वैदेशिक अनार्यों की अप संस्कृति..! रावण की त्रैलोक्य विजय-20

वैदेशिक अनार्यों की अप संस्कृति..!

रमेश तिवारी

The foreign culture of foreigners -Newspuran-20

रावण की त्रैलोक्य विजय -20 

भारतवर्ष में विदेश से आये पथ भ्रष्ट, मांस भक्षी और निरादृत चरित्र के उन लोगों की कथा
विस्तार पूर्वक सुनाता हूँ। परन्तु इस खेद और ग्लानि के साथ, क्योंकि वे सब इतने महान देश में ब्राह्मण बन कर आनंद मना रहे थे। वीर विक्रमशाली राजाओं का यह देश आज की तरह निद्राधीन था..? महान ऋषि और उनसे भी उच्च चरित्र मुनि मौन थे ....? आदर्शों की अंगडा़इयां ले रहा भारतीय ताना बाना मकड़ी के जाल जैसा दयनीय था.....! क्या था...! क्यों था...!

इन बातों पर मंथन करना, हम श्रोताओं का कर्तव्य है। परन्तु इस समय जब मैं प्रातः काल 4 बजे यह कथा लिख रहा हूँ...!,ब्रह्मांड में स्थित 9 लोकों (मात्र तीन ही नहीं) में से शिवलोक में (हमारे मस्तिष्क की दाहिनी ओर स्थित ,जिसको विष्णु लोक) भी कहते हैं,सर्वाधिक स्वास्थ्य वर्धक पवमान वायु निःसृत हो रही है। मैं इसको आक्सीजन लिखता तो आप शीध्र ही समझ लेते। परन्तु इसी पवमान वायु को सोम( वायु) कहूं तो, आप दांयें बायें झांकने लगेंगे। मेरे मस्तिष्क में विचारों का प्रवाह है। अदम्य ऊर्जा, मेरी मेधा को गतिमान कर रही है।

ब्रह्म मुहूर्त का विशुद्ध पर्यावरण मेरे रक्त को शुद्ध कर रहा है। ह्रदय की एक,एक धड़कन -संचित ज्ञान को कथानक के रुप में मुखरित करना चाह रही है । हम जिन कोंकणस्थों की बात करेंगे, प्रारंभ वहीं से करते हैं। नाम से क्षेत्र का इतिहास और अस्मिता जुडी़ हो तब कितना सुखद लगता है, परन्तु मूक भारतीय समाज मृतप्राय हो कर अपना आत्म गौरव भूल ही चुका है। कोंकण का संस्कृत नाम अपरान्त था। शिवाजी की शौर्य,भूमि सह्माद्रि और समुद्र के मध्य कोई 500 मील की पतली पट्टी अपरान्त कहलाती थी। रत्नागिरि जिले का नाम ही विशेषकर कोंकण था। और उत्तरी भूभाग का जिसमें कल्याण, नाला सुपारा आदि क्षेत्र है "कुट्टापरांत कहा गया है। हम राष्ट्र के ऐसे ऐतिहासिक, संस्कृत निष्ठ और सार्थक जनपदों,पर्वतों और सरिताओं के नामों की चर्चा कभी करेंगे, अवश्य। परन्तु....! अभी यहां मात्र ऋषिक और मूषक देश तथा ऋषिक तथा मूसी नदी की बात कर लेते हैं ।आपने खानदेश और खान नदी का नाम भी सुना है। बहुत अभद्र शब्द है बुरहानपुर। यही खानदेश था। यहीं है खान नदी। इस नदी को कौन सा खान लाया।वह भागीरथ कौन था..!मजाक है।

खानदेश पहले दानदेश कहलाता था। परन्तु इसका मूल संस्कृत नाम तो ऋषिक देश था। और... यह प्रतिष्ठित नदी खान नहीं ,ऋषिक नदी थी। इसी प्रकार संस्कृत नाम वाली मूषी नदी के समीप बसा हैदराबाद नगर भी मूषक कहलाता था। चूंकि हमको उन वैदेशिक अनार्यों की व्यापक चर्चा करना है, अतः इस प्रकरण को आज यहीं समाप्त करते हैं।
स्कंदपुराण क्या कहता है...! (संक्षेप में देखें) एवं निवासं कुर्वस्तु -अकस्माद्दैवयोगतः -सर्वे च गौरवर्णास्ते सुनेत्राश्रच सुदर्शना "अर्थात दैवयोग से अफ्रीका देश के बर्बरादि अनार्य लोग हिनदुस्थान के पश्चमी मार्ग से आकर सह्याद्रि किनारे पर बसे। बहुत वर्षों बाद उनसे जो संतति हुई, उसने उस समय के परशुराम नामी राजा के पूछने पर कहा कि हे राजा..! हम लोग मल्लाह हैं। समुद्र के किनारे पर रहते हैं और शिकार करना हमारा काम है। सब को गौर वर्ण, सुन्दर और सुलोचन (नेत्र वाले ) देखकर परशुराम ने उन्हें चितपावन बना दिया।

