भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद नहीं राजा महेन्द्र प्रताप थे, पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु नहीं थे बरकतुल्ला भोपाली थे..

भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु नहीं थे बल्कि बरकतुल्ला भोपाली थे..
देश के पहले प्रधानमंत्री के तौर पर जवाहरलाल नेहरू का नाम लिया जाता है लेकिन इतिहास बताता है कि देश के पहले प्रधानमंत्री बरकतउल्ला भोपाली थे| जी हां यह सत्य है जवाहरलाल नेहरू से पहले बरकतुल्ला को देश का पहला प्रधानमंत्री घोषित किया गया था|

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लेकिन ऐसा क्यों है कि पहले प्रधानमंत्री के तौर पर जवाहरलाल नेहरू का नाम लिया जाता है| बरकतउल्ला अपने क्रांतिकारी लेखों से चर्चा में आए थे| जब बरकतउल्ला प्रधानमंत्री चुने गए तब भारत अंग्रेजों का गुलाम था दरअसल जवाहरलाल नेहरू आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री थे|

बरकतउल्ला भोपाल 7 जुलाई 1854 को भोपाल में जन्मे थे..

अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के लीडर शेख जमालुद्दीन अफगानी से बरकतउल्ला इतने प्रभावित थे कि उन्होंने सभी देशों के मुसलमानों को एक करने की ठानी. इसी दौरान उनके मां-पिता का देहांत हो गया. उनके सिर पर एक बहन की जिम्मेदारी थी, कुछ समय बाद सो उसका भी ब्याह हो गया.

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बरकतउल्ला ने भोपाल छोड़ा और मुंबई पहुंच कर ट्यूशन पढ़ाने लगे उन्होंने अंग्रेजी सीखी और फिर इंग्लैंड की तरफ रुख किया| इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान उनकी दिशा बदल गई| उनकी मुलाकात यहां प्रवासी हिन्दुस्तानी क्रान्तिकारियों के संरक्षक श्याम जी कृष्ण वर्मा से हुई. इस मुलाकात ने बरकतउल्ला का जीवन बदल दिया और वह भारत की आजादी के लिए मुखर हो गए| अपने क्रांतिकारी लेखों से वह ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों के खिलाफ कलम चलाते रहे|

इंग्लैंड में खान का विरोध बढ़ने लगा उन्हें देश छोड़ना पड़ा| 1899 में बरकतउल्ला अमेरिका पहुंचे और उन्होंने आजादी के लिए सम्मेलन करना शुरू किया| इसके बाद बरकतउल्ला अमेरिका से जापान पहुंच गए उन्नीस सौ पांच तक बरकतुल्लाह को क्रांतिकारी विचारक के तौर पर जाने जाना लगा| जब इंग्लैंड ने उन्हें जापान में तंग करना शुरू किया तो वे फिर अमेरिका पहुंच गए|

इंग्लैंड में रहते हुए, वह हलाव के राजा के पुत्र लाला हरदयाल और राजा महेंद्र प्रताप के निकट संपर्क में आए। 1915 में तुर्की और जर्मन की सहायता से अफ़ग़ानिस्तान में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ चल रही ग़दर लहर में भाग लेने के वास्ते मौलाना बरकतउल्ला अमेरिका से काबुल, अफ़ग़ानिस्तान में पहुँचे। वह काबुल में अखबार सिराजुल-उल-अकबर के संपादक बन गए। बाद में वह राजा महेंद्र प्रताप की अध्यक्षता में 1 दिसंबर, 1915 को काबुल में स्थापित अनंरिम सरकार के पहले प्रधानमंत्री बने। 

1915 में उन्होंने मौलाना उबैदुल्ला सिंधी और राजा महेन्द्र प्रताप सिंह से मिल कर प्रवास में भारत की पहली निर्वासित (आरज़ी) सरकार का एलान कर दिया। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह इस के पहले राष्ट्रपति थे और मौलाना बरकतुल्ला इस के पहले प्रधानमंत्री।

काबुल में स्थापित इस सरकार का मक़सद उत्तर से हमला कर भारत से अंग्रेज़ों को भगाना था मगर प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया और इसलिए प्लान कामयाब न हुआ. मगर ग़दर पार्टी की जलाई चिंगारी ने ही इतने क्रांतिकारी पूरी दुनिया में पैदा किये कि आगे राष्ट्रीय आंदोलन में मलाया से ले कर कनाडा तक हर जगह निर्वासित भारतीय में देशभक्ति की भावना जाग गयी।

इस तरह बरकतउल्ला देश के पहले प्रधानमंत्री बने लेकिन बरकतउल्ला आजादी का मुंह नहीं देख पाए।  20 सितम्बर 1927 को उनका का देहांत हो गया|

 

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