उड़ीसा की समृद्ध संत-परम्परा -दिनेश मालवीय

उड़ीसा की समृद्ध संत-परम्परा

-दिनेश मालवीय

उड़ीसा भारत का एक ऐसा प्रांत है, जिसकी अपनी अलग ही महिमा है. यहाँ सनातन धर्म के चार धामों में से श्रीजगन्नाथ पुरी धाम तो सबसे महत्वपूर्ण है ही, लेकिन यहाँ कोणार्क में विश्व प्रसिद्ध सूर्यमंदिर और भुवनेश्वर में जगत पसिद्ध अति प्राचीन लिंगराज मंदिर भी है.यहाँ के समुद्र में सात्विकता बहुत है. इस प्रांत की संत-परम्परा भी बहुत समृद्ध है. महाप्रभु चैतन्य ने तो अपने जीवन का अंतिम समय जगन्नाथपुरी में ही व्यतीत किया. साहित्य की अनमोल धरोहर “गीतगोविन्द” के रचयिता जयदेव भी इसी पवित्र भूमि की संतान थे. यहाँ नाथ सम्प्रदाय का भी बहुत प्रसार रहा.

उड़ीसा के पंचसखा परम्परा के वैष्णव भक्त बहुत प्रसिद्ध हैं. इनमें बलरामदास, अतिबडी जगन्नाथदास. अच्युतानान्द्दास, अनंतदास और यशोवंतदास शामिल हैं. इन पाँचों महान विभूतियों ने समाज के पिछड़े लोगों को भक्तिमार्ग पर चलने की प्रेरणा दी और इसमें उनका सहयोग किया. जन्म से अंधे संत भीम भोई ने भी लाखों वनवासियों में एक नयी चेतना का संचार किया और सूरदास की तरह भक्ति साहित्य की रचना की. कवि उपेन्द्रनाथ भंज ने उड़िया में भगवान श्रीराम के चरित्र को गाया, हो आज भी बहुत प्रसिद्ध है.

जयदेव- संत जयदेव एक महान कवि थे और बंगाल के राजा लक्ष्मण सेन की राजसभा के अग्रणी सदस्य थे. जयदेव का जीवन भक्ति से परिपूर्ण था. इन्होंने विश्व प्रसिद्ध काव्य रचना “गीत गोविन्द” के अलावा “रसना राघव” और “चंद्रलोक” का भी लेखन किया. यहाँ तक कि स्वामी विवेकानंद ने भी उनकी सराहना की. “श्री गुरुग्रंथ साहिब” में इनके दो पद शामिल हैं. “गीत गोविन्द में भक्ति और श्रृंगार का अद्भुत समन्वय है.
                                                   जयदेव
निरंजनी संत- यह नाथपंथ से निकला सम्प्रदाय है. उड़ीसा में यह सम्प्रदाय किसी न किसी रूप में आज भी प्रचलित है. इसके प्रवर्तक स्वामी निरंजन थे, जो निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे. इस सम्प्रदाय के बारह भक्त बहुत प्रसिद्ध हुए. निराकार की उपासना के कारण ही ये लोग निरंजनी कहलाये. इन संतों ने समाज में धर्म के नाम पर फैले बाहरी आडम्बरों और कर्मकाण्डों के साथ ही समाज की अनेक बुराइयों के उन्मूलन की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया.

भक्त दासिया बाउरी-भगवान के बहुत प्रिय भक्त- यह भगवान जगन्नाथ के परम भक्त थे. वह समाज में निचली कही जाने वाली जाति में जन्में थे, लिहाजा उन्हें कुछ ब्राह्मणों के विरोध का भी सामना करना पड़ा. इस सम्बन्ध में एक सुंदर प्रसंग आज भी उड़ीसा में श्रद्धा और भक्ति के साथ गाया जाता है.

एक बार एक ब्राह्मण भगवान् जगन्नाथ के दर्शन के लिए जा रहा था. रास्ते में दासिया ने ब्राह्मण को एक नारियल देकर कहा कि यह नारियल भगवान को दिखला कर कहना कि दासिया ने भेजा है. यदि भगवां स्वयं स्वीकार कर लें तो उचित, नहीं तो इसे वापस ले आना. कहते हैं कि ब्राह्मण ने जगन्नाथजी को दूर से ही नारियल दिखाया, तो भगवान ने अपना हाथ बढाकर उसे स्वीकार कर लिया. इसी प्रसंग की स्मृति में आज भी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के समय लोग उन्हें नारियल समर्पित करते हैं. जिसके भी घर में नारियल का वृक्ष फलता है, तो पहला नारियल दासिय बाउरी की याद में भगवान जगन्नाथ को भेजा जाता है.
                                              भक्त दासिया बाउरी

सारलादास:उड़िया के पहले कवि - संत सारलादास जीवन के प्रारम्भिक समय में सेना में रहे, तब इनका नाम सिद्धेश्वर परिड़ा था. उन्होंने सेना छोड़कर सरस्वती की साधना की और उड़िया भाषा के प्रथम कवि होने का गौरव प्राप्त किया. उनकी सबसे उत्कृष्ट रचना “महाभारत” है. उन्होंने “विलंका रामायण” और “चंडी पुराण”की भी रचना की. उन्होंने अपने आप को शूद्रमुनि नाम दिया. अपना यह नाम लेने में उन्हें कोई संकोच नहीं था. उनका जीवन बहुत पवित्र और आचरण बहुत शुद्ध था. वह कृषिकार्य करते हुए साहित्य रचना करते थे. उन्होंने बहुत कठिन समय में समाज में नव-चेतना का संचार किया और सामाजिक एकता को मजबूत कीया.
                                               सारलादास