दूसरी जगह -'माधव शतप्रभ -कल्पलतिका नामक पुस्तक में लिखा है -(यहां श्लोक है) कि ये लोग निषिद्ध कर्म करने वाले मत्सय मुर्गी ,बतख आदि मधुर ध्वनि करने वाले पालतू पक्षियों का मांस खाने वाले ,कन्या विक्रय करने वाले और अगम्यगामी हैं। कुछ दिन तो यह लोग उसी स्थिति में रहे, पर जब देखा कि इस देश में ब्राह्मणों की बडी़ प्रतिष्ठा है, तब इन्होंने ब्राह्मण बन जाना उचित समझा। और...! ब्राह्मण हो गये। और...! चितपावन ब्राह्मण कहलाने लगे। फिर संस्कृत भी पढ़ने लगे।

यहां हम इस संदेह को भी महत्वपूर्ण मानते हैं कि जिन परशुराम (राजा) का उल्लेख यहां किया गया है, वह भगवान परशुराम नहीं हो सकते , क्योंकि उनके साथ कभी राजा का यशोनाम लगा ही नहीं। परन्तु ग्रंथों में चांडालों को ब्राह्मण बनाने की कथा इन्हीं परशुराम नाम के साथ जुडी़ है। यह कथा श्रेष्ठ परशुराम के चरित्र को बदनाम करने की दृष्टि से भी जोड़ दी गई हो। यह भी संभव है। क्योंकि अनार्यों ने ग्रंथों में ऐसे अनेक क्षेपक जोड़े हैं,जिनके सैकडो़ं, प्रमाणिक उदाहरण मिलते हैं ।इस निकृष्ट घालमेल पर भी हम आगे चर्चा करेंगे। हम विश्वनामी और चीन से आये विदेशियों के भारत में ब्राह्मण बनने के भी उदाहरण देखेंगे। नाम्ब्रूदिपाद ब्राह्मणों का चरित्र भी देखना पडे़गा।

ब्राह्मण,बनने की ये ज्यादातर घटनायें उसी दक्षिण भारत में अधिक हुईं जहांकि तब अशिक्षा,अज्ञानता और जीवन अभाव ग्रस्त था। रावण के नेतृत्व में रक्ष संस्कृति जोर पकड़ रही थी।निम्न मानी जाने वाली जातियां और व्रात्य (बहिष्कृत) आर्य अपने मूल (आर्यों) से अपमानित अनुभव कर रहे थे। रावण के प्रभाव में आकर स्थानीय अनार्य (नैयर) जो मूलतः शूद्र ही थे, बहिष्कृत आर्यों से कुछ अधिक ही गलबहियां करने लगे थे। मिश्र (इजिप्ट) जो संस्कृत नाम है ,के यह चितपावन मूलतः यहूदी हैं। यद्यपि इनको किसी ने ब्राह्मण नहीं माना। क्योंकि इनका आचार, व्यवहार बडा़ नीच था। ये अपने कुत्सित व्यवहार का प्रचार भी करने लगे। इसलिए दक्षिण में बहुत बड़ा कोलाहल मचा। तब तुरन्त ही वहां के निवासियों की एक बडी़ सभा में कनारी भाषा में लिखा गया -

"आफ्रिका खण्डद इजिप्तदेश दिन्द बन्दिरुव इजिप्तवान जिप्तवान या चितपावन एवं जातिय निर्णयवु "।
अर्थात् ये अफ्रीका खंड के इजिप्त देश के रहने वाले हैं,अतः इनको इजिप्तवान, जिप्तवान या चितपावन कहते हैं। इस आशय का एक घोषणापत्र भी निकाला गया। लिखा गया कि यह जाति भरतखंड मूल की नहीं है। यह लोग द्रविडों के प्रभाव में आ चुके थे।यह पूरी घटना मराठी भाषा में 100 वर्ष पूर्व प्रकाशित हो चुकी है। इसके संपूर्ण प्रमाण भी हमारे पास मौजूद हैं | चर्चा का शारांश यह कि इस विवाद और प्रचार से महाराष्ट्र के ब्राह्मणों में दो भेद हो गये। जो शुद्ध ब्राह्मण थे वे देशस्थ कहलाने लगे और मिश्र से आये ये यहूदी कोंकणस्थ हो गये।

लेखक भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार व धर्मविद हैं |


हमारे बारे में

न्‍यूज़ पुराण (PURAN MEDIA GROUP)एक कोशिश है सत्‍य को तथ्‍य के साथ रखने की | आपके जीवन में ज्ञान ,विज्ञान, प्रेरणा , धर्म और आध्‍यात्‍म के प्रकाश के विस्‍तार की |
News Puran is a humble attempt to present the truth with facts. To spread the light of knowledge, promote scientific temper, inspiration, religion and spirituality in your life.


संपर्क करें

0755-3550446 / 9685590481



न्‍यूज़ पुराण



समाचार पत्रिका


श्रेणियाँ