जीव की मोक्ष की आकांक्षा..

जीव की मोक्ष की आकांक्षा..
मकड़ी अपनी लार से अपने रहने के लिए जाल बनाती है, उस जाल के बाहर वह नहीं जाना चाहती है तथा उसी में मर जाती है क्योंकि उसका घर जाल ही है। जल के जीव का घर जल हैं, जल ही उसका जीवन है। जल के बाहर जाने पर उसकी मृत्यु हो जाती है। वह जल के बाहर नही जाना चाहता है।



स्वप्न के पात्र(जीव) का घर नींद है। नींद के बाहर जाने पर उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। वह नींद के बाहर नहीं जाना चाहेगा।

"रे मन सुपन को घर नींद में, सो रहे न नींद बिगर।

याको कोट बेर परमोधिये, तो भी गले नहीं पत्थर।। "


स्वप्न के पात्र जीवों को कितनी ही बार समझा दीजिए कि यह स्वप्न असत्य है तथा मिटने वाला है परन्तु वे इस पर विश्वास नहीं करेंगे। वे नींद में बने झूठे घर को ही अपना घर समझेंगे। पशु, पक्षी, जानवरों की बात तो छोड़ दीजिए क्योंकि इनमें विवेक का स्तर ऊंचा नहीं होता है। परंतु जो मानव जीव है उनका भी यही हाल है। वे भी इस बात को नहीं समझ पाते हैं।

मानव जीव परमात्मा की सबसे उत्तम कृति है। देवता भी इस शरीर को प्राप्त करने के लिए तरसते हैं। परन्तु इन मानव जाति में भी 90 प्रतिशत से अधिक पशु की तरह ही व्यवहार करते हैं। खाना, पीना, सोना, संतान पैदा करना, उनको पालना पोषणा आदि कार्य तो पशु भी करते हैं। यदि मानव भी इतना कार्य ही करे तो उसे पशु तुल्य समझना चाहिए।

परमात्मा ने मानव जाति में विशेष रूप से विवेक प्रदान किया है यदि वह इस विवेक को प्राप्त करने के बाद भी नहीं जानना चाहे कि वह कौन है? कहां से आया है? क्यों आया है? इस संसार को किसने बनाया है ? जो गुण कारण में होता है वह कार्य में भी अवश्य होता है। वृक्ष के बीज में जो गुण होता है, वह गुण उसके फल में भी होता है। निंबू के फल में खटास का कारण उसके बीज में ही खटास का होना है।

स्वप्न के जीवो की उत्पत्ति मोह जल रूपी नींद में हुई है। जीवों के शरीर में मोह, बीज रूप में विद्यमान है। इस माया के शरीर के रहते हुए मोह(माया) रूपी विष जीव से पृथक नहीं हो सकता है। यह मोह रूपी विष इस मानव जीव को विवेक शून्य कर देता है, जिससे वह स्वप्न को सत्य मानकर मोहाधीन होकर बारम्बार जन्म लेना चाहता है।

जब तक जीव पर माया तथा ब्रह्म रूपी विकार चढ़ा रहता है तब तक उसे मोक्ष प्राप्त करने की आकांक्षा कैसे हो सकती है? जीव की स्वयं की अनादि अवस्था, जिसे तुरीयातीत कहा गया हैं, उसमें कोई विकार नहीं है। यदि स्वप्न का जीव अपने ऊपर से विकार रूपी विष का आवरण दूर कर दे तो उसमें अपने निज घर जाने की आकांक्षा जाग्रत हो सकती है।

"चीन्हें क्यों कर ब्रह्म को, एतो गुन ही के अंगको विकार।

बाजीगरें बाजी रची, मूल माया थें मोह अहंकार।।


त्रिगुणात्मक(सत, रज, तम) के विकार से रचित इस मायावी ब्रह्मांड में ब्रह्म की पहचान कैसे हो सकती है? जिस प्रकार जादूगर भ्रामक विद्या की कला से झूठा खेल रचता है, उसी प्रकार अक्षर ब्रह्म ने माया का आवरण खड़ा कर मोह तथा अहंकार के द्वारा झूठे नश्वर संसार की रचना की है। जब इस जीव का शरीर असत्य है तो फिर वह इसके माध्यम से सत्य को किस प्रकार जान सकता है ? सतगुरु के पराज्ञान(ब्रह्मज्ञान) के द्वारा मानव जीव के शरीर से उत्पन्न मोह रूपी विष का प्रभाव उतर जाता है और जीव स्वप्न जगत को असत्य समझने लगता है। उसके अंदर निज घर जाने की आकांक्षा जाग्रत हो जाती है।


बजरंग लाल शर्मा

EDITOR DESK



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