शपथ बहुत सोच-समझकर लेना चाहिए -दिनेश मालवीय

शपथ बहुत सोच-समझकर लेना चाहिए

-दिनेश मालवीय

जीवन में कुछ ऐसी बातें होती हैं, जिनका ध्यान न रखने पर व्यक्ति बहुत मुसीबत में फँस जाता है. इनमें एक बहुत महत्वपूर्ण चीज शपथ होती है. पहली बात तो व्यक्ति को शपथ लेने से ही बचना चाहिए और जो करना चाहता है वह बिना शपथ लिए ही कर लेना चाहिए. लेकिन यदि शपथ ले ली है तो कुदरत का विधान है कि उसे पूरी करनी ही होगी. शपथ पूरी न करने के बहुत बुरे परिणाम होते हैं.


जो लोग सोच-विचार कर शपथ नहीं लेते, उनके साथ आगे चलकर बहुत कुछ बुरा होने की सम्भावना होती है. इसके लिए हमारे शास्त्रों में भीष्म पितामह, अर्जुन, कर्ण और आदि के उदाहरण सामने हैं. इन लोगों की शपथ बहुत अनिष्ट का कारण बनी.

सामान्य रूप से कहा जाता है कि इन्द्रप्रस्थ में द्रोपदी द्वारा दुर्योधन को ‘अंधे का पुत्र अंधा’ कहना ही महाभारत जैसे विनाशकारी युद्ध का कारण बना. लेकिन यह कारण नहीं था. इसका असली कारण तो महाराज शांतनु के पुत्र देवव्रत द्वारा आजीवन ब्रह्मचारी रहने की शपथ था. इसके अलावा उनके द्वारा सदा हस्तिनापुर के सिंहासन के प्रति निष्ठावान रहने की शपथ ली गयी, चाहे राजा कितना ही दुराचारी और अनीतिवान हो. यदि शपथ से बंधे न होते तो दुर्योधन अपनी मनमानी नहीं कर पाता और न भीष्म को कौरवों की तरफ से युद्ध में भाग लेना पड़ता. पिता के मोह में अगर भीष्म ऐसी अव्यवहारिक शपथ लेते शपथ लेते तो कदाचित यह युद्ध ही न होता.

इसी तरह कर्ण ने शपथ ली थी कि वह अपनी सूर्य पूजा के बाद आने वाले व्यक्ति द्वारा कुछ भी माँगे जाने पर वह उसे देगा. नतीजा यह निकला कि इंद्र द्वारा उससे कवच और कुंडल माँग लिए गये. इससे उसकी शक्ति बहुत क्षीण हो गयी.

अर्जुन को तो शपथ लेने की कुछ ज्यादा ही आदत थी. कभी वह द्वारका में एक ब्राह्मण के पुत्र को  यमलोक से वापस लाने की शपथ ले लेते हैं, तो कभी संध्या से पहले जयद्रथ को न कर पाने पर अग्नि प्रवेश की शपथ ले लेते हैं. अर्जुन की इसी आदत के कारण श्रीकृष्ण ने एक बार कटाक्ष किया कि तुम पाण्डवों को शपथ लेने की बहुत आदत है. उपरोक्त दोनों प्रकरणों में यदि श्रीकृष्ण अर्जुन की मदद नहीं करते तो इतने बड़े वीर को अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्यागना पड़ता.

लोग ज़रा-ज़रा सी बात पर शपथ लेते या कसम खाते देखे जाते हैं. कुछ लोगों का तो भगवान की कसम, खुदा या कुरान की कसम खाना एक तकियाकलाम जैसा होता है. वे बात-पात पर कसम खाकर झूठ पर झूठ बोले जाते हैं. बिना सोचे-समझे न कसम खाना चाहिए और न दूसरे को ऐसा करने पर मजबूर करना चाहिए. इससे कसम का महत्त्व और मर्यादा समाप्त हो जाती है. शपथ पूरी न करने वाले पर लोग उस पर विश्वास करना छोड़ देते हैं. उसकी बात में कोई वजन ही नहीं रह जाता. तेश में आकर तो कभी भूलकर भी शपथ नहीं लेनी चाहिए.

हर साल नए साल पर लोग जो resolution या संकल्प लेते हैं, वे बमुश्किल हफ्ते भर भी नहीं चल पाते. शादी के समय पंडितजी द्वारा जो शपथ दिलवाई जाती हैं उन्हें अधिकतर लोग गंभीरता से नहीं लेते और शादियाँ जल्दी ही टूट जाती हैं. जो भी शपथ ली जाए या किसी के दावारा दिलाई जाए उसका अक्षरश: पालन करना चाहिए.

बहुत अपरिहार्य होने पर जीवन में कभी-कभार एकाध शपथ ही लेना चाहिए और उसे पूरी करने में कोई कसर नहीं छोडनी चाहिए. यह बात किसीको दिए गये वचन पर भी लागू होती है. पहली बात तो किसीको किसी प्रकार का वचन देना ही नहीं चाहिए. अगर वचन दे दिया है तो फिर उसे किसी भी हाल में पूरा करना चाहिए. ऐसा न कर पाना बहुत बड़े पाप के श्रेणी में आता है. किसी को आश्वासन दिया है तो उसे पूरा करना ही चाहिए. जो व्यक्ति आपके आश्वासन पर आशा लगाता है, वह इसके पूरे न होने पर बहुत दुखी होता है और उसके दिल से आह निकलती है, जो बहुत नुकसान करती है. जो लोग इन बातों की गंभीरता को नहीं समझते उन्हें इसके बुरे परिणामों का पता ही नहीं है.

लिहाजा कोई भी शपथ बहुत सोच-समझ कर ही लें और एक बार शपथ लेने के बाद उसे पूरी करने में कोई कसर बाकी नहीं रखें.


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