दान-पुण्य के रहस्य, दान किसे देना चाहिए, जानिए दान के तीन भेद .. दिनेश मालवीय  

दान-पुण्य के रहस्य, दान किसे देना चाहिए, जानिए दान के तीन भेद .. दिनेश मालवीय  
दान-पुण्य के रहस्य, dinesh


शुद्ध ब्राह्मण कौन है, 


दान किसे देना चाहिए ,


दान के तीन भेद , 

धर्मपुराण में आपका स्वागत है. हम शास्त्रों और ग्रंथों के आधार पर ऐसी जानकारी और तथ्य आपके सामने लाने का प्रयास करते हैं, जिन्हें जानना धर्म के क्षेत्र में आगे बढ़ने में सहायक हो. युगों-युगों से दान-पुण्य के महत्त्व को रेखांकित किया गया है. दान को बहुत पुण्यदायी और कल्याणकारी माना गया है. लेकिन हर विषय की तरह इस विषय के भी कुछ ऐसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं, जिन्हें जानना बहुत ज़रूरी है. इनमें दान किसे देना चाहिए, कब देना चाहिए और क्या देना चाहिए,यह प्रमुख हैं. दान के विषय में श्रीमदभगवतगीता में भी श्रीकृष्ण ने बहुत अच्छा ज्ञान दिया है.

दान का रहस्य 


शिवपुराण में दानन के विषय में बहुत सुन्दर विवरण मिलता है. इसमें दान के पात्र पर बहुत बल दिया गया है. विवरण के अनुसार जो पतन से हमारी रक्षा करता है यानी हमें नरक में गिरने से बचाता है, उसे ही “पात्र” कहा गया है. अर्थात जो दाता को पाप से बचाए, वही पात्र है. सूतजी ऋषियों से कहते हैं कि दान पात्रता के अनुसार देने से ही उसका पूरा फल मिलता है. वह कहते हैं कि तपोनिष्ठ योगी और ज्ञाननिष्ठ यति पूजा के पात्र हैं, क्योंकि ये इनसे पापों का नाश होता है.



आजकल ब्राह्मणों को दान दिए जाने की परम्परा पर बहुत से लोग नाक सिकोड़ते हैं. ऐसा इसलिए है कि उन्हें इस विषय का ज्ञान ही नहीं है. शिवपुराण में सूतजी ऋषियों से कहते हैं कि जिस ब्राह्मण ने चौबीस लाख गायत्री जप कर लिया हो, वही पूजा का उत्तम पात्र होता है. वह सम्पूर्ण फलों और भोगों को देने में समर्थ है. गायत्री अपने गायक की पतन से रक्षा करती है इसीलिए वह “गायत्री” कहलाती है.


जैसे इस लोक में जो धनहीन है, वह दूसरे को धन देता. जो धनवान है, वही दूसरों को धन दे सकता है. इसी तरह हो स्वयं शुद्ध और पवित्र है, वही दूसरे मनुष्यों का उद्धार कर सकता है. जो गायत्री का जप करके शुद्ध हो गया है, वही ब्राह्मण कहलाता है. इसलिए दान,जप, होम और पूजा सभी कर्मों के लिए वही शुद्ध पात्र है. ऐसा ब्राह्मण ही दान और रक्षा करने की पात्रता रखता है. इसके बाद सूतजी कहते हैं कि जो स्त्री या पुरुष भूखा हो,वही अन्नदान का पात्र है. जिसको जिस वस्तु की इच्छा हो, उसे वह वस्तु बिना मांगे दे दी जाए तो दाता को उस दान का पूरा-पूरा फल प्राप्त होता है. यह महर्षियों की मान्यता है. जो सवाल या याचना करने पर दिया गया हो, वह दान आधा ही फल देने वाला बताया गया है. अपने सेवक को दिया हुआ दान एक चौथाई फल देने वाला होता हो.



सूतजी ने आगे बताया कि जो जातिमात्र से ब्राह्मण है और दीनतापूर्ण वृत्ति से जीवन बिताता है, उसे दिया हुआ धन का दान दाता को इस भूतल पर दस वर्षों तक भोग प्रदान करने वाला होता है. वही दान यदि वेदवेत्ता ब्रह्माण्ड को दिया जाए तो वह स्वर्गलोक में देवताओं के वर्ष से दस वर्षों तक दिव्य भोग देने वाला होता है. अपने अपने व्यवसाय-कर्म से ईमानदारी से प्राप्त हुआ धन ही दान के लिए उत्तम होता है. गौ आदि बारह वस्तुओं का चैत्र आदि बारह महीनों में क्रमश: दान करना चाहिए . गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण, घी, वस्त्र, धान्य, गुड़, चाँदी, नमक, कोंहड़ा और कन्या. इनमें गोदान से कायिक, वाचिक और मानसिक पापों का निवारण तथा कई आदि पुण्य कर्मोंकी पुष्टि होती है.


भूमि का दान इस लोक और परलोक में प्रतिष्ठा की प्राप्ति करवाने वाला है. तिल का दान बलवर्धक और मृत्यु का निवारक होता है. स्वर्ण का दान जठराग्नि को बढाने वाला और वीर्यदायक है. घी का दान आयु की वृद्धि कराने वाला है. धान्य का दान अन्न-धन की समृद्धि में सहायक है. गुड़ का दान मधुर भोजन की प्राप्ति कराने वाला होता है. चाँदी के दान से वीर्य की वृद्धि होती है. नमक का दान छहों रस का भोजन प्राप्त कराता है. सब प्रकार का दान सारी समृद्धि की सिद्धि के लिए होता है. विज्ञ पुरुष कूष्माण्ड के दान को पुष्टिदायक मानते हैं. कन्या का दान आजीवन भोग देने वाला कहा गया है. यह इस लोक और परलोक में भी सम्पूर्ण भोगों को प्राप्त करवाने वाला है.


श्रीमभगवतगीता के अनुसार दान के भेद :


श्रीमद्भागवतगीता के सत्रहवें अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने दान के तीन भेद बताये हैं. दान में देश,काल और पात्रता पर बहुत बल दिया गया है. जिस स्थान पर और जिस काल में जिस वस्तु की आवश्यकता हो, उस वस्तु के दान द्वारा सबको यथायोग्य सुख पहुंचाने के लिए हो वही देश-काल है. पात्र के विषय में कहा है जैसे ज्ञानी और पवित्र व्यक्ति, भूखा, प्यासा, वस्त्रहीन, दरिद्र, रोगी, अनाथ और भयभीत प्राणी आदि. दान देना ही कर्तव्य है, ऐसे भाव से जो दान देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर उपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सात्विक होता है. जो दान क्लेशपूर्वक और बदले में कुछ पाने की भावना से या फल को दृष्टि में रखकर किया जाता है, वह दान राजस होता है. जो दान बिना सत्कार के या तिरस्कार के साथ योग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है , वह दान तामस होता है.


मित्रो, दान निश्चय ही बहुत जीवन को सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है. लेकिन दान देते समय इस बात बात का अवश्य ध्यान रखें कि दान कहाँ, किसको और कब दिया जाना चाहिए. कुपात्र को दिया जाने वाला दान तो दान की श्रेणी में ही नहीं आता. जहाँ जिस चीज की ज़रूरत हो, वहाँ उसी चीज का दान का औचित्य है. इसी तरह ऐसे व्यक्ति को दान नहीं दिया जाना चाहिए जो उसका दुरूपयोग करे या उसकी पात्रता ही नहीं रखता हो.



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