क्रूरता की पराकाष्ठा थी राक्षसों की वृत्ति में…–रावण की त्रैलोक्य विजय-83

क्रूरता की पराकाष्ठा थी राक्षसों की वृत्ति में                रावण की त्रैलोक्य विजय-83 
रमेश तिवारी
रात्रि युद्ध में पारंगत थे राक्षस। इसलिए,क्योंकि अंधकार में कुछ भी किया जा सकता था। न किसी नीति की आवश्यकता रहती थी,और न ही किसी नियम की। जबकि संस्कारित देव, गंधर्व और आर्य जातियाँ निर्धारित युद्ध नीति का सख्ती से पालन करते थे। वैसे रात्रि में युद्धों की न तो परम्परा थी। न ही प्रचलन। किंतु महाभारत के युद्ध में संयोग वश एक रात्रि ऐसी आ पडी़ जिस काली रात्रि में अधर्मकारी रात्रि युद्ध हुआ। संयोगवश इस युद्ध में कौरवों और पांडवों, दोनों पक्षों की ओर से कोई छैः प्रमुख राक्षस राजा, सीधे सीधे भिडे़। मरे और खपे। इस रात्रि युद्ध का कारण भी था। अभिमन्यु का वध करने वाले जयद्रथ के जीवन को समाप्त करना। 

बुद्धिमान श्रीकृष्ण ने सूर्यग्रहण की गति के आधार पर अंधेरा होते ही सैन्य दल के बीच से निकले जयद्रथ को अर्जुन से मरवा दिया। दाहकर्म करते अंधेरा हो गया। परन्तु अपनी एकमात्र बहिन दुःशला के पति जयद्रथ के वध से भयंकर क्षुब्ध दुर्योधन ने अर्जुन को मार डालने के उद्देश्य से कर्ण को प्रेरित किया। और फिर जो कुछ हुआ! वह तो राक्षसीय वृत्ति की पराकाष्ठा थी। वीभत्स, विनासक, विध्वंषक। वैसे, वास्तविक युद्ध तो कर्ण और अर्जुन के मध्य होता दिखाई दे रहा था। परन्तु उस युद्ध में आधा दर्जन राक्षस राजाओं का वर्चस्व हो चुका था। पांडवों की ओर से भीम पुत्र घटोत्कच सम्मुख था। जबकि दुर्योधन के पक्ष से राक्षस अलायुध तथा अलंबुश नाम के चार अन्य राक्षस राजा युद्ध रत रहे थे। पांडवों के विरुद्ध राक्षस राजाओं के लामबद्ध होने का कारण पांडवों का वनवास काल ही प्रमुख कारण था। तब राक्षस राज हिडिम्ब, राक्षसावर्त में अपनी बहन हिडिम्बा के साथ रहता था। तब एक अजूबा घटना घटी। 

                              रावण की त्रैलोक्य विजय-83 

वृक्ष पर आराम कर रहे आलस्य प्रिय हिडिम्ब को मानव गंध का आभाष हुआ। वह वैसे भी भूख से व्याकुल था। उसने देखा कि वृक्षों के बीच पांडव सो रहे हैं। भीम के पुष्ट शरीर पर उसकी दृष्टि पडी़। उसने भीम के स्वस्थ शरीर के स्वादिष्ट मांस के भक्षण हेतु बहन हिडिम्बा को भेजा। ताकि वह भीम का वध कर मांस ले आये। परन्तु.! हिडिम्बा. हिडिम्बा.! तो भीम को देखते ही उसकी मांसल देह पर मर मिटी। फिर तो भीम के निहोरे कर, गुहारें लगा और मान मनौव्वल कर हिडिम्बा ने भीम के उसी मांसल शरीर को अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। जिस भीम को मारकर उसकी देह लाना चाहती थी। उसी भीम को स्वयं की अपनी देह समर्पित करदी। खो गयी भीम में। भीममय हो गई। और जब हिडिम्ब ने विरोध किया तो हिडिम्बा ने भाई को ही मरवा डाला। 

भीम ने राक्षसावर्त का राज्य सम्हालते ही, अनेक राक्षसों को भी मारा। यही कारण था राक्षस राजाओं से उनके बैर का। घटोत्कच युद्धोन्माद में बौरा गया था। वह क्या कर रहा था? उसको भी पता नहीं था। कर्ण की हालत तो यह थी कि एक बार तो वह अपने रथ में सिर पकड़ कर ही बैठ गया। करे तो करे क्या। कहां मारे बाण? है कहां घटोत्कच..! रथ में है। भूमि पर अथवा किसी वृक्ष पर...!  कर्ण विभ्रम में रहता, तभी पत्तों और पल्लवों के समूह में लिपटा सनसनाता कोई बाण आता और कर्ण की वेदना को बढा़ देता।

कर्ण प्रतिकार स्वरूप वृक्षों पर बाणों का संधान करता परन्तु। अट्टहास करता हुआ घटोत्कच पत्थरों और शिलाओं की बरसात करता दिखाई देता। दुर्योधन भी परेशान हो रहा था। सब कुछ देख रहा था। तब उसने बकासुर के भाई अलायुध को बुलाया ! तुम कहते थे कि तुम भीम के शत्रु हो । युद्ध में अवसर चाहते थे। प्रतिशोध। कहते थे कि भीम ने तुम्हारे भाई बकासुर को मार डाला था। जाओ..! प्रतिशोध लो। वीरता दिखाओ। जाओ। थोडी़ देर में अलायुध और भीम तथा घटोत्कच में भिडंत होने लगी। बौराये हुए घटोत्कच ने अलायुध को भूमि पर पटका। उठा उठा कर पटकता रहा। अलायुध भी कम नहीं था। दोनों में कभी गदा युद्ध तो कभी मल्ल युद्ध होने लगा। 

फिर घटोत्कच ने डब्ल्यू डब्ल्यू ई (रेशलिंग) की तरह अलायुध को दोनों हाथों पर उठाया। कुछ चक्कर घुमाया। भूमि पर पटका। जैसे नेवला, सांप की मुंडी को भूमि पर रगड़ता है, अलायुध को जोर जोर से भूमि पर रगडा़। फिर मुंडी पकड़ कर उठाया तलवार निकाली और तलवार के एक ही प्रहार से अलायुध का धड़ अलग और सिर अलग। वह यहीं नहीं रूका। घटोत्कच ने मुंडी हाथ में पकडी़ और दुर्योधन के रथ के सामने जाकर खडा़ हो गया! घटोत्कच ने वह मुंडी दुर्योधन के रथ में फेंकते हुए| कहा.! यह उपहार है- तेरे लिए.! "ब्राह्मण, राजा और स्त्री के पास खाली हाथ नहीं जाना चाहिए! इस राक्षसीय क्रूरता की यह कथा आज यहीं तक। 

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