Covid के साइड और भी हैं, कुछ बर्बाद हुए तो कुछ मझधार में..  कैसे उबरेंगे हम ? अतुल विनोद 

Covid के साइड और भी हैं, कुछ बर्बाद हुए तो कुछ मझधार में..  कैसे उबरेंगे हम ? अतुल विनोद

सिर्फ जान ही नहीं गयी, माल भी गया,

अमीर और अमीर हुआ, गरीब और गरीब, 

बेचारा बेसहारा इंसान, कौन बनेगा इनका भगवान ? 

परिस्थिति को स्वीकार कर, आगे बढ़ें ....  


इस महामारी में अनेक लोग बेरोजगार हुए कई लोगों के बिजनेस ठप हुए तो कई के परिवार बिखर गए | सबसे बड़ी समस्या उन लोगों के सामने आ खड़ी हुई जो अपने परिवार का एकमात्र कमाने वाला खो चुके हैं | सवाल यह है कि क्या ऐसे लोग परिस्थितियों के आगे हार मान कर हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहें या अपने आप को इकट्ठा कर पूरी शक्ति से परिस्थिति को हराने में लग जाएँ |



covid peak



ऐसे हालातों में अक्सर लोग कहते हैं कि हम क्या कर सकते हैं ? बच्चे कहते हैं कि हम छोटे हैं, अनपढ़ कहते हैं कि बिना पढ़े लिखे लोग क्या कर सकते हैं, गरीब कहते हैं हम तो असहाय हैं | कुल मिलाकर चुनौतियों से बचने के बहाने बहुत हैं | लेकिन चुनौतियों से बच कर भागने से क्या परिस्थितियों से लड़ा और जीता जा सकता है ? यदि हालात ने आपको चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है तो आपको उस परिस्थिति को एक्सेप्ट करना ही होगा |




चौराहे पर खड़े होने का मतलब यह है कि आपके सामने अब सिर्फ और सिर्फ चलने का विकल्प रह गया है | आप खड़े रहकर हालात बदलने का इंतजार नहीं कर सकते | पेट की भूख मिटाने और सर को छत देने के लिए आपको चलना ही होगा |




निश्चित रूप से आपके सामने चार रास्ते हैं | किस रास्ते पर मंजिल मिलेगी यह पता नहीं | लेकिन फिर भी अपनी अंतरात्मा की आवाज और व्यावहारिक पहलुओं को देखकर, उनमें से एक रास्ते का चयन कीजिए और चल पढ़िए | इस दुनिया में बच्चे महिलाएं और गरीब अनपढ़ ने भी ऐसे उदाहरण पेश किए हैं जो इन दिनों में प्रेरणा का सबब बन सकते हैं | ऐसी अनेक सरकारी योजनाएं हैं जो बच्चों महिलाओं और गरीब अनपढ़ वर्ग को भी लाभ दे सकती हैं |




इस दौर में ऐसे अनेक परिवार हैं जिनका मुखिया इस दुनिया में नहीं है |  ऐसे में महिलाओं के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है | उन्हें अपने बच्चों का पालन पोषण भी करना है और उसके लिए रोजगार की तलाश भी करनी है |




ऐसे कई स्वयंसेवी समूह है जो इस दौर में उनकी मदद कर सकते हैं | ऐसे हालातों में राजनेताओं स्वयंसेवी संगठनों समाजसेवी संगठनों और R.s.s. जैसे संघों की भूमिका बढ़ जाती है |




हालात  कुछ ऐसे हैं जब सरकार समाज और संस्थाओं को मिलकर ऐसे लोगों की पहचान करनी होगी जो इस वक्त गंभीर आर्थिक हालातों से जूझ रहे हैं | ऐसे बच्चे जिनके मां या पिता में से दोनों चले गए हैं या कोई एक चला गया है | इन सब को पहचान कर इनसे कांटेक्ट करके यह पहचान करनी होगी कि उस घर में ऐसा कौन है जो किसी रोजगार से जुड़ सकता है | यदि पिता नहीं है तो मां और बच्चे मिलकर क्या कोई रोजगार प्राप्त कर सकते हैं | क्या उन्हें किसी तरह की सरकारी योजना का लाभ मिल सकता है | 




कोविड-19 के बाद इन सब का डेटाबेस इकट्ठा होना बहुत जरूरी है | ऐसे फोरम क्रिएट करने होंगे जो इन लोगों को काउंसलिंग दे सकें | आम तौर पर आम गरीब और सामान्य नागरिकों को सरकार की योजनाओं का पता ही नहीं चल पाता | सरकार ने ऐसी कई बीमा योजनाएं चलाई हैं जिसमें बैंक से कुछ पैसे कटते हैं | जो ऐसे हालातों में बड़ी राहत लेकर आ सकते हैं | लेकिन लोगों को यह पता नहीं कि वह इन योजनाओं का लाभ कैसे ले सकते हैं |




करोना के बाद केंद्र और राज्य सरकारों ने अनेक योजनाएं शुरू की हैं | लेकिन यह योजनाएं जन जन तक कैसे पहुंचे | इन योजनाओं के फॉर्म कहां उपलब्ध है | क्या यह योजनाएं संबंधित व्यक्ति के लिए लाभकारी है या वह इस का पात्र है | यह सारी चीजें क्लियर होनी चाहिए | अब सरकार को इन तक पहुंचने की जरूरत है |




संस्थाओं को  भी इन तक तक पहुंचने की जरूरत है : 




जब तक डाटा बेस पर रिकॉर्ड नहीं होगा नीतियां क्या उन तक पहुंचेगी | आज बहुत से ऐसे अवसर हैं जो गांव और शहरों में महिलाओं और बच्चों की रोजी रोटी के लिए काम आ सकते हैं |




कोई जैविक किसान बन सकता है | कोई सब्जियां उगा सकता है | कोई टिफिन सेंटर चला सकता है | कोई फूड डिलीवरी का काम कर सकता है | ऐसे सभी अवसरों की लिस्ट तैयार करनी पड़ेगी और इनके जरिए कोविड-19  के चलते असहाय हो चुके लोगों को मदद मिलेगी |


 

 

 


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