वेदों में छिपा है ज्ञान का अद्भुत खजाना… SCIENCE – VEDAS-INDIA’S

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वेदों में मौजूद है विज्ञान के रहस्य

याज्ञवल्क्य स्मृति में ज्ञान के चौदह सूत्रों का उल्लेख है। वे हैं – वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद), वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष), पुराण, न्याय, मीमांस और धर्मशास्त्र।

पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्रांग मिश्रिता:।  

वेदा: स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥

 याज्ञवल्क्य स्मृति

मुण्डकोपनिषद् में एक बहुत ही रोचकरूप में विद्या को दो प्रकारों में विभाजित किया है – परा और अपरा।

द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ 4॥
तत्रापरा, ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः
शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति ।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ 5॥

 – मुण्डकोपनिषद्

वेदों में विज्ञान से जुड़े कई सूत्र छिपे हुए हैं| वैज्ञानिक मानते हैं कि वेदों की ऋचाओं में कई ऐसी बातें हैं जो दुनिया को लेकर अदभुत जानकारियां देती है| वेद सबसे पुराने ग्रंथ माने जाते हैं|

ऋग्वेद पहला और एकमात्र वेद था, विद्वानों का मत है कि महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास (वेद व्यास) ने द्वापर युग में इन वेदों का विभाजन कर ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद रचे। कहीं-कहीं ये परिभाषा भी मिलती है कि जिन शब्दों या मंत्रों को एक विशेष स्वर में उच्चारित किया जाता है, किसी फल की प्राप्ति के लिए, उसे वेद कहते हैं।
  • ऋग्वेद – वैदिक स्तुतिओं में मिलता है जीवन का संदेश
ऋग्वेद चारों वेदों में पहला है, शेष तीन वेद (यजु, साम और अथर्व) भी पहले इसी वेद का हिस्सा थे। वेदों का अध्ययन इसी से शुरू होता है। आज भी वेदपाठी ब्राह्मण ऋग्वेद की स्तुतियों से ही मंगल कार्य शुरू करते हैं। ऋग्वेद, शब्द ऋक् से बना है, जिसका अर्थ है पूर्ण रूप से छंदों से बद्ध रचना। सीधा अर्थ है कि ऋग्वेद देवताओं की छंदबद्ध स्तुतियों का ग्रंथ है। ऋग्वेद में 1017 सूक्त, 10 अध्याय, 2006 वर्ग (मंत्रों के समूह) हैं। पतंजलि के अनुसार ऋग्वेद की 21 शाखाएं हैं। ऋग्वेद में यज्ञ से जुड़े देवताओं की स्तुतियां है।
  • यजुर्वेद – ज्ञान, कर्म और उपासना का सार
यजुर्वेद यज्ञों से जुड़े मंत्रों का वेद है। इसमें यज्ञों से जुड़े सारे नियमों का संग्रह है। यजुर्वेद के तीन मुख्य तत्व हैं ज्ञान, कर्म और उपासना। हिंदु धर्म में किए जाने वाले सभी कर्मकांडों का मुख्य केंद्र या ग्रंथ यजुर्वेद ही है। किस यज्ञ को किस विधि, क्रम और मंत्रों से किया जाना है इसका सारा विधान यजुर्वेद से होता है। इसलिए जो यज्ञ कर्ता ब्राह्मण होते हैं वे यजुर्वेद के अनुशासन का ही पालन करते हैं। यजुर्वेद के दो भाग हैं, पहला कृष्ण यजुर्वेद और दूसरा शुक्ल यजुर्वेद। ये दो संप्रदायों में बंटा है, कृष्ण यजुर्वेद ब्रह्म संप्रदाय के मानने वालों का वेद है और शुक्ल यजुर्वेद आदित्य संप्रदाय यानी सूर्य को मानने वालो का। कृष्ण यजुर्वेद को मानने वाले ब्रह्मा के निमित्त यज्ञ करते हैं और आदित्य संप्रदाय के ब्राह्मण सूर्य को प्रत्यक्ष देवता मानकर। शुक्ल यजुर्वेद की दो संहिताएं वाजसनेय और काण्व संहिता है, वहीं कृष्ण यजुर्वेद की चार प्रमुख संहिताएं मानी गई हैं तैत्तरीय, मैत्रायणी, कठ और कठकपिष्ठल संहिता।
  • सामवेद – स्वरों का विज्ञान
सामवेद मुख्यतः स्वरों से जुड़ा वेद है। स्वरों के आरोहअवरोह से मंत्रों का गान सामवेद का भाग है। वैदिक ऋचाओं और स्वरों के संतुलन इन दोनों को साम कहा गया है। गीता के उपदेश में श्रीकृष्ण ने खुद को वेदों में सामवेद बताया है, क्योंकि मंत्रों का फल उनके स्वर और उच्चारण पर निर्भर है, मंत्र फल तभी देते हैं जब वैदिक मंत्रों में स्वर और उच्चारण का सही संतुलन हो। इसी कारण श्रीकृष्ण ने स्वयं को सामवेद कहा है। सामवेद संहिता के दो भाग हैं, पहला आर्चिक दूसरा है उत्तरार्चिक। साम वेद की तीन शाखाएं मानी गई हैं, 1. कौथुम संहिता – जो गुजरात में प्रचलित है, 2. राणायनीय – ये महाराष्ट्र में प्रचलित है तथा 3. जैमिनीय – जो केरल सहित दक्षिण भारत में प्रसिद्ध है।
  • अथर्ववेद – संसार से परिवार तक
ये एकमात्र वेद है जिसका नाम किसी ऋषि के नाम पर है। सप्तऋषियों में एक अंगिरा के वंशज अथर्वा ऋषि ने सबसे पहले इस वेद के दर्शन किए थे, ऐसा कई ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। इस कारण उन्हीं अथर्वा ऋषि के नाम पर इस वेद का नाम अथर्व वेद पड़ा है। अथर्व शब्द का अर्थ है कुटिलता से रहित होकर अंहिसा पूर्वक अपने मन को स्थिर करने वाला व्यक्ति। अंगिरा के वंशज के नाम पर होने से इसे अंगिरस वेद भी कहा जाता है। इसी को ब्रह्मवेद भी कहा गया है। ये वेद शेष तीनों वेदों से अलग है, इसमें रोगों के इलाज, लंबी आयु के लिए आरोग्य के मंत्र, सुख-समृद्धि को पुष्ट करने के लिए पौष्टिक मंत्र, सभी तरह की आपदाओं की शांति के लिए शांति सूक्त, परिवार, मित्रों आदि में प्रेम बढ़ाने के लिए प्रणय मंत्र, राजकर्म सूक्त जिसमें राजाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए मंत्र हैं, और अंत में यज्ञों में प्रार्थना दानादि के लिए प्रकीर्ण सूक्त दिए गए हैं। तीनों वेद (ऋग्वेद, यजु और साम) की अपेक्षा ये वेद जीवन के उद्धार और व्यवस्थाओं पर केंद्रित है।

 डॉ. शशि तिवारी (सेवानिवृत्त, संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) 

 


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