सवाल धर्म, मंत्र या उपासना पद्धति का नहीं, आपकी निष्ठा का है -दिनेश मालवीय


स्टोरी हाइलाइट्स

धर्म की सही समझ नहीं होने से अनेक तरह की गलत धारणाएँ बन जाती हैं. ये चित्त में इतनी गहराई से घर कर जाती हैं कि, इन्हें दूर करना बहुत ......

सवाल धर्म, मंत्र या उपासना पद्धति का नहीं, आपकी निष्ठा का है -दिनेश मालवीय धर्म की सही समझ नहीं होने से अनेक तरह की गलत धारणाएँ बन जाती हैं. ये चित्त में इतनी गहराई से घर कर जाती हैं कि, इन्हें दूर करना बहुत मुश्किल होता है. इस तरह की एक ग़लत धारणा यह है कि, फलाना धर्म, मंत्र या उपासना पद्यति बेहतर है. लोग तुलनाएं करते फिरते हैं. यह बात लोगों को जीवन भर समझ नहीं आ पाती कि, कोई भी पद्यति वही काम करती है, जो दूसरी करती हैं. पद्यति नहीं आपकी निष्ठा का सवाल है. आप पूजा करते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं, प्रार्थना करते हैं, कोई मंत्र जपते हैं, ध्यान करते हैं, अनुष्ठान करते हैं, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. सवाल आपकी उसके प्रति निष्ठा और ईमानदारी का है. धर्म के मर्म को न समझने वाले अनेक लोग कहते हैं कि, पत्थर पर सिन्दूर पोतकर उसके सामने सिर झुकाने से क्या होगा? वे इतनी-सी बात नहीं समझते कि, व्यक्ति सिन्दूर पुते पत्थर के सामने नहीं, बल्कि उसमें ईश्वर का भाव करके उसके सामने शीश झुका रहा है. देखने वाले की नज़र में वह पत्थर हो सकता है, लेकिन शीश झुकाने वाले के लिए तो वह भगवान् ही है. शायर बशीर बद्र का एक बहुत ऊंचे स्तर का शेर है कि, ” सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा”. कोई भी पत्थर या किसी धातु की प्रतिमा या प्रतीक के सामने सिर नहीं झुकाता, वह उसमें ईश्वर या अपने किसी इष्ट देवता का भाव करके शीश झुकाकर उसके प्रति अपना समर्पण करता है. दुनिया में ऐसे कुछ धर्म हैं, जो कहते हैं कि, सिर्फ़ उनके अनुयायियों का कल्याण होगा. वे ही जन्नत या स्वर्ग में जाएँगे. इसीके चलते उन्होंने धर्म के नाम पर अनेक अनर्थ किये. दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी  इस सोच से बहुत नुकसान हुआ, लेकिन भारत को इसका सबसे बड़ा भुक्तभोगी रहा है. आक्रांता आये और हिन्दुओं के धर्मस्थलों को यह कहकर तोड़ना शुरू कर दिया कि, यह पाप है. उन्होंने अपनी लूटपाट और दुराचारों को धर्म का बाना पहनाने की दुष्टता की. आक्रांताओं में धर्म को लेकर कोई गहरी समझ तो थी नहीं. उन्हें यह समझ आ ही नहीं सका कि, हज़ारों  वर्षों से हिन्दू धर्म में अनेक साधना पद्यतियां प्रचलित हैं, जिनमें मूर्ति या प्रतीक पूजा भी शामिल है. पूजा करने वाले उनमें ईश्वर का भाव रखकर उनकी पूजा करते हैं. इसका मतलब यह थोड़े ही है कि, हिन्दुओं को ईश्वर के तात्विक स्वरूप का पता नहीं था. उनके पूर्वजों ने वेद, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता जैसे ग्रन्थ लिखे. उन्हें मानव स्वभाव और प्रवृत्तियों की बहुत गहरी समझ थी. इसीलिए उन्होंने मनुष्य को अपने स्वभाव के अनुसार उपयुक्त पूजा और उपासना पद्यति अपनाने की आजादी दी. यदि व्यक्ति उस पद्यति का पूरी निष्ठा से पालन करता है, तो उसे ईश्वर के वास्तविक स्वरूप की समझ विकसित हो जाती है. सवाल उसकी पद्यति का नहीं, बल्कि उपासक की निष्ठा और उसके प्रति ईमानदारी का है. इसका बहुत अच्छा उदाहरण महर्षि  वाल्मीकि का है. महर्षि नारद के उपदेश का उनके चित्त पर इतना गहरा असर हुआ कि, राम नाम के जप में उनकी पूरी निष्ठा हो गयी. वे राम राम करते करते कब मरा मारा जपने लगे, इसका उन्हें ध्यान ही नहीं रहा. वे तो बस पूरी निष्ठा से जाप करते रहे और परमज्ञान को उपलब्ध हुये. ज्ञानी लोग बताते हैं कि, जब राम नाम या किसी भी मंत्र का पूरी निष्ठा से जाप करने से एक समान फल मिलता है. चित्त पर उस सभी का एक जैसा असर पड़ता है. हम एक उदाहरण लेकर देखते हैं. किसी व्यक्ति  को मलेरिया हुआ, तो वह डॉक्टर के पास गया. उसने  उसे कुनेन की गोली दी और वह ठीक हो गया. उसके मित्र को मलेरिया हुआ, तो उसने उसे उसी डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी जिसने उसे ठीक किया था. लेकिन उस डॉक्टर का दवाखाना दूर था, इसलिए वह घर के पास ही के एक डॉक्टर के पास  चला  गया. उसने भी उसे कुनेन की गोली से ठीक कर दिया. इस प्रकार वह किसी भी डॉक्टर के पास जाता,लेकिन इलाज तो कुनेन ही थी. इसी तरह आप किसी भी साधना पद्यति को अपना लें, सवाल उसमें आपकी निष्ठा का होता है. जो भी पद्यति आपके चित्त पर काम कर जाए, वही सबसे कारगर होती है. शिवजी का मंत्र जपें या रामजी का या अल्लाह अल्लाह जपें, यदि जप का प्रभाव आपके चित्त पर हो रहा है, तो वह काम करेगा, अन्यथा वे कोरे शब्द होकर रह जाएँगे. व्यक्ति को जो धर्म जन्म से मिला है, उसी में रहना चाहिए. उसे सही तरह से समझकर उसका पालन करे. भारत के संतों ने एक बहुत बड़ी बात यह कही है कि, किसीकी साधना पद्यति को कमतर नहीं समझना चाहिए. किसीकी साधना पद्यति के साथ द्वेष नहीं रखना चाहिए. जब तक आपको  दूसरे की साधन पद्यति में कमी दिखाई दे रही है, तब तक यही माना जाएगा कि, आपने अपनी साधना पद्यति का पूरी निष्ठा से पालन नहीं किया. जो भी व्यक्ति अपनी साधना पद्यति के प्रति निष्ठावान होता है, उसे किसी पद्यति में दोष नज़र नहीं आता. सच्चे धार्मिक व्यक्ति को दूसरे धर्मों में कोई दोष नहीं दिखाई देता. लिहाजा, धर्म के सूक्षम तत्वों को समझकर अपने इष्ट, मंत्र और साधना पद्यति का निष्ठा से पालन कीजिये. सवाल पद्यति का नहीं, आपकी निष्ठा का है. ये भी पढ़ें : इंसान से बड़ा मूर्ख संसार में कोई जीव नहीं, शास्त्रों ने कहीं व्यंग्य में तो सर्वश्रेष्ठ प्राणी नहीं कहा.. दिनेश मालवीय