का शेष जीवन तनाव  ग्रस्त होकर बीतता है और यही तनाव  उसकी मौत का कारण भी बन जाता है .

प्रत्येक  व्यक्ति या जीव जिसने  इस संसार में जन्म लिया  है उसकी मृत्यु भी निश्चित  है . और इस सच्चाई से मुंह नहीं  मोड़ा जा सकता ज्यों ज्यों आयु बढती  जाती है , मृत्यु का समय भी पास आता  जाता है.अतः मृत्यु वृद्धावस्था के अधिक  निकट होती है .जबकि यह भी सत्य है जीवन और  मौत पर इन्सान का कोई अधिकार नहीं है .जो व्यक्ति   दुनिया से ऊब चुका होता है और जीना नहीं चाहता उसे मौत  नहीं आती ,अनेक प्रकार की शारीरिक परेशानियों के बावजूद जीना  पड़ता है, कभी कभी तो गंभीर बीमारी के चलते वर्षों बिस्तर पर पड़े  रह कर भी जीवन को ढोना पड़ता है .इसी प्रकार से जिसे जीने की लालसा  होती है सब प्रकार से समृद्ध होता है, आकस्मिक दुर्घटना का शिकार होकर  या किसी गंभीर बीमारी का शिकार होकर समय से पूर्व ही मौत के आगोश में  आ जाता है .

यदि पुरानी पीढ़ी के व्यक्ति यह सोच लें की अब बच्चों का जमाना है,वे आधुनिक वातावरण में पैदा हुए हैं,अतः वे नए ज़माने के अनुसार ही रहना पसंद करते हैं.दुनिया में परिवर्तन तो होने ही हैं,उन्हें कोई नहीं रोक सकता.जब इन बदलावों को रोक नहीं सकते तो समझदारी यही है की हम भी अपनी सोच में यथाशक्ति परिवर्तन लाने का प्रयास करें,ताकि नयी पीढ़ी से सामंजस्य बना पाने में सुविधा हो, और परिवार में बुजुर्गों का सम्मान बना रहे.परिवार का माहौल खुशनुमा बना रहेगा ,बुजुर्गो का शेष जीवन सहज रूप से व्यतीत हो सके.

पुरानी पीढ़ी के लोग नए परिवर्तन को न तो समझ पा रहे हैं और न ही स्वीकार कर पा रहे हैं.कमाई के नए साधनों के अनुरूप अपने आपको ढाल पाने में भी अक्षम हैं. अतः उनके पुराने कारोबार सफ़ेद हाथी साबित होने लगे हैं.बढते खर्चों के सामने वे अपनी कमाई को ऊँट के मुंह में जीरा की माफिक महसूस करते हैं.इतनी तीव्र गति से आया परिवर्तन उन्हें शारीरिक एवं मानसिक रूप से व्यथित करता है

 

 

 


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