संत कबीर के इन दोहों पर क्यूँ उठ रहे सवाल ? दोहों में “क्या” गलत कह गए कबीर?

संत कबीर के इन दोहों पर क्यूँ उठ रहे सवाल ? दोहों में "क्या" गलत कह गए कबीर? 


-दिनेश मालवीय

भारत की संत-परम्परा, विशेषकर मध्यकाल के भक्ति आन्दोलन के संतों में कबीर का अद्वितीय स्थान है. नि:संदेह उन्होंने जो भी आलोचनात्मक कहा, वह अपने समय की परिस्थितियों और धर्म के नाम पर फैले हुए पाखण्ड को देखकर उनके मन में उपजा था. उनके पदों और अन्य रचनाओं को पढ़ते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि वह अनुभव प्राप्त संत थे. अध्यात्म के क्षेत्र में उनकी उनकी उपलब्धि बहुत उच्च है.

उनके पदों को हमने प्राथमिक कक्षाओं की किताबों में पढ़ा है. शिक्षक इनकी व्याख्या करते हुए बताते थे कि संत कबीर एक महान समाज सुधारक संत थे. उन्होंने किसी भी धर्म के पाखण्ड और गलत आचरण की खुलकर निर्भीक आलोचना की. इस सन्दर्भ में उनके दो-तीन दोहे बहुत प्रसिद्ध हैं और उनकी महानता सिद्ध करने के लिए हर कोई उन्हें उद्धृत करता है-

“कंकर पाथर जोड़ के मस्जिद लई बनाय

ता चढ़ी मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय.”

और

पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूँ पहाड़

घर की चाकी कोई न पूजे, जासे पीस खाए संसार.

बचपन में पढ़ी-सुनी ये बातें मन को बहुत भाती रहीं. लेकिन जब अन्य ग्रंथों और संतों को पढने के बाद आध्यात्मिक साधना की और धर्म की कुछ समझ विकसित होने लगी, तो इन दोनों दोहों के प्रति मन में आलोचना का भाव विकसित हो गया.

पहले दोहे को लें, तो कबीर कहते हैं कि कंकर पत्थर जोड़कर मस्जिद बना ली. इस पर चढ़कर मुल्ला बांग दे रहा है. क्या खुदा बहरा है? ऊपर से देखने में इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता, लेकिन यदि गहराई से देखें तो मुल्ला मस्जिद में एक ऊंचे स्थान पर चढ़कर खुदा को थोड़े ही पुकार रहा है. वह तो गाँव-शहर में सोने वाले लोगों को अजान दे रहा है, कि सुबह हो गयी है, उठिए और नमाज के लिए आइये. इसमें खुदा कहीं बीच में नहीं है और न उसके बहरे होने की बात कहने की कोई तुक नज़र आती. वह खुदा से कुछ कह ही नहीं रहा है.

बिलावजह इस इस दोहे को तूल देकर सदियों से यह जाताया जा रहा है कि“देखो, कबीर ने मुसलामानों की क्या ख़बर ली है.”

इसी प्रकार दूसरे दोहे को देखें जिसमें कबीर कह रहे हैं कि पत्थर को पूजने से यदि भगवान् मिल जाएँ तो मैं तो पहाड़ को पूज दूं. घर की चक्की को क्यों नहीं पूजते जिससे पीसकर यह संसार खाना खाता है.

कबीर की इस बात की भी कोई तुक नज़र नहीं आती. पहली बात तो कोई पत्थर की पूजा नहीं करता. किसी पत्थर को प्रतिमा को आकार देकर उसमें प्राण प्रतिष्ठा की जाती है. उसमें भगवान् का निवास मानकर भक्त उस प्रतिमा के माध्यम से भगवान् की पूजा की जाती है. इस दोहे में कबीर अनादिकाल से चली आ रही प्रतीक पूजा के विधान की ही खिल्ली उड़ाते हैं. भारत में भक्ति के नवधा अर्थात नौ प्रकार प्रतिपादित किये गये हैं. इनमें भगवान् की साकार पूजा भी शामिल है.

भगवान् श्रीकृष्ण श्रीमद्भागवतगीता में कहते हैं कि जो भी भक्त प्रेमपूर्वक मुझे जो भेंट करता है (यानी प्रतिमा के समक्ष) उसे मैं प्रेम से ग्रहण करता हूँ. अनेक संत साकार उपासना करके ही परम चेतना को प्राप्त हुए. अब आप ही सोचिये, कि कहाँ प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमा की पूजन और कहाँ पहाड़ या चक्की! क्या इनमें कोई तुलना है?

इसी तरह उन्होंने सिर मुंडवाने की परम्परा की खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि भेड़ तो रोज अपने बाल मुंडवाती है, वह स्वर्ग क्यों नहीं जाती. अनेक महत्वपूर्ण और पवित्र अवसरों पर सनातन धर्म में सिर मुंडवाने की प्रथा है. मुस्लिम लोग भी जब हज करने जाते हैं तो वे वहाँ अपना सिर मुंडवाते हैं. दरअसल सिर के बाल अर्पित करना प्रतीकात्मक रूप से अपने अहं का विसर्जन करना होता है. इसमें बाल अर्पित करने वाले का यह  भी भाव रहता है कि मैं इन बालों के माध्यम से अपनी सभी बुराइयां यहाँ छोड़कर जा रहा हूँ.अब नये बालों के उगने के साथ नया जीवन शुरू होगा.

सनातन धर्म के अनेक पंथों के सन्यासी हमेशा सिर मुंडवाये रहते हैं.दरअसल, सिर के बाल मनुष्य की शारीरिक सुन्दरता के भी प्रतीक होते हैं.मनुष्य सुंदर दिखने के लिए अपने बालों को तरह-तरह के आकार देता है. उनके सफेद होने पर उनपर खिजाब लगा कर काला करता है. ये सन्यासी अपने शरीर को सुंदर बनाने की ओर नहीं, आत्मिक रूप को  सुंदर बनाने की ओर ध्यान देते हैं. इसलिए वे बाल ही नहीं रखते. हो सकता है कि उनके समय में कुछ ऐसे सन्यासी हों जो बाल नहीं रखते हों, लेकिन उनका आचरण ख़राब हो, लेकिन इसके कारण इस पूरी परम्परा की आलोचना समझ से परे है.

किसी की भी साधना पद्धति की आलोचना करना उचित नहीं है. चेतना की परम अवस्था को प्राप्त संत और योगी कहते हैं कि जब तक आपको दूसरे लोगों की साधना-पद्धति और उनके आचरण में दोष दिखायी देता है, तब तक यह मानकर चलिए कि दोष आपमें ही है.

कबीर ने जगह-जगह पर मूर्तिपूजा और साकार उपासना का उपहास किया और इसका जमकर विरोध किया. साथ ही साम्प्रदायिक सोच और पंथवाद को उन्होंने सदा नकारा,  लेकिन उन्हीं को मानने वाले लोग उनके मंदिर बनाकर उनकी पूजा कर रहे हैं. उनके लिए आरती लिखी गयी हैं और सुबह-शाम कबीर के मंदिरों में उनकी आरती गायी जाती है. उन्हें भगवान् स्वरूप मान लिया गया है. यह तो उनकी शिक्षा के एकदम विपरीत है. 

कोई कह सकता है कि क्या मैं कबीर से अधिक ज्ञानी हो गया? ऐसा मेरा कोई दावा नहीं है. लेकिन एक बात हमेशा ध्यान में रखी जनी चाहिए कि ultimate कोई नहीं होता. एक समय आने पर सभी की समीक्षा होती है. असीम को ससीम कैसे किया जा सकता है. मेरे मन में भी कबीर के संतत्व को लेकर या उनकी सोच और आध्यात्मिक उपलब्धि को लेकर कोई संकोच या संदेह नहीं है,लेकिन मैंने ऊपर जो दोहे बताये हैं, उनके सन्दर्भ में मैं उनकी आलोचना कर रहा हूँ.

कोई कितना भी बड़ा महापुरुष हो, उसकी बात को बिना सोचे-समझे नहीं मान लेना चाहिए. सच्चा महापुरुष ख़ुद भी ऐसा नहीं चाहता. वह कहता है कि मैं तो वह कहने की कोशिश भर कर रहा हूँ, जिसे शब्दों में कहना असंभव है. मैं जो नहीं कह पा रहा हूँ, उसे समझने की कोशिश कीजिए.

मेरी इस बातों को अन्यथा लेने की ज़रा भी आवश्यकता नहीं है. सिर्फ इन दो दोहों के सन्दर्भ में सोचकर देखिये कि मैं सही हूँ या नहीं.


नोट: ये लेखक के निजी विचार हैं| 


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