असम और अन्य पड़ोसी प्रदेशों की संत परम्परा -दिनेश मालवीय

असम और अन्य पड़ोसी प्रदेशों की संत परम्परा

-दिनेश मालवीय

उत्तर-पूर्व भारत का यह प्रदेश कला और साहित्य के साथ ही वीरता तथा भक्ति के लिए भी प्रसिद्ध है. प्राचीन काल में उसे प्रागज्योतिषपुर कहा जाता था. बहुत विविधताओं वाले इस प्रदेश को यहाँ के संतों ने एकता के सूत्र में पिरोने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया.

शंकरदेव- असम क्षेत्र में पंद्रहवीं शताब्दी में शंकरदेव नाम के एक ऐसे महापुरुष हुए, जिनकी चेतना के उच्च स्तर के कारण उन्हें अवतारी पुरुष माना जाता है. उन्होंने जातिगत भेदभाव, आडम्बरों और भक्ति में बाहरी दिखावों को समाप्त कर लोकजीवन में नयी चेतना का संचार किया. उन्होंने श्रीमदभागवत को आधार माना और उसके माध्यम से श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रसार किया. उनके सुयोग्य शिष्यों माधव देव और दामोदर देव ने इस परम्परा को बहुत कुशलता के साथ आगे बढ़ाया. उनके कारण गाँव-गाँव में कृष्ण भक्ति का प्रसार हुआ और समाज में समरसता बढ़ी. उन्होंने सभी को समान रूप से भक्ति का अधिकारी माना. शंकरदेव ने असमिया समाज में संस्कृति, कला, आध्यात्मिक दर्शन और साहित्य के क्षेत्र में कुशल मार्गदर्शन किया.
                                                                  
शंकरदेव ने महँगे और खर्चीले मंदिर बनवाने की बजाय लोगों की सहायता से बिना दीवार का,बाँस से सहारे फूस आदि से छाये हुए “नाम घरों” की स्थापना करवायी, जो भक्ति और सांस्कृतिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण केंद्र बन गये.असम में आज भी हजारों नामघर हैं. उन्होंने अनेक ग्रंथों की भी रचना की, जिनमें “रामायण” तथा “भगवत पुराण” का स्थानीय अनुवाद किया और इनके कथानकों के आधार पर लोकनाट्यों का मंचन करवाया. इसके अलावा उन्होंने”रुक्मणि हरण”, “पारिजात हरण”, “राम-विजय” आदि ग्रंथों की भी रचना की.

शंकरदेव ने मणिपुर और नागा भूमि के पहाड़ी क्षेत्रों में भी वैष्णव भक्ति का प्रसार किया. इनके अनुयाइयों ने संस्कृति और संस्कारों की रक्षा की दिशा में भी बहुत सराहनीय कार्य किया. इनमें असम के शम्भुधन फुंगलोस, मेघालय के तीरथ सिंह और जीवन राय, मिजोरम की रानी रोपुइलीयानी, नागा राज्य के जादोनांग और रानी गईडिल्यू, अरुणाचल के तालों रुकबो और त्रिपुरा के स्वामी स्वरूपानंद के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं.

माधवदेव- यह शंकरदेव के शिष्य थे. गुरु से सम्पर्क से पहले उन्हें शाक्तमत में बहुत भरोसा था और वह पशुबलि में विश्वास करते थे. शंकरदेव से दीक्षा के बाद उनकी जीवन-दृष्टि एकदम बदल गयी और वह परम सतगुणी संत हो गये. गुरु-शिष्य ने मिलकर सामाजिक रूढ़ियों और बुराइयों के खिलाफ जमकर संघर्ष किया और समाज में तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भी समरसता कायम की.  वह एक तत्वचिन्तक थे और भगवान का दर्शन प्राप्त करना ही उनका एकमात्र ध्येय था. उन्होंने निर्गुण भक्त होते हुए भी कभी सगुण स्वरूप के पूजन का विरोध नहीं किया.

