कुंडलिनी: इड़ा, पिंगला व सुषुम्णा नाड़ी क्या है। सुषुम्णा में प्रवेश कैसे मिले

 

The secret behind Kundalini And Susumna Nadi

कुंडलिनी योग में तीन नाड़ियों की चर्चा है।

 इड़ा पिंगला सुषुम्णा इड़ा सूर्य स्वर कहलाती है पिंगला चन्द्र, सुषुम्णा आध्यात्मिक पथ है।जब प्राण की गति सुषुम्णा में होती है तब सिद्धियों के दर्शन होते हैं।जब कुंडलिनी जागृत होती है तो वो एक साथ तीन ग्रंथियों ब्रम्ह विष्णु और रुद्र का शोधन भेदन करती है साथ ही सप्त चक्र पर कार्य करती है। कुंडलिनी इन सबका शोधन व परिष्कार करती है फिर खुलता है सुषुम्णा का पथ।

सूर्य नाड़ी को साधो तो शक्ति का तमस रूप की प्रचंडता अनुभव होगी, चंद्र नाड़ी को साधो तो शक्ति की शीतलता की अनुभव।इसे तामसिंक अथवा सत्यिक शक्ति एवं सिद्धि स्वरूप भी कह और समझ सकते हैं।साधना में हम जब साधने के प्रयास करते हैं तो असन्तुलन हो जाता है लेकिन जागृत कुंडलिनी सब कुछ सन्तुलित रूप से कराती है। क्यूँकि इन्हें जान, समझ कर इनकी ही सहायता से सुषुम्ना को साध कर ब्रह्म रंध में प्रवेश कर परम मुक्ति अर्थात ब्रह्म से एकाकार हो हुआ जा सकता हैं।

ये सब कुंडलिनी भली भांति जानती है।जो गुरु साधक सुषुम्ना नाड़ी को सिद्धियों अथवा शक्तियों का केंद्र मानते हैं और सूर्य अथवा चंद्र नाड़ी को शक्तिविहीन वो अज्ञान में हैं।शक्ति और सिद्धि समस्त नाड़ियों में अपना अस्तित्व रखते हैं।ऐसे ही नहीं 72000 नाड़ियों में ७२००० सिद्धियों की ज़िक्र मनीषियों ऋषियों एवं संतो की व्याख्या में अथवा पतंजलि में दर्ज हैं।

परंतु ३ नाड़ियाँ प्रमुख हैं जो काल सूचक होती हैं जिसमें दो भूत और भविष्य से सम्बंधित और तीसरा वर्तमान जो सुषुम्ना हैं।परंतु इसके अंदर एक द्वार ऐसा भी हैं जो अति सूक्ष्म हैं कितना सूक्ष्म जितना बैल के सिंग पे एक तिल का दाना और उस द्वार का नामः हैं ब्रह्मरंध, जो स्वयं में एक नाड़ी हैं जिसमें काल तो प्रवेश नहीं कर सकता केवल वो आत्मा प्रवेश करती हैं जिसका चित्त हर आवरण और तत्व से मुक्त हैं।

इसलिए यहाँ ना भूत ना भविष्य, और ना ही वर्तमान।सुषुम्ना में प्रवेश होने से पूर्व दोनो नाड़ियों को संतुलित करना अर्थात साधना अनिवार्य ।बिना इंग्ड़ा और पिंगडा को साधे सुषुम्ना में चित्त को कदापि प्रवेश नहीं मिल सकता।चूँकि ये आंतरिक रास्ते है इसलिए इसे वही समझेंगे जो इनसे अवगत हैं।


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