पंचसखा भक्तों द्वारा समाज का पुनरुत्थान- पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में उड़ीसा में पाँच वैष्णव भक्तों ने एक ऐसा आन्दोलन शुरू किया, जिसे कबीर और रैदास तथा महाराष्ट्र के वारकरी संतों के भक्ति आन्दोलन के समान माना जाता है. ये सभी संत कृष्ण भक्त थे लेकिन इनकी साधना में निर्गुणियों के तत्वों का भी समावेश था. इन लोगों ने संस्कृत ग्रंथों का उड़िया में अनुवाद किया. इनमें “भागवत”, “रामायण” और “हरिवंश पुराण” आदि प्रमुख हैं. इससे निरक्षर लोगों को अपने धर्म और संस्कृति का महत्वपूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ.  इन संतों ने सामाजिक असमानता दूर कर समरसता के प्रसार में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.

बलरामदास- इन्होंने “लक्ष्मी पुराण” की रचना की, जो आज भी उड़ीसा के घर-घर में पढ़ा जाता है. इसमें यह संदेश दिया गया है कि व्यक्ति जन्म या कुल के कारण नहीं बल्कि अपने आचरण से महान या नीच होता है. ईश्वर को कुछ नहीं, व्यक्ति के सद्गुण और सदाचार प्रिय हैं. बलरामदास द्वारा रचित “दाढयता भक्ति” गाँव-गाँव में प्रसिद्ध है. महालक्ष्मी के चांडाल के घर जाने और उसके घर भोजन कररने के प्रसंग की स्मृति में मार्गशीर्ष माह के हर गुरूवार को परिवारों में उत्सव मनाया जाता है. भक्त बलरामदास ने “जगमोहन रामायण” की रचना की, जो बहुत लोकप्रिय है.

अच्युतानंद- यह एक तत्वचिंतक और समाज सुधारक संत थे. वह अपनी विशुद्ध भक्ति और सात्विक विद्वता के कारण आज भी उड़ीसा में बहुत याद किये जाए हैं. पहले वह चैतन्य महाप्रभु के सम्पर्क में आये और आगे चलकर पंचसखा टोली में शामिल हो गये.पंचसखाओं में उनका विशिष्ट स्थान है. उन्होंने जातिगत भेदभाव का विरोध किया और सभी को धर्म और भक्ति का अधिकारी माना. उन्होंने अनेक ‘मठों’ और ‘गोष्ठी घरों’ की स्थापना की, जहाँ सभी लोग एक साथ ध्यान-साधना कर सकते हैं.

जगन्नाथदास-अतिबड़ी जगन्नाथ दस भी पंचसखा परम्परा के प्रसिद्ध संत थे. इस परम्परा में रहकर उन्होंने समाजसेवा के क्षेत्र में अनुकरणीय कार्य किये. अपनी विद्वता के कारण उन्हें राजा प्रतापरुद्र देव गजपति के दरबार में विशिष्ट स्थान प्राप्त था.पंच सखाओं में यह अकेले ब्राह्मण थे, लेकिन जातिगत भावना उन्हें छू तक नहीं गयी थी. उन्होंने “दाढयता भक्ति” ग्रंथ के साथ ही सरल भाषा में अन्य अनेक ग्रन्थ लिखे. उन्होंने “भगवत” की रचना भी उड़िया में की.

यशोवंतदास- यह भी उड़ीसा के एक बहुत प्रसिद्ध नाथ्योगी थे. इनकी रचना “गोविन्द चन्द्र टीका” नाथ सम्प्रदाय में बहुत विख्यात हो गयी. आगे चलकर वह चैतन्य महाप्रभु के सम्पर्क में आकर परम वैष्णव भक्त हो गये.वह चैतन्य की संकीर्तन मण्डली के अभिन्न अंग थे. कहा जाता है कि वह चैतन्य महाप्रभु से मिलने वाले पहले पंचसखा संत थे.

अनंतदास- पंच सखाओं में यह आयु में सबसे छोटे थे. वैष्णव भक्ति विषय पर उनकी सत्रह पुस्तकें आज भी उपलब्ध हैं. इनमें “हेतु उदय भागवत” बहुत अधिक प्रसिद्ध है.

पंचसखा सम्प्रदाय में आगे चलकर और भी बहुत अद्भुत संत हुए, जिन्होंने सामाजिक चेतना और समरसता बढ़ाने के लिए बहुत उल्लेखनीय कार्य किये. इनमें अर्जुनदास, उद्ध्बदास, कन्हीं खूँटिया, नारायण अवधूत, माधवी देवी, माधवदास, शिशुशंकर दास, देब दुर्लभदास, वृन्दावनदास, गोपीनाथदास, नरसिंह सेन  आदि प्रमुख हैं.

भीम भोई-यह भी उड़ीसा के बहुतविख्यात संत हुए हैं. वह जन्मांध परम भागवत संत थे. कहते हैं कि एक बार वह किसी कुएं में गिर पड़े था और जब महिमा सवामी  नामक संत ने उन्हें बाहर निकाला तो वह उनका भक्ति भाव बहुत बढ़ गया. उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की, जिनमें सामाजिक सद्भाव का सन्देश दिया गया है.
                                                  भीम भोई


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