राजऋषि भाग्यचन्द्र- यह मणिपुर के राजा थे, लेकिन उनका जीवन ऋषियों की तरह था. उन्होंने मणिपुरी समाज में सामाजिक समन्वय और एकता की दिशा में बहुत सराहनीय कार्य किया.उन्होंने जाति, वर्ग और अन्य मानवनिर्मित भेदभाव को मिटाने की दिशा में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने अनेक मंदिरों की स्थापना करवायी और मणिपुर की स्थानीय वस्तुओं का भगवान को भोग लगाने की परम्परा चलायी. उन्होंने प्रथम रास नृत्य का आयोजन किया, जिसमें उनकी पुत्री राजकुमारी विम्बावती मंजरी ने राधा की भूमिका निभायी. उन्होंने विवाह नहीं किया और सम्पूर्ण जीवन भगवान् की भक्ति में समर्पित कर दिया.जीवन के अंतिम काल में वह चैतन्य महाप्रभु के जन्मस्थान नवद्वीप में जाकर रहने लगीं और वहीँ उनका स्वर्गवास हुआ. मणिपुर में विश्वास किया जाता है कि वह देवी बन गयीं. उन्हें मणिपुर की मीरा भी कहा जाता है.
                                               राजऋषि भाग्यचन्द्र

जीवन राय माइरोम- मेघालय के विश्वविख्यात स्थल चेरापूंजी में जन्में यह एक बहुत बड़े संत हुए हैं. उन्होंने स्वाध्याय से ही हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषाओं में अच्छा अधिकार प्राप्त कर लिया. सरकारी नौकरी करने वाले वह खासी समाज के पहले व्यक्ति थे. अपनी अद्भुत प्रतिभा के बल पर वह बहुत बड़े पद पर पहुँच गये. प्रदेश के ईसाईकरण के अंग्रेजों के षड्यंत्र को समझ कर अपना स्वतंत्र हाई स्कूल स्थापित कर खासी बच्चों में अपनी संस्कृति के संस्कार डालने का बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया.  उन्होंने “रामायण”, “गीता”, “हितोपदेश”, “बुद्ध चरित्र” और “चैतन्य चरित्र” जैसे ग्रंथों का खासी भाषा में अनुवाद किया. खासी जाति की बच्चियों के लिए उन्होंने पहली प्राथमिक शाळा स्थापित की, जहाँ शिक्षा के साथ ही उनके मन में भारतीय संस्कारों का बीजारोपण भी किया जाता था. ईसाइयों ने उनके मार्ग में बहुत बाधाएं डालीं और कठिनाइयाँ खड़ी कीं, लेकिन वह अपने मार्ग पर अडिग रहे. उन्होंने खासी समाज को ईसाइयों के चंगुल से बचाने के लिए “सेंग खासी” नामक धार्मिक और सांस्कृतिक संगठन की स्थापना की. उन्होंने और बाबू अंडरसन ने बड़ी संख्या में खासी लोगों को ईसाई बनने से बचा लिया.

स्वामी स्वरूपानंद- त्रिपुरा के चंदनपुर ग्राम में जन्में इस महापुरुष की शिक्षा ढाका और कोलकाता में हुयी. शिक्षा पूरी करते ही, वह स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गये. इसी कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा. जेल से निकलकर वह पूरी तरह समाजसेवा के कार्य में लग गये.

उन्होंने भारतीय वांग्मय का बहुत गहरा अध्ययन किया और समाज के लिए उपयोगी साहित्य का सृजन भी किया. उन्होंने मानवों के बीच भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया. उनका कहना था कि सामान्य व्यक्ति का चरित्र अच्छा हो और वह सात्विक जीवन जिए. उन्होंने गाँव के बच्चों के लिए विद्यालयों और अस्पतालों के अलावा यातायात सुविधाओं का विकास किया  आज भी उनके हजारों अनुयायी हैं जो समाज सुधार के लिए कार्य करते हैं.
                                           

रानी रोपुइलियनी- इनका जन्म मिजोरम के राजा लाल संमूगा के यहाँ हुआ था. उनका विवाह दक्षिण मिजोरम के राजा बांडूला के साथ हुआ. उन्होंने अंग्रेजों द्वारा षड्यंत्रपूर्वक इस क्षेत्र से भारतीय संस्कारों को समाप्त करने के प्रयासों को विफल करने में बहुत सराहनीय कार्य किया. राजा ने अंग्रेजों को अपनी सेना में भर्ती नहीं किया और अंग्रेजों के हर प्रलोभन को ठुकरा दिया. राजा की मौत के बाद अंग्रेजों ने उनके राज्य पर आक्रमण कर दिया. रानी ने पूरी शक्ति के साथ युद्ध किया लेकिन उन्हें पराजय मिली. फिर भी उन्होंने अंग्रेजों के संधि प्रस्ताव को ठुकरा दिया. उन्हें बंदी बना कर चटगांव जेल में रखकर अनेक यातनाएं दी गयीं. जेल में ही उनकी मृत्यु हो गयी. जो लोग ईसाई नहीं बन पाए, वे उन्हें आज भी देवी की तरह पूजते हैं.
                                                                   रानी रोपुइलियनी

रानी माँ गाइंडील्यू- रानी माँ के नाम से प्रसिद्ध इस महान स्त्री ने तेरह वर्ष की उम्र में ही देश की आजादी के संघर्ष में भाग लेना शुरू कर दिया. नागा पहाड़ियों पर जादोनांग के नेतृत्व में लड़ाई लड़ी गयी और जादोनांग को अंग्रेजों ने फाँसी पर चढ़ा दिया.रानी ने नेत्तुत्व सम्हाल लिया. उन्हें पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने इनाम रखा और उन्हें पकड़ लिया गया. उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी. चौदह साल जेल काट कर वह बाहर आयीं. वर्ष 1937 में नहरू जि असम के दौरे पर गये तो उन्हें रानी के बारे में पता चला. उन्होंने उन्हें “नागा जाति की रानी” कहा. तभी से उनका नाम “रानी माँ” के रूप में प्रसिद्ध हो गया. रानी माँ ने नागा पहाड़ियों में रहने वाली नागा उप-जातियों को धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से एकजुट करने के लिए आन्दोलन चलाया. इसके लिए उन्हों तीन नागा उप-जनजातियों को मिलकर नागा लोगों को संगठित किया. वह सदा वहाँ के लोगों को ईसाई पादरियों की कुटिल चालों से बचाती रहीं. उन्होंने सभी जनजातियों को जोड़कर “हरक्का” नाम से आन्दोलन चलाया.

तालों रुकबो- अरुणाचल प्रदेश के तालों रुकबो ने वहाँ की जन-जातियों में जागृति लाने की दिशा में बहुत उल्लेखनीय कार्य किया. वहाँ की जनजातियों के लोग प्राचीन काल से ही सूर्य, चन्द्र की उपासना करते थे, लेकिन वहाँ मंदिर और पूजा-पद्धति की कोई व्यवस्था नहीं थी. ईसाई मिशनरियाँ लगातार लोगों को ईसाई बनाने में जुटी थीं. तालोम रुकबो ने अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को आगे बढाते हुए लोगों से अपने सांस्कृतिक त्यौहार मनाने आह्वान किया और इस तरह एकता और संगठन को मजबूत किया.

अरुणाचल प्रदेश के प्रसिद्ध सोलुंग त्यौहार को सरकारी गजट में लाने और सार्वजनिक अवकाश घोषित कारवाने में उनका सबसे बड़ा योगदान है. उन्होंने हमेंश अपने धर्म को महत्त्व दिया और लोक-परम्पराओं को जीवित रखा.वहाँ के लोगो “दोनी-पोलो”यानी सूर्य-चद्रमा की पूजा करते थे. उन्होंने इसके लिए साप्ताहिक पूजा-पद्धति का विकास किया. प्रार्थना-स्थलों का निर्माण करवाया और पूजागृहों को सुंदर स्वरूप दिया. वर्ष 2001 में वह परमधाम को चले गये. इस प्रदेश में भारतीय धर्म और संस्कारों की रक्षा में उनके कार्य को हमेशा याद किया जाएगा.

भक्त माधव कंदली- यह इस अंचल के एक महान भक्त कवि हुए हैं. उन्होंने लोकभाषा असमिया में “रामायण” की रचना कि, जो बहुत लोकप्रिय है. उनके बाद श्रीशंकरदेव ने स्वयं और अपने शिष्यों से “उत्तरकाण्ड” और “आदिकाण्ड” की रचना करवायी. वर्तमान असमिया रामायण के साथ काण्डों में लगभाग साढ़े सात हज़र्र पद हैं. असमिया समाज में यह रामायण बहुत भक्ति भाव से गयी जाती है.


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