और देश आज़ाद हो गया….. भारत की आज़ादी की वो कहानी जो हर भारतीय को पढना चाहिए.. भाग 8

और देश आज़ाद हो गया…..

भारत की आज़ादी की वो कहानी जो हर भारतीय को पढना चाहिए.. भाग 8

 

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अन्ततः भारत शासन कानून (1935) पारित किया गया। कांग्रेस ने चुनाव में हिस्सा लिया और 6 प्रांतों में मंत्रिमण्डल गठित किये (1937)। दूसरे विश्व युद्ध के शुरू होने पर (1939-45) इन मंत्रिमण्डलों ने त्यागपत्र दे दिये जबकि अंग्रेजों ने बिना भारतीय जनमत से चर्चा किये हुए भारत को युद्ध में भागीदार बना दिया था।
सुभाषचन्द्र बोस इस बात पर जोर दे रहे थे कि अंग्रेजों के सामने जो संकट है उसका उपयोग भारत को अपनी स्वतंत्रता के लिए करना चाहिये। उनकी महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं के साथ विचार सभ्यता नहीं रह सकी, इसलिये विश्वयुद्ध के दौरान वे देश के बाहर चले गए और उन्होंने आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व किया जिससे भारत को स्वतंत्रता जल्द मिल सके।

कांग्रेस नेतृत्व का प्रभावशाली वर्ग इस बात के लिए तैयार था कि यदि अंग्रेज भारत को सत्ता सौंपने को तैयार हों तो उनकी सहायता की जाय। इस संबंध में चल रही बातचीत पूरे तौर पर बाद में टूट गई। फलस्वरूप अगस्त 1942 में महात्मा गांधी ने 'करो या मरो का उद्वेलनकारी आह्वान किया और भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू कर दिया। सरकार ने तेजी से बदले की भावना से कार्य किया और शीर्षस्थ कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। पर इसका कोई फल नहीं प्राप्त हुआ। भारत छोड़ो आंदोलन पूरे देश में जंगल की आग की तरह अपने आप फैल गया। जाहिर है कि लोगों ने यह तय कर लिया कि उन्हें रक्त की अंतिम बूँद तक संघर्ष करना है।

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स्वतंत्रता प्राप्त करना अब थोड़े समय की बात रह गई थी। अंग्रेज लोग इस बात को अच्छी तरह समझ गए थे कि ज्यादा समय तक टिकने में कोई फायदा नहीं है बड़े पैमाने पर चल रहे नागरिक प्रतिरोध के अलावा सशस्त्र सेनाओं में भी असंतोष फैल रहा था। आजाद हिन्द फौज के अलावा बम्बई में भारतीय-नौसैनिकों के द्वारा विद्रोह भी किया गया था। 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हो गया।

परन्तु स्वतंत्रता के साथ ही भारत का विभाजन हो गया। हमने यह पढ़ा ही है कि तत्कालीन कलकत्ता के सर्वदलीय सम्मेलन (1928) में हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों को स्वीकार्य किसी समझौते तक पहुँचने के प्रयत्न किसी तरह असफल हो गये थे। इसके बाद यद्यपि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच मतभेद बने रहे, पर मुस्लिम-लीग धीरे-धीरे कांग्रेस से दूर होती चली गई। उसने एक समुदाय के रूप में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने का अपना दावा सिद्ध करने में भी सफलता प्राप्त कर ली और लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन (1940) में मोहम्मद अली जिन्ना की अध्यक्षता में ऐतिहासिक 'पाकिस्तान-प्रस्ताव' स्वीकार कर लिया। बाद के वर्षों में अंग्रेजों की सहायता से लीग ने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संकल्पपूर्वक प्रयास किये और उसे 1947 सफलता मिली।


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