आचार्य चाणक्य की शिक्षा नीति से ही होगा राष्ट्र का कल्याण -सरयूसुत मिश्रा

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-सरयूसुत मिश्रा

 

chankyaआचार्य चाणक्य के “अर्थशास्त्र” में विद्या के संबंध में गहन विचार और उसके महत्व को बताया गया है. आचार्य चाणक्य के अनुसार आन्विक्षिकी अर्थात आत्मविद्या, वेद, वार्ता अर्थात कृषि एवं पशुपालन संबंधी ज्ञान तथा दंड नीति को ही विद्या कहा गया है. विद्या के अंतर्गत वेद ज्ञान, कृषि पशुपालन संबंधी ज्ञान तथा दंड नीति के ज्ञान समाविष्ट होते हैं.

आचार्य चाणक्य की विद्या के सूत्रों में मनुष्य के सर्वांगीण विकास की परिकल्पना है .आधुनिक समय में दी जा रही शिक्षा या विद्या व्यक्ति के व्यक्तित्व में सभी पक्षों का विकास नहीं करती. आज की शिक्षा एक पक्षीय व्यक्तित्व विकसित करती है.

इसी का दुष्परिणाम है कि आज चारों तरफ असंतोष ,राग-द्वेष, छल-कपट और लाभ के गणित का बोलबाला है. आज के स्नातक, स्नातकोत्तर या अन्य प्रोफेशनल कोर्सेज मुख्यत: रोजगार की पृष्ठभूमि में गढ़े और पढ़े जाते हैं.

शिक्षा के एक पक्षीय और एकाकी स्वरूप के कारण आज हर क्षेत्र में असफलताएं ज्यादा दिखाई पड़ती है. शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो व्यक्ति को उसके शास्त्र, संस्कृति, ज्ञान-परंपरा से जोड़ते हुए, आधुनिक तकनीकी और संसाधनों के उपयोग के साथ रोजगार मूलक हो. रोजगार अनिवार्यता है. जीवन यापन के लिए धन की आवश्यकता है और धन तभी आएगा जब अच्छा रोजगार या व्यापार मिलेगा. 

वर्तमान में केवल रोजगार के लिए सारा जीवन व्यतीत हो जाता है और हमारी संस्कृति और ज्ञान से हम अछूते रह जाते हैं. आचार्य चाणक्य विद्या के संपूर्ण स्वरूप के बारे में कहते हैं कि सांख्य, योग और नास्तिक दर्शन का नाम है.

chankya_newspuranइसके अंतर्गत स्वयं को समझने के लिए आत्मविद्या और जीवन की व्यवस्थाओं के लिए तर्क या लॉजिक की शिक्षा मिलती है. त्रयी के अंतर्गत वेदों में धर्म और अधर्म का, वार्ता में अर्थ और अनर्थ का तथा दंड नीति में प्रशासन को सफल अथवा असफल बनाने के रूप में सुशासन और दू:शासन का प्रतिपादन किया गया है. आचार्य कौटिल्य आन्वीक्षिकी को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते हैं. उनका कहना है की आत्मविद्या ही वार्ता और दंड नीति को निर्धारित करती है. 

किसी व्यक्ति के उत्थान एवं पतन में सुख-दुख तथा हानि लाभ में उनकी बुद्धि में यही आत्मविद्या संतुलन बनाए रखती है. यही विद्या हर्ष और शोक को नियंत्रित करती है तथा सोचने-विचारने एवं समयानुसार उपयुक्त बोलने की शक्ति प्रदान करती है. आचार्य चाणक्य के अनुसार आन्वीक्षिकी विद्या सभी विद्याओं को प्रकाशित करने वाली है सभी कार्यों का साधन होने के कारण उन्हें सिद्ध करने वाली है. यह सभी धर्मों का आश्रय होने के कारण व्यक्ति का हित करने वाली है.

वर्तमान में जो शिक्षा दी जा रही है उसमें आत्मविद्या का सर्वथा अभाव है. व्यक्ति भाषा, गणित, तकनीकी की शिक्षा तो प्राप्त कर लेता है, लेकिन आत्मविद्या का ज्ञान नहीं होने से जीवन में वह वांछित सफलता नहीं मिलती जो मिलनी चाहिए थी. कोई भी देश, राज्य, समाज शिक्षा के बल पर ही आगे बढ़ता है. शिक्षा ऐसी होती है जो आत्मविद्या और वेद वार्ता और दंड नीति को संपूर्णता में सिखाते हुए अन्य विषयों को पढ़ाती हो. इस प्रकार तैयार व्यक्तित्व केवल रोजगार के लिए उपयुक्त नहीं होता. वह हमेशा राज्य और राष्ट्र की बेहतरी,शांति, सद्भाव के लिए शास्त्र सम्मत आचरण करता है.


Chanakyaहम अगर कल्पना करें कि कोई व्यक्ति आचार्य चाणक्य के बताए अनुसार सभी तरह की शिक्षा प्राप्त करता है, तो क्या वह दंगाई हो सकता है? क्या वह राष्ट्र विरोधी हो सकता है? क्या वह जीवन यापन के लिए राज्य और राष्ट्र को बलि देते हुए गरीबों के हक को मारते हुए भ्रष्टाचार में शामिल होकर मानवता को दूषित कर सकता है? शायद ऐसा नहीं कर सकता.

आचार्य चाणक्य द्वारा अपने अर्थशास्त्र में विद्या को संपूर्ण तभी माना गया है, जब उसके अंतर्गत कृषि, और व्यापार की शिक्षा ग्रहण की गई हो. इसका सीधा सीधा अर्थ यह है कि विद्या प्राप्त व्यक्ति केवल नौकरी पर आश्रित नहीं हो सकता. उसके पास स्वयं अपनी आजीविका अर्जित करने का ज्ञान होगा. वह अपने कर्म से स्वयं जीवन यापन में सक्षम होगा. 

आज देश के सामने बेरोजगारी का जो बड़ा संकट है, उसका एक बड़ा कारण हमारी शिक्षा व्यवस्था भी है. इस व्यवस्था में शामिल हर व्यक्ति अच्छी से अच्छी नौकरी की ही कल्पना करता है कृषि और व्यापार को दोयम दर्जे का मानता है जबकि आचार्य चाणक्यपशुपालन कृषि, पशुपान और व्यापार को शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग बताते हैं.

Chanakyas_newspuran_01आचार्य चाणक्य के अनुसार वार्ता, विद्या का संबंध कृषि पशुपालन एवं व्यापार से है. यह विद्या धान्य, पशु तथा स्वर्ण, ताम्र आदि खनिज पदार्थों के रूप में संपन्नता का सामर्थ्य प्रदान करने वाली है. विद्या में दंड नीति का भी महत्वपूर्ण योगदान है. 

आचार्य चाणक्य के अनुसार सभी प्रकार की विद्याओं की सफलता दंड पर ही निर्भर करती है. दंड और उसका भय ही अपनों और परायों को उचित मार्ग ग्रहण करने और उचित व्यापार करने के लिए प्रेरणा प्रदान करता है. दंड का प्रतिपादन करने वाले नीति दंड नीति ही कहलाती है. दंड नीति के द्वारा ही अप्राप्त पदार्थों की प्राप्ति तथा प्राप्त द्रव्यों के संरक्षण और उनके संवर्धन के द्वारा ही संपत्ति का उचित कार्यों में निवेश करने की प्रेरणा प्राप्त होती है.

आचार्य चाणक्य के अनुसार संसार की लोक यात्रा इसी पर निर्भर है और इसी के द्वारा संचालित होती है आधुनिक शिक्षा में भारतीय संस्कृति और परंपरा की शिक्षा को शामिल करने के लिए शिक्षा नीति को समय-समय पर अद्यतन किया जाना आवश्यक है. यह सुखद संयोग है कि पिछले वर्ष भारत सरकार ने देश में नई शिक्षा नीति लागू की है.

इस नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृति को शिक्षा नीति बनाने के लिए प्रयास किए गए हैं नई शिक्षा नीति की सफलता बाद में प्रकाश में आएगी. हमें क्रियान्वयन के अनुभव के आधार पर शिक्षा नीति को अद्यतन करने के लिए हमेशा तत्पर रहना ही राष्ट्र के विकास के लिए जरूरी कदम होगा.

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Priyam Mishra